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ऐ ख़ुदा --

ऐ ख़ुदा --                 ना तो हीरे रतन की मैं खान मांगती हूँ                   ना चाँद,तारे,सूरज,आसमान मांगती हूँ               मेरे हिस्से की धूप का बस दे दे किला                   जरुरत की जीस्त के सामान मांगती हूँ ।                 फाड़कर ना दे छप्पर कि पागल हो जाऊँ                     रूठकर ना दे मन का कि घायल हो जाऊँ                अपने दुवाओं की सारी कतरनें बख़्श देना                   कि तेरी बंदगी की ख़ुदा मैं क़ायल हो जाऊँ ।                गुज़ारिश है आँखों में वो तदवीर बना देना                     मेरी ख़्वाहिशों का मेरे तक़दीर बना देना       ...

गज़ल " बहुत याद आये रे सावन की भींगी रातें "

गज़ल " बहुत याद आये रे सावन की भींगी रातें " नाम पर आपके हम मुस्करा क्या दिए  कि लोग अन्दाज़ जाने लगा क्या लिए  छुपाना तो चाहा था मैंने मुहब्बत मगर  ईश्क़ के उसूल ही ऐसे,ख़ता क्या किये । खुश रहे तूं सदा दुआ ये मांगा ख़ुदा से  हँसी होठों पे रहे सदा ऐसी ही अदा से  जैसे ख़ुश्बू निभाये साथ गुलों का सदा  वैसे रहे हाथ तेरा भी मेरे हाथों में सदा । महफ़िलों में भी बैठकर मैं अन्दाज़ ली  कितनी बिन तेरे अधूरी मैं अहसास ली  लाखों की भीड़ में भी लगे अकेली हूँ मैं  चले आओ फिर ज़िन्दगी हो बिंदास सी । न जाने मेरी आँखों को क्या हो गया है  कि आईना निहारूँ आये तूं ही तूं नज़र  चढ़ा कैसा ख़ुमार मुझपर तेरे प्यार का  पांव रखती कहीं हूँ पड़ते कहीं हैं मगर । छिपा रखा जो दिल में कह दो वो राज  चैन चुराने रातों में मत आया करो याद बता सीखा कहाँ से तूने करतब ये फ़न  बेचैन कर ख़्वाब में ना किया करो बात ।  बहुत याद आये रे सावन की भींगी रातें  तस्वीर लेके तेरी हाथों में करती हूँ बातें  भींगती आँसुओं की बारिश में निशदिन  अरे कह...

'जीवन राग'

         जीवन राग  ना जाने किस बला की नज़र लग गई है  कि मस्ती भरा  आलम कहीं  खो गया है  किलकारियों को भी  ग्रहण लग  गया है आकर्षण  भी ना जाने कहाँ  सो  गया है।    जहाँ बेला,जूही,चम्पा सुवासती थी चमेली वही हो गई है मरुभूमि सी मन की हवेली  प्रेम राग रूठ गया अन्तर्मन के घोंसलों से   कंटीली कंछियाँ फूटीं हृदय के अंचलों से।  चिंताओं,तनावों की घेरि आई कारी बदरी प्रेम की धरा पर रेगिस्तान जैसी रेत पसरी  अरमान सूखा,सूख गयीं रसपगी भावनाएं   वक्त के परों पर उड़ विलीन होतीं करुनाएं।  जरुरत है जीवन में फिर से राग रंग भरना  उर की स्वच्छ वेदी पे विकार आहूत करना  आन्तरिक सफाई कर के पौधे संस्कार की  सुन्दर पुष्प खिल सकें रोपें सूखी संसार की। बड़े-बड़े मॉल, शहर, कालोनी चौड़ी सड़कें दब जाये ना मानवता इस मोह में सिमट के प्रगति की हूँ पक्षधर  विस्तारों का उद्देश्य भी  सीमित यन्त्र में न खो जाये ...

ईश्वर भी इतना अस्मर्थ हुआ क्यों

उत्तराखंड की त्रासदी पर ईश्वर भी इतना अस्मर्थ हुआ क्यों अरे मेघ जलवृष्टि चाहा था प्रचण्ड जल प्रलय का ऐसा हाहाकार नहीं सूखी बंजर धरती में अंकुर फूटे धन,जन क्षति का ऐसा चित्कार नहीं। प्राकृतिक छटा के मोहपाश ने लील लिए बेकसूर जीवन जाने कितने तेरी क्रूरता पार की आंकड़ा तड़प बता सिहर उठते,जीवित हैं जितने। देवभूमि दरश की भूखी आँखों का यम से यह कैसा साक्षात्कार हुआ कुछ काल के गाल में गए समा कुछ को भष्मासुर का क्रूर दीदार हुआ। कैसे जज़्ब करें अपनों के खोने का ग़म वादी ने आत्मसात किये हैं जो रूह कंपाने वाली अलकनंदा,मंदाकिनी ने बर्बर वहशियात किए हैं जो। भगीरथ तेरी उद्दंड भयावह क्रीड़ा जो विस्फारित दृगों ने देखा अचंभित अथाह छलकाया था जल का सागर फिर भी प्यासा तरसा तन कम्पित। जाने किस कन्दरा दुबक गए देव असहाय ,बेसहारा कर श्रद्धालुओं को उत्पात हुआ केदारनाथ के गढ़ में जिंदगी की हवाले मिटटी बालूओं को। आस्था का ये कैसा इतिहास रचा अपने अस्तित्व के होने या ना होने का अंधभक्ति का ये ...

ये वादियां,फिजायें दे रहीं आमन्त्रण

ये वादियां,फ़िज़ाएं दे रहीं आमन्त्रण  कुर्ग, कोडईकनाल, मुन्नार, लोनावाला अवकाश का आनंद लेने चलें खंडाला , कहीं बीत ना जाये गरमी की छुट्टियां उधेड़बुन में खुल ना जाये झट स्कूल अनदेखा,अविगत अनुभव करने का फिर कचोटता रह ना जाये चित शूल , वन की विलक्षण वनस्पतियां देखने अनुपम उद्यान,रंग-विरंगे उपवन का ये वादियां,फिजायें दे रहीं आमन्त्रण लुत्फ़ उठाने को निरूपम मौसम का , पर्यटन के अनेक रूपों का रोमांचक एहसास कराने विलक्षण जहान का कल-कल बहते झरने पहाड़ बीच से साक्षात् दृश्य डूबते हुए अंशुमान का , सावन की बरसती रिम-झिम फुहारें उस पर अप्रतिम सौन्दर्य प्रकृति का भीनी-भीनी ख़ुश्बू सुहाये पावस की ठंडी हवा के झोंके नैसर्गिक सुंदरता , हरी-भरी खूबसूरत लगती पहाड़ियां झरनों के चतुर्दिक चादर बादल का कण-कण स्वागत  करती मुग्ध धरा मानसून के जीवन्त सुरभित रंग का , प्राकृतिक सुवास से प्राण प्रस्फुटित पेड़-पत्ते,जीव-जन्तु ,नदी,पोखर का छटा मनोहर भाये सुंदर गोधूलि की शांत,एकांत सदाबहार गिरि दल का , प्रकृति का बेजोड़ उपहार समेटे पर्वत  अलौकिक अनुभूति,मोह...

तन्हाई ने सीखा दिया जीने का गुर

        तन्हाई ने सीखा दिया जीने का गुर  कभी शरच्चन्द्रिका सी विहँस अद्भुत जगत के दरश करा देती  कभी झटक परिहास कर धूसर विश्व में छोड़ चली जाती तन्हाई कभी यादों,सोचों का साम्राज्य खड़ा कर गहन सन्नाटा देती चीर कभी मन के निर्मम,बोझल तम को आलोक दिखा जाती तन्हाई  , कभी अन्तर कर देती क्लेशित,कभी नाभाष प्रफुल्लता भर देती कभी निराशा के अंचल हर्षातिरेक से आस की पूर्णिमा भर देती कभी तन्हाई के नैराश्य जमीं पर सुख-दुःख के सरसिज बो देती कभी जीने की राह सुझा जाती कभी झट धीरज संचित खो देती , कभी विलास की रानी बनकर मृत स्पन्दन में किसलय भर देती कभी अलौकिक,अद्भुत लोक में पहुँचा मन मतवाला कर देती कभी नयनों में खारा सागर कभी अविच्छिन्न उत्साह से भर देती कभी एकाकी जीवन उपवन,शीतल पवन बन सुरभित कर देती , कभी हताश,निराशा,विषाद,अवसाद की ऊसरता मिटला जाती कभी जीवन सरिता का उद्गम बन,मरुमय वक्ष उर्वरा बना जाती कभी बाल सहचरी बन तन्हाई ,तन्हाई की नीरवता सहला जाती कभी ख़ुशी का अलख जगाती...

'' तुम हाँ तुम ''

                तुम हाँ तुम  कितनी बार घटा बन उमड़-घुमड़ बरसी मेरी घनीभूत पीड़ा काश कभी पोंछ दिए होते तुम स्नेह में बोर-बोर ख़ुद पोरों से , जो अभिव्यक्ति पिरो गीतों,छंदों में अलापी थी मेरी मन वीणा काश कभी व्यथित हुए होते सुन दर्द भरे आरोह-अवरोहों से उर के अतल समंदर ना जाने कितने थे बेशकीमती रत्न छिपे काश कभी पैठ खोज लिए होते तुम अंतर्मन के गोताखोरों से कलमवद्ध कर कविता में उर के अनमोल मोती थे पिरो दिए काश कभी मन से पढ़ तुम भींग गये होते दर्द भरे कुहोरों से  उर्वशी,रम्भा अप्सराओं सी कहाँ तुझे मेरी देह से नशा मिली काश योगी का तप भंग करने के होते मुझमें ढंग छिछोरों से।                                                                 शैल सिंह 

खुशी,हर्ष,आनंद हो सबके दामन में

रिश्तों में मिठास घोलने रंज,भेदभाव की दीवार ढहाने पर्व दीपोत्सव आया सर्वहित संकल्प का थाल सजाने । सुख,समृद्धि,भाईचारे का पर्व दीवाली तुमसे ही दीपक सज क़तार में जगमग जग सारा होता तुमसे ही दीपक रात अमावस की काली तुम चीर तिमिर का सीना दीप कर देते भोर सी निशीथ,शुभ पर्व प्रकाश का मना दीप । जब सारी दुनिया सोती प्रशान्त नीरव में धुनि रमाते हो आकर्षित कर अग्निशिखा से  शलभों को झुलसाते हो अंधकार हरने को जैसे आलोक बिखेरते हो कण-कण वैसे दो वर मनुज को शुचि भाव हृदय भर करें समर्पण । माटी का तन जला दीये ने जग में बिखराया उजियारा प्रज्वलित हो सारी रात्रि भी निज तले झेला अंधियारा  किस तप साधना में लीन किसलिए निरन्तर जले दीप तिल-तिल,जल-जल किसलिए  ज्योतित होते रहे दीप । अखिल सृष्टि लिए हो जगमग अपनी गात जला डाले दिया क्या कृतघ्न जगत ने अपना अस्तित्व मिटा डाले किस माटी का पुतला तूं निस्तब्ध यामिनी में निःस्वार्थ  जगमग पग-पग बाहर,भीतर जल करता रहा पुरुषार्थ । वंदनवार सजा द्वार सब खींच रंगोली चौखट आँगन में  माँग रहे कर जोड़ ख़ुशी,हर्ष,आनंद हो सबके दामन में धूम धड़ाका छोड़ पटाखे खा खील...

तूने क्या परितोष दिया,

       तूने क्या परितोष दिया तूं कितना कंजूस है भगवन तुझसे बहुत शिकायत है क्यूँ मेरे लिए ही हर जगह तूं करता इत्ती किफ़ायत है, मैंने भी तो मंदिर-मंदिर जा तुझको था परनाम किया तेरी दहलीज़ पर मत्था टेक,चरणामृत का पान किया, मैंने भी फल,मेवा थाली,भर-भर भोग तुझे लगाया था अक्षत,रोली,धूप,अगर,चारों कोणों में दीप जलाया था, गोमाता के शुद्ध क्षीर से हर-हर बम-बम नहलाया था चालीसा औ महामंत्र पढ़ बस तुझमें ध्यान रमाया था, दान,दक्षिणा दे द्विजों को भी श्लोक,मन्त्र,पढ़वाया था घंटियों की कर्कश ध्वनियों से कितनी दफ़े जगाया था, नैनों की अविरल धार से,कितनी बार अभिषेक किया निर्निमेष कर जोड़े भाव से,पर तूने क्या परितोष दिया, रत्ती भर भी भान नहीं था भगवान घाघ,घूसखोर भी है तगड़े असामी के लिए लगा,देता ताक़त पुरजोर भी है, मैंने तो अपनी सामर्थ्य और क्षमता तुझ पे खूब लुटाया बेजान शिला की मूरत ने क्यूँ पग-पग मुझको भरमाया, प्रभु भोर हुई तेरे दरश से मेरी,जप नाम तेरा मेरी शाम सुबह,सांध्य गंवाया मैंने तेरी,आरती,वन्दन में निष्काम, कभ...

एक हमारा कल था

  एक हमारा कल था  अब तो उलझकर बचपना बस किताबी हो गया हाथों में  टैब,मोबाईल ठाठ बहुत नबाबी हो गया , अब तक है याद ताज़ी,छुटपन के प्यारे गाँव की छपाछप खेलना बरसातों में काग़दों के नाव की , भोर की सुनहरी किरणें ढलती सुहानी शाम की नीम,कीकर का दतुवन सेंक सर्दियों के घाम की , पक्षियों की चहचहाहट कागा के कांव-कांव की प्रणाम करना,नित्य भिनुसार बुज़ुर्गों के पांव की , झरकन बसंती हवा की बरगद के घने छाँव की गन्ध सोंधी महक माटी की  बचपन के ठाँव की , ओसारों में डलीं खाटें लुत्फ़ चाँदनी के रात की यादें बहुत हैं रुलाती गुज़री घड़ियों के बात की , संयुक्त परिजनों का क़स्बा दादू के चौपाल की पक्के कुंवना का पानी चने,अरहर के दाल की , मटर की  घुघुरी , कच्चा रस, सरसों के साग की चोखा भऊरी का लुफ़्त पके गोहरे के आग की , चिन्ता ना फ़िकर,ज़िम्मा ना ज़हमत जवाल की गुडे्-गुड़िया याद झूला वो निमिया के डाल की , सखियों संग  कुलांचें  भरना अमुवा के बाग़ की याद आये कुर्ती लगे जंबुल,टिकोरे के दाग की , घर के विशाल अहात...

अनवार दिल पे सितम ढा रहे हैं

चित्र
अनवार दिल पे सितम ढा रहे हैं रात गहगह चाँदनी में नहाई हुई है झिलमिल सितारे जगमगा रहे हैं नाग़वार दिल को लगे ये नज़ारा अनवार दिल पे सितम ढा रहे हैं। नज़रों की खुराफ़ात ख़ता दिल से हो गई सदमा गहरा दिल पर जुदा तुमसे हो गई कौन हूँ मैं तेरी क्या वाबस्ता तुझसे मेरा हुई वफ़ा संग बेवफ़ाई ख़फ़ा तुझसे हो गई , झांकते हैं रोज पलकों की बन्द झिर्रियों से अबस यादों के गुस्ताख़ वो गुजरे ज़माने यादों के पाँखी मन क़फ़स में फड़फड़ाते  रक़्स करते हैं और जख़्म जवां हो पुराने , ये जलवे फिज़ा के ये शब की गहनाई मंज़र वही पर रौनक़े-महफ़िल नहीं है हँसीं ग़ुंचे वही सबा पेशे गुलशन वही है मगर जलवा-ए-नुरेज-अज़ल वो नहीं है , आहिस्ता-आहिस्ता ये रात ढल रही है रुख पे नकाब डाले चाँद छिप रहा है आसमां के जुगनू सितारे सो गए सब दिल बहलाने के  सहारे खो गए सब , शेर -- गुजरे किस दौर से हैं फिर भी मुस्कराये तख़लीफ़ कर हम खुद-बख़ुद गुनगुनाये तंज कसते मजरूह दिल पे अहवाब सारे सरमाया ज़ख्मों का रखा दिल से लगाये ।      ...

'' ग़ज़ल ''

ग़ज़ल  महक से हो गई तर हमारी गली उनके आने की आहट हवा दे गई, जिस्म की डाल पर रंग चढ़ने लगे बेसबर से नयन राह तकने लगे ख़ुश्बू राहे-जुनूँ पर जहाँ ले गई  उनके आने की आहट हवा दे गई, खुली आँखों में सपने संवरने लगे रात भी आज दिन मुझे लगने लगे शबे-तारीक में चाँदनी जवां हो गई  उनके आने की आहट हवा दे गई, हरे हो गए शज़र उनके पदचाप से  ख़िज़ाँ के फूलों पर सुर्ख़ी आने लगी ख़ुशी लग कर गले से घटा हो गई  उनके आने की आहट हवा दे गई, प्यार में जाने क्या सिलसिले ये हुए कंपकपाये थे जो लब गिले के लिए करीब आते ही जाने कहाँ खो गई  उनके आने की आहट हवा दे गई, छाँह आग़ोश की पाये अरसा हुआ बाँहों में भर नेह से जब मन को छुआ हर छुवन दर्द की अचूक दवा हो गई  उनके आने की आहट हवा दे गई, लौटकर शाद आये घऱ मेरे सनम शाम सुरमई गुलाबी सवेरा हुआ सरे-मिज़गाँ बिठा कर रवा हो गई  उनके आने की आहट हवा दे गई, टूटकर शाख़ से यास थे हम-नफ़स  सद-गुहर पा फ़िरोजां हुई शैल अब जीस्त वीरां ताबिन्दा-पाईन्दा हो गई  उनके आने की आहट हवा ...

ईश्वर की लीला'

  ईश्वर की लीला' बहुत कुछ दिया है यूँ तो खुदा ने  तृप्ति नाम की चीज मगर पास रख ली , अनन्त इच्छायें दीं पवन वेग सी दमन नाम की चीज मगर पास रख ली , रची भोग,लिप्सा,विलास,वासना शमन नाम की चीज मगर पास रख ली , बहुरंगी सपनों के आयाम सजा जमीं ठोस कर्मों की मगर पास रख ली , मन को गढ़ा कितने मनोयोग से  विभूति मानवता की मगर पास रख ली , पत्ता तक हिले ना बिन उसकी मर्जी वस्तु दोषमुक्ति की भी मगर पास रख ली , तज विकार शीश का बोझ उतारें कहाँ कुँजी निदान की भी तो मगर पास रख ली , सुख,शान्ति,अमन,चैन ढूंढ़ते फिर रहे सन्दूक ऐसे भी धन की मगर पास रख ली, खामियाँ भी भरीं खुद ही इंसानों में पिटारा खूबियों का भी मगर पास रख ली , सब कुछ हो रहा सृजन के अनुकूल ही  सर कभी इल्ज़ाम ईश्वर ने कब खुद के ली ।

मर मिटें अपने प्यारे वतन के लिए

मर मिटें अपने प्यारे वतन के लिए  मर मिटें अपने प्यारे वतन के लिए  भारत माता को ऐसा ललन चाहिए,            वक्त ने आज ऐसी चुनौती है दी            हमें सद्दभाव समता चलन चाहिए, माँ के चरणों में श्रद्धा से जो चढ़ सके  वो चमन का दुलारा सुमन चाहिए,            विकारों को तज सत्य का बोध हो             सुख,शान्ति का निर्भय अमन चाहिए,  जो भंवर में फंसी पार नौका लगा दे नाविक की वल्गा में वो बाँकपन चाहिए,             तमलीन जगत वास्ते आत्ममंथन करें              दिल में दीपक जले वो जलन चाहिए, मेरी कब चाह हीरे,रतन,सम्पदा  शैल रोटी और कपड़ा,भवन चाहिए ।

नारी मर्म न जाना पुरुष जगत तुम

नारी मर्म न जाना पुरुष जगत तुम  नारी मर्म ना जाना पुरुष जगत तुम निर्देश दिया तूं नारी धर्म निभाने की ,     कब झांककर अन्तर्मन देखा तुमने जिसकी सागर  सी कितनी गहराई                       झाग सी उठती लहरें देखा,कभी न देखा शांत,स्निग्ध तरनी क्यों बौराई , बोलो कब दुराग्रह की थी मैं तुझसे  दे दो ना लाकर मुकुट हिमालय का बोलो कब चाहा  देवी की मूरत बन मूक शोभा बन कर रहूँ देवालय का , बांध कर तुमने मुझको वर्जनाओं में  लक्ष्मण रेखाएं हैं खींच रखी कितनी तुमने जकड़के परिधि के जंज़ीरों में तय कर रखी हैं मेरी सीमाएं कितनी , क्या होतीं मर्यादायें कैसा संयम,की प्रतिपल मुझे बतलाते रहे परिभाषा छल करते आये धारण कर आवरण नहीं जाना क्या हृदय की अभिलाषा , मैंने तो द्विज के सातों वचन निभाए  परिणय धागे में स्वयं को बाँधे रखा  मेरे सतीत्व की अग्नि-परीक्षा लेकर  भी,क्यूँ प्रमाण की करते रहे समीक्षा, मैं सम्पूर्ण समर्पण से वामांगी बन के जीवन,सेवा के यज्ञकुंड म...

अहोभाग्य उत्तर प्रदेश का

योगी जी के मुख्यमन्त्री बनने पर कविता अब होगा उत्तर प्रदेश का उन्नयन कंवल फूल खिला जन-मन के उपवन , इक संत की हुई है ताज़पोशी कितनी हनक,धमक के साथ अरे अहोभाग्य उत्तर प्रदेश तेरा रच डाला जनमत ने इतिहास , हाथी का मद चूर-चूर हुआ चारों खाने चित पड़ी निढाल खिसियानी बिल्ली सी खम्भा नोचे छाती पीटे बना ईवीएम को ढाल , हाय घोंचू पंजा ने कर दिया कैसा साईकिल भैया का बदतर हाल इतनी गहरी खाई में ढकेला कि बिखर गया बिछा शतरंजों का जाल , अस्तित्व झाड़ू का खतरे में  खा-खाकर खुजलीवाले से ख़ार टूटकर बिखर रहा एक-एक सींका जाने अब क्या होगा अगली बार , लालटेन इतना भी मत भभको  आँधी नहीं इस बार  की  बख़्शेगी बाती पर रखना कस लग़ाम [ ज़ुबान पे ] जनाधार की कैंची ही कतरेगी, टकरा-टकरा राष्ट्रवादी ताक़तों से  हवाएं भी गईं चहुँओर की हार सहर्ष लिपट गईं आकर गले पुष्प बन,योगी जी के गले का हार , साहूकार बनकर जो लूट रहे थे धड़ाधड़ सरकारी ख़ज़ानों का माल अकल उनकी भी ठिकाने लगा दिए ख़ुद उनके अपने ही सियासी चाल , और कितने दिन छलते देशद्रोही छद्म पाठ साम्प्रदायिकता का पढ़ाकर ऐसा ज...

वसंत ऋतु पर कविता

वसंत ऋतु पर कविता  बड़ा सुहावन मन भावन लगे वसंत तेरा आना थोड़ी सर्दी थोड़ी गर्मी लगे मौसम बड़ा सुहाना , इंद्रधनुष ने खींची रंगोली सज गई मधुऋतु की डोली बिखरा दी अम्बर ने रोली धरती मांग सजा खुश हो ली छितरी न्यारी सुषमा चहुँदिश कलियाँ घूँघट के पट खोलीं ठूँठों पर आई तरुणाई भर गई उपहारों से झोली, देख हरित धरणी का विजन हुआ मन मयूर मस्ताना सरसों पीत चूनर लहराई उसपर तितली का मंडराना पी मकरंद मस्त भये मधुकर हुए मद में मगन दीवाना गूंजे विहंगों की किलकारी कुञ्ज-कुटीर  मलयानिल का आना , मह-मह महके बौरा अमराई  मधुकंठी मीठी तान सुनाये देख वासन्ती मादकता नाचे वन,वीथिका,नीलकण्ठ बौराये पछुआ-पुरवा की शीतल सुरभि नशीला गन्ध चित्त भरमाये पापी पपीहरा पिउ-पिउ बोले पी की सुध विरहन को सताये , चित चकोर तिरछी चितवन से अपने सजन से करे निहोरा मूक अधर और दृग से चुगली करे दम-दम सिंगार-पटोरा प्रकृति नटी भरे उमंग अंग-अंग  कंगना वाचाल हुआ छिछोरा अनुभाव ना बूझे बलम अनाड़ी कुंदन तन अंगार दहकावे मोरा , वसन्त क...

क्रान्तिकारी कविता शब्दों की परिमिति लांघी रे बहती स्याही की धार

क्रान्तिकारी कविता  हस्त कलम गहते ही दहाड़ कर भरने लगी हुंकार  शब्दों की परिमिति लांघी रे बहती स्याही की धार , तोड़कर बंधन विविध भीति के द्विजिहा ने की वार  चल गया ख़ंजर काग़ज़ पर उर ने जो उगली उद्गार । परिमिति--सीमा       भीति--भय,डर                                         क्रमशः-- जब-जब सांप-सपोलों के,फन हमको फुफकारेंगे ताल ठोंककर कहते जी,हम मौत के घाट उतारेंगे , कबतक मलते रहेंगे हाथ वो घात के पांव पसारेंगे दूध पिलाया ठर्रा तो जूतमपैजारम से भूत उतारेंगे , क्या समझे हो मरदूदों जो जी में आएगा बक दोगे अभिव्यक्ति की आजादी पे  थोबड़ा तोड़ भोथारेंगे , संपोलों शरण में रहने वालों ग़र ऐसे आँख तरेरोगे  ज़रा ना होगी देर आँखों से आग उगल भक्ष डारेंगे  , अगर शहीदों की परिभाषा पड़ी तुम्हें समझानी तो तत्काल जन्नत के रस्ते का सरजाम अनेक संवारेंगे , अपने ही देश से कर...

क्षणिकाएँ

          क्षणिकाएँ  हर्षित मन से है करना अभिनन्दन  नवल वर्ष पग धर रहा है देहरी पर दो हजार इक्कीस ने खींची रंगोली द्वारे वंदनवार सुमन सजा मही पर।  हृदय में लहरों का नर्तन प्यास हलक तक बनी रही कश्ती खाती रही हिचकोले मौज़ों की माँझी से ठनी रही आस की नैया ले तूफानों से आस्था की वल्गा थाम टकराई क़िस्मत मँझधार ले डूबी कश्ती   प्रभु तुझे तनिक तरस ना आई , जब घर में आग लगानी थी कान सटे थे लगी दीवारों के उस घर की हालत कैसी है कोई थाह न लेता बेचारों के ताक-झाँक ना कोई हलचल अब ना कोई हरक़त गलियारों के बहुत कुछ मिला पर सुकूं ना मिला ख़्वाहिशों की लम्बी कतारों के आगे कब होंगी ख़तम ज़िन्दगी की जरूरतें जिए जी भर उमर कहाँ ख़वाबों के आगे , दर्द घुल बह ना जाये कहीं प्यार का  इसलिए आँखों का पानी ना बहने दिया क़तरा-क़तरा मोहब्बत की निशानी समझ  पलकों की पनाहों में ऐ फ़रामोश रहने दिया नयनों के चंचल चितवन में पढ़ ली,क्या है मन की भाषा अधरों के कम्पन से सुन ली,क्या है अंतर की अभिलाषा क्यूँ पलकें नीची कर जतलाती ...

क्षणिकाएं

           क्षणिकाएं  कहीं तुम भूल ना जाना कमल के फूल का निशां कर्दम में भी  खिलते  देख लौट जाती  है आ ख़िज़ां कमल के जड़,तनें छैले नींव का विस्तार देखो ना फ़ख़्र होता  सुन  नमो नाम  जिसका क़ायल है जहां  । काटनी है सरसठ सालों की कांटों की बाड़ बोई  अर्सों बाद तख़्तो-ताज पर विराजा है खास कोई आटा,दाल,आलू,पेट्रोल की मंहगाई का ग़म नहीं ऊंचा राष्ट्र का हो भाल ये  मन में भाव सबने बोई। हवा है लहर है गदर है शहर में चारों ओर खिलेगा अब कंवल ही यही गली-गली शोर जल रही किसी की है फट रही है किसी की   बदलाव की यही आँधी अब लायेगी नयी भोर। आकांक्षा पूरा भारत रंगे भगवा भगवा लौटकर फिर न आयेगा ये दिन दुबारा ये गुलशन हमारा ये बागवां भी हमारा हर चीज पर है बस हक़ हमारा हमारा । रब करे उनके जीवन में ना आये सवेरा भगवा रंग से जिनको शिकायत बहुत है जिनके ज़ेहन में हिन्द लिए नफ़रत का डेरा वो जाएँ वहाँ जहाँ की करते वकालत बहुत हैं। अभी तो हुए हैं जुम्मा-जुम्मा चार दिन क्यों मोदी से सवाल...

" अम्बेडकर का संविधान बदल देखिए "

        आरक्षण पर कविता           सरकार से निवेदन   हो चुकी है मियाद ख़तम दख़ल दीजिए जनता की अरज पर भी अमल कीजिए नोटबंदी जीएसटी के  मानिन्द माननीय क़मर कस कर और इक करम कीजिए  आरक्षण के कोढ़ों से हो मुक्त देश मेरा इस दीमक से हो रहा खोखला देश तेरा मेहनतकश नस्लों पर भी रहम कीजिए हो चुकी है मियाद ख़तम दख़ल दीजिए । आरक्षण के हवनकुंड चढ़तीं प्रतिभायें आर्थिक आधार पर हों चयन प्रक्रियायें इस नई मुहिम को अब सफल कीजिए हो चुकी है मियाद ख़तम दख़ल दीजिए । तपती योग्यतायें इस मियादी बुखार में झुलसें बुद्धिजीवी आरक्षण के अंगार में महोदय इलाज़ का शीघ्र पहल कीजिए हो चुकी है मियाद ख़तम दख़ल दीजिए । बढ़ते अपराध क्यों परत तक तो जाईए आरक्षण हटा कर एक बार आजमाईए ऐसी महामारी का अबिलम्ब हल ढूंढिए हो चुकी है मियाद ख़तम दख़ल दीजिए । प्रतिभावों संग होता ये अत्याचार रोकिए हौसलों का पर ना कतर कर के फेंकिए अंबेडकर क...

'' अभिनन्दन तेरा साल नवागत ''

    '' अभिनन्दन तेरा साल नवागत '' नई ऊर्जा लेकर नव वर्ष की आई है नई सुबह मन है पुलकित नई नेमतें ले आई है नई सुबह । नई उमंगें नई तरंगें लेकर आया साल नया नई हिलोरें लें मन में अंगड़ाई आया साल नया कर के इक युग का अन्त आया साल नया बीते साल ने की मेहरबानी भेज कर साल नया । फांस जो कुछ भी है बीते युग की दिल में  सूनें,सुनाएँ दिलों की सुलझाएं आया साल नया इक दूजे को दिल में बसाएँ और बसें हम करें भूले विसरों को याद चलो आया साल नया । चाहे जैसे गुजरा पर गुजरा पिछला वर्ष  फिर ना देहरी दहशत लांघे आया साल नया नए उछाह से नवल वर्ष में हो नव उत्कर्ष  धवल प्रवाह से नव पर्व मनाएं आया साल नया । अनसुलझी सुलझााएं पहेली नई पहल से   हर्ष आह्लाद से करें अभिनंदन आया साल नया नव वर्ष के शुभागमन में हो नव आयोजन हो नव वर्ष का मंगल सूर्योदय आया साल नया । बीते वर्ष के अवसान तले करें दफ़न हम क्रोध,अहं,द्वेष नई भावना भरें आया साल नया नव वर्ष में फूटे नेह से नव प्रेम का अंकु...

ख़िजाँ में फूल खिले ऐसा किया है दंगा

ख़िजाँ में फूल खिले ऐसा किया है दंगा सबके साथ सबके विकास का सुर में सुर मिला साथ चलने का न खाऊँगा न किसी को खाने दूँगा इसी तर्ज़ पर आगे बढ़ते रहने का , इक देशभक़्त ने वीणा उठा लिया है  समूचा भारतवर्ष बदलने का जन-जन से आह्वान किया है संग-संग क़दम मिलाकर चलने का , दृढ़ संकल्प है उसने ठान लिया घर-घर नया सवेरा लाने को मन को ज़िद पर अड़ा लिया है घना अँधियारा दूर भगाने को  , वर्षों से कोने-कोने विष जो वातावरण में घुला हुआ था जिन संग हवाओं का दल भी खूब आकण्ठों डूबा हुआ था , इक देशभक्त फ़कीर दीवाना इन विषधरों से चला है टकराने इरादों में परिवर्तन का निश्चय ले देशद्रोही,गद्दारों को समूल मिटाने उलझा चल रहा काँटों से दामन काँटे भी पग उसके चूमने लगे हैं सत्तर सालों का मंज़र देखे नयन नये भारत का सपने बुनने लगे हैं , क़द्रदान अनेकों इस सच्चे हीरे के बड़े-बड़े धुरंधर हाथ मिलाने लगे हैं उसके हर फ़ैसले की कर सराहना देश के हर नागरिक मुस्काने लगे हैं , इक स्वप्न है उसने दृढ़ता से दुहराया  जड़ से समूल भ्रष्टाचार मिटाने क...

नज़्म ' जब से तोड़ा रिश्ता उससे हर ताल्लुक का '

जब से तोड़ा रिश्ता उससे हर ताल्लुक का याद कभी आये ना वो मेरे सपनों में भी सख्ती से दरबान पलकों को   ताक़ीद  कर दी कसम से लौटा दी   नफ़रत की  सूद सहित  पाई-पाई उसे भी ज़िक्र कभी छेड़ें हवाएं भी ना ताकीद कर दी कसम से जब से तोड़ा हर रिश्ता उससे ताल्लुक का खुद को  तन्हाई, गम ,उदासी से फ़ारिग कर ली कसम से मुद्दतों बाद मिला सुकून मेरी रूह को दिल की विरां महफ़िल फिर गुलजार कर ली कसम से कहांँ थी काबिल ही वो मेरे मिज़ाज़ के सच में   किस सांचे में ढाला था उसको ख़ुदा ने कसम से ।                                                            अगर ठान लो लक्ष्य हासिल है करना घूंट इंतजार का होता कड़वा बहुत है इंतजार इक दिन दिखाएगी मंजिल तुम्हारी । माना सफ़र इतना आसां नहीं है मगर राह तकती है मंजिल तुम्हारी अगर ठान लो लक्ष्य हासिल है करना मिलके रहेगी हर सूरत में मंजिल तुम्हारी कर्म और श्रम पे अपने ग़र है विश्वास इ...

समंदर पर कविता , ख़ारे प्रवृत्ति का स्वभाव क्यों बदल ना सके

समंदर पर कविता  ख़ारे प्रवृत्ति का स्वभाव क्यों बदल ना सके साहिल से टकरा मुड़ जाना शगल बस तेरा ऐ समंदर ये शरारत तुम्हारी अच्छी नहीं । रेत पर जो बनाए थे सपनों के घरौंदे चल दिए लीलकर तुम बदी की तरह ऊँची लहरों का रखो पास अपने गुमां बह सकते नहीं तुम जब नदी की तरह। कंठ तर कर सकते नहीं जब तुम नीर से जल के महानद में डूबे आकंठ किस काम के स्वाती की इक बूंद को सीप तरसा करे इतने विशाल होकर भी तुम किस काम के। आचमन भी जिस जल का दुष्कर लगे जिससे अभिषेक शिवालय का हो ना सके तेरी बादशाहत बस कायम लवण के लिए ख़ारे प्रवृत्ति का स्वभाव क्यों बदल ना सके । राज क्या है तुम्हारे विस्तृत साम्राज्य का जब-तब मचाती हलचल तेरी तह सूनामी है क्यूँ दुनिया की कड़वाहटें समेट तूं आक्रोशित होता या तट पर देख सैलानियों को होता बेकाबू है तूँ । तेरी गहराईयों में इतनी गहन ख़ामोशी क्यों तेरी उत्ताल तरंगों से जी है बहलता सभी का  तूं तो खुद के प्यास की तलब बुझा पाता नहीं पर शेर,ग़ज़ल,कविता तुझी से संवरता सभी का । देखा उगते सूरज...

आत्मविश्वास सबसे बड़ी ताक़त है

 आत्मविश्वास सबसे बड़ी ताक़त है कुछ लोग कांटे बिछाए बहुत चाह की राह में मगर कांटे भी कर लिए मुहब्बत मेरी चाह से , कोशिशें बहुत किये लोग मनोबल तोड़ने की मगर साथ निबाहा मेरा धैर्य ने धैर्य के हाथ से , रस्सी आत्मविश्वासन की थामे रहीं मुरादें मेरी नहीं तो ख़ाब हो जाता धराशाई छल विद्वेष से , चक्रवात आया बहुत,ज़िद मेरी जूझ लहरों से   लाकर खड़ी कर दी कग़ार पे क़श्ती गैरत से , शक़ खुदा को भी ना था क़ाबिलियत पर मेरी बख़्श दी रब ने भी चाहत मेरी क़ाबिलियत से , कबतक मिटायेगा द्वेष से कोई हस्तरेखा  मेरी जल-जल ख़ुद ख़ाक होंगे वैरी मेरी हैसियत से , कैसी-कैसी परिस्थितियों से गुजरी यह ज़िंदगी   मिली तब आकर मुझसे मेरी मन्ज़़िल ख़ुशी से ।                         शैल सिंह   

'' ग़ज़ल '' '' लौटा सको अगर तो लौटा दो वो हसीं वक्त मेरा ''

'' ग़ज़ल '' '' लौटा सको अगर तो लौटा दो वो हसीं वक्त मेरा '' तरस जायेंगे बन्द दरवाजे तेरे कभी दर पे आ तेरे दस्तक ना दूँगी मेरे अहसानों का मोल चुकायेगा क्या तूं तजुर्बों को अब कभी अपने ना शिक़स्त दूँगी अगर लौटा सको तो लौटा दो वो हसीं वक्त मेरा जो लूट गया नाजायज़ किसी को वो हर्गिज़ ना दूंगी। लगी देर ना  तेरी फ़ितरत बदलते  इल्म था ये मगर मैंने वफ़ादारी निभाई चोट खाया है दिल मिला वफ़ा का सिला ये जख़्म होता वदन पर तो देता दहर को दिखाई वक़्त का पहिया भी बदलेगा करवट देखना कभी कैसे किसी को इल्जाम दूँ जब ख़ुद को ही ठग आई। मेरी खामोशियाँ भी मुझे कोसती हैं ये दर्द की ही इन्तेहा कि बयां कर सकूँ ना छींटे किरदार पर भी कत्तई नहीं बर्दाश्त होंगे संग हवाओं के भी चलने का हुनर ला सकूँ ना शख़्सियत नीलाम मेरी क्यों फ़रेबों के बाज़ार में कि नफ़रत भी बेवफ़ाओं से मुकम्मल कर सकूँ ना।                                              श...

बारिश पर कवि " सावन आकुल है जल आचमन के लिए "

बारिश पर कविता  सावन आकुल है जल आचमन के लिए ओढ़ लो ना श्वेत अम्बर घटा की चूनर  वसुधा प्यासी  है दो बूंद जल  के लिए  उमड़-घुमड़ मेघ करते तुम आवारगी  क्यों छलकते  नहीं एक  पल के लिए ।  नभ निहारता है चातक बड़ी आस से  तृषा से उदासी कोकिल का कण्ठ है  जलचर तड़फड़ा  रहे सूखे ताल,तरनी        सुस्त नृत्यांगना शिखावल  का पंख है । कहाँ गड़-गड़ गरज कर चले जाते हो  छल जाये कड़कती-चमकती दामिनी  कभी होता ग़र आसार श्याम मेघ का  मन को हर धार लेते वसन आसमानी । आज फिर आई याद बचपन की घड़ी  वही कागज़ की डोंगी ले आँगन खड़ी  किस विरह में तुम तल्लीन घन बैरागी   वेदना तो बताते बरसा नयन की झड़ी । धरती सिंगार करने को उतावली बहुत  आतुर क्यारी में अन्न अंकुरित होने को  मेघ बिन  लगे फीका मल्हार सावन का  कातर मानुष हैं खिन्न प्रमुदित होने को । पगली पूरवा बहे तप्त,देह तवा सी तपे  तोड़ दो ना बांध अब्र का सभी मेघ जी  आर्द्र कर दो ना...

" दूर नैनों से भी हो जुदा,वो दिल से कब हुए"

दूर नैनों से भी हो जुदा,वो दिल से कब हुए ऐ सिरफिरी हवा ले आ,उनकी कुछ खबर बिखरा ख़ुश्बू ऐसे कि,महक़ जाए ये शहर या हवा दे आ उन्हें मेरा कुछ हाल या पता  सिहर जायें सुन के दास्तां वे ऐसा हो असर, ऐ सिरफिरी हवा ले आ,उनकी कुछ खबर बिखरा ख़ुश्बू ऐसा कि,महक जाए ये शहर।  जा कहो चितचोर से क्या गुजरती दिल पर  कि क़यामत की रातें हैं कैसा घोलतीं ज़हर उनके यादों के भंवर में लेती गोता फिर भी जाने कैसी दरिया मैं  प्यासी रहती हर पहर , ऐ सिरफिरी हवा ले आ,उनकी कुछ खबर बिखरा ख़ुश्बू ऐसा कि,महक जाए ये शहर।  दिल आवारा फिरे  यादों की पगडंडियों पर    कट जाता दिन तो होतीं शामें वीरां अक्सर बुझ जाता दीया पलकों का जल दरीचों पर  दहलीज़ तन्हाई  के  रवि भी ढल ढाता क़हर , ऐ सिरफिरी हवा ले आ,उनकी कुछ खबर बिखरा ख़ुश्बू ऐसा कि,महक जाए ये शहर।  रूतों ने बदले रुख कई,बदलीं तारीखें नई मगर शक्लें इन्तज़ार की नहीं बदलीं नज़र लूटीं कभी खिज़ांयें कभी मौसम बहार का  पर खिज़ां में भ...

" मशरूफ़ रहने दो मुझे मेरी तन्हाई में "

 मशरूफ़ रहने दो मुझे मेरी तन्हाई में    नींद पलकों पर आ-आ मचलती रही ख़ुमारी नैनों में  रक्तिम घुमड़ती रही स्मृतियां उद्वेलित करतीं रहीं रात भर   आँखें जलपात्र उलीचती रहीं रात भर । निमिष भर के लिए ज्यों  पलकें झपीं बेदर्द हो गई विभावरी सुबह हो गया कैद कर ना सके भोर के सपने नयन  रतजगा से भी कर्कश कलह हो गया । होती कर में लेखनी लिख देती व्यथा मन की लहरों पे मूक भाव तिरते रहे होती तकरार अभिलाषा, अनुभूति में यादों के नभ वो परिन्दों सा उड़ते रहे । यादों नया दर्द देने का कर के बहाना छोड़ो तन्हाई के आशियाने पर आना ग़म को आश्वस्त किया  है बड़े यत्न से जाओ कहीं और ये शामियाने लगाना । अनगिनत क़ाफ़िले मेरे पास यादों के  मशरूफ़ रहने दो मुझे मेरी तन्हाई में  बेवक़्त दस्तक़ ना दो दिल के द्वार पर  न झांको अन्तस की अतल गहराई में । मधु यादों की जागीरें उर में सजाकर मन के पिंजरे पर पहरे बिठा है दिया लूट लो ना कहीं दौलत तन्हाईयों का ताक़ीद...

तुम याद बहुत आए

         तुम याद बहुत आए  जब-जब कोकिल ने गान सुनाए और चटक चाँदनी उतरी आँगन  जब-जब इन्द्रधनुष ने रंग बिखेरा  जब-जब आया पतझड़ में सावन           तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए , जब-जब तंज कसे मुझपे जग ने  मन के सन्तापों पर किया प्रहार  माथे की शिकन पर गौर ना कर  दुःखती रेखाओं को दिया झंकार           तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए , उन्मद यौवन की प्यासी आँखों ने कभी था उर में तेरा अक्स उतारा  नाहक़ ही हुई मैं बदनाम निगोड़ी  जब देखके चढ़ा था जग का पारा          तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए , हर के जीवन की होती एक कहानी किसी के छंट जाते बादल बेपरवाह जबकि दूध का धुला यहाँ कोई नहीं जब आईना दिखा दिया गया सलाह          तब-तब प्रियतम तुम याद बहुत आए , जब-जब दामन पर उछला कीच  मेरे  पाप-पुण्यों  पर उठा ...

N.R,R.I. CUTTACK '' इस संस्थान में प्रवास के दौरान लिखी गई मेरी कविता ''

                 N.R,R.I.  CUTTACK   '' इस संस्थान में प्रवास के दौरान लिखी गई मेरी कविता '' जिस धरती पर सूरज अपनी  पहली स्वर्णिम किरण बिखेरे जिस देवभूमि का चरणामृत पी सागर की लहरें भरें हिलोरें जिस रमणा के अंक में बहतीं  नदियों की कल-कल धाराएं जिसके गर्भपिण्ड में कुदरत की अनमोल खनिज सम्पदाएँ , वहीं महानदी का सुरम्य तट जहाँ शोध संस्थान है धान का जहाँ उन्नत नस्लों का होता संवर्धन कृषकों के कल्याण का यहाँ नई नई प्रजातियों का होता विशेषज्ञों द्वारा आविष्कार जो उन्नतशील तक़नीकियों से देते नवीन शोधों को विस्तार , जिस धरती ने महान अशोक के अन्तर्ज्ञान का दीप जलाया जिसकी संस्कृति सभ्यता ने जग में अपना परचम लहराया जहाँ अस्ताचल में इन्द्रधनुषी छटा बिखेरता सूरज सागर में जिस पावन भूमि ओडिशा को कृतज्ञ किया नटवर नागर ने , जिस धरती ने सुभाष चंद्र सा भारत को विराट रतन दिया है जिस धरती पे धर्माचार्यों ने जगन्नाथ धाम का सृजन किया है जिस प्रदेश की मोहक कलाकृतियाँ भी विमोही दृश्य उकेरें जिस तपोभ...

लघु कवितायेँ

             लघु कवितायें  आज मुद्दतों बाद उनसे हुआ सामना उनसे नजरें मिलीं और फिर झुक गईं फिर पहले सी हुई मन में वही गुदगुदी  बंद पंखुड़ियाँ उल्लसित फिर खुल गईं । मुस्कुराऊं,खिलखिलाऊं बाग़ के कलियों सी  तुम ख़ूबसूरत ग़ज़ल,शायरी लिखना मुझ पर काश तुम बनो ज़िस्म मेरा बसे जां तुझमें मेरी उर के कैनवास ऐसे चित्र उकेरना रंग भरकर ।  कब बरसोगी मेघा झमाझम मेरे इस शहर में बारिश की फुहारों में भींगने को जी चाहता है झूम कर बरसो हठ छोड़ो ओ सावन की रानी  मन-वदन बौछारों से सींचने को जी चाहता है । तुम सूरज बनके चमको अग़र तो मैं भी गुनगुनी धूप बन जाऊंगी देख लो प्यार से जो मुझे भर इक नज़र  तो मैं भी ज्योति तेरे नयनों की बन जाऊंगी मुस्कान ग़र बिखेर दो जो मेरे मरू अधरों पर  प्रीत की ओस से तृषित उर तेरा तर कर जाऊंगी ।  मेरे ख़्यालों,ख़्वाबों में ऐसे तो तुम रोज आते हो मगर सामने आने से इतना क्यों हिचकिचाते हो मुझे दरियाफ़्त है हाल उधर भी इधर जैसे ही है मगर ख़ामोशी के आवरण में ये सब छिपाते हो  अधू...

लघु कवितायेँ

           लघु कवितायेँ  उतावली सी बावली आँखें विकल  ना जाने क्या ढूंढतीं हैं चारों तरफ़ ।  तूं ही मेरा श्रृंगार तूं ही मेरे रूप-रंग का नूर तुझी से मेरी दुनिया तूं जीवन का कोहिनूर।   किसपे नज़रें इनायत करें प्यार से कोई दिखता नहीं तुम सा शहर में देखा लम्बे सफ़र में बहुत दूर तक कोई दिखता नहीं तुम सा दहर में । कभी हम भी हसीं थे जवां थे कभी हम मग़र उम्र ने हमसे धोखा किया कभी रस्क करता था अंजन नयन में   मग़र आँखों ने हमसे धोखा किया । नहीं करती उसकी बेरूखी की परवाह मैं पास हजारों इंतजामात हैं दिल बहलाने के उसे पसन्द घर में छितरी खामोशी तन्हाई मेरे मुरादों की ज़िद चलना साथ ज़माने के । यह घर प्रिये तुम्हारा आजा तुझे बुला रहा है बड़ी हसरत से तेरे लिए फ़ानूस सजा रहा है तेरे लिए ही खुला रखा है दिल का दरवाजा  शिद्दत से राह ताके तेरा रास्ता निहार रहा है। मृगनयनी जैसे हों नयन  हिरनी जैसी चाल अनारदाना से दांत हो तोते जैसी सुतवां नाक  कमर कइन सी बलखाती लहराती नागिन से बाल होंठ ...

" हनक बर्दाश्त नहीं होती अब सूरज के हण्टर की "

हनक बर्दाश्त नहीं होती अब सूरज के हण्टर की बेचैन सभी चराचर हैं,चौपाये,बनजारे हैं बदहाल तपन दरका रही धरती उमस से जां है खस्तेहाल सुन धरा का अनुनय भी तरस आता नहीं तुझको दहकना छोड़के सूरज जगत का देखो सुरतेहाल । सुबह से ही चढ़ाए पारा वदन झुलसा रहे हो तुम तर-तर तन से चूवे पसीना अकड़ क्यूँ रहे हो तुम फसलें सभी हुईं चौपट विरां-वीरां निरा खलिहान घटा दुबक बैठी अंबर में हे इंद्रदेव करो कल्याण । सूखा ताल,पोखर,कुंआ गागरें रीती-रीती घर की जल संकट बहुत भारी सुनले बादल जरा हर की बड़ी आशा से नभ ताकता माथे हाथ धरे किसान हनक बर्दाश्त नहीं होती अब सूरज के हण्टर की । मुख म्लान निष्प्राण काया अश्रु से भरे नयन देखो सुनो गुहार तितर की पपिहा की पिऊ रटन देखो मरूधर प्यासी परदेशी रंगरसिया बन कर आजा नन्हीं बूँदों का टिप-टिप  सुना सरगम श्रवण देखो । ना कोयलें कूंकतीं वृक्षों पे,ना नाचते मोर बागों में तरकश ताने कर्कश धूप ना खेलते भौंरे फूलों में पीले पात दरख़्त सूखा  क़हर कुदरत का भीषण बरस श्यामल घटा,गू...

हिंदी नहीं तो हिंदुस्तान कैसा

हिंदी नहीं तो हिंदुस्तान कैसा जब दूर होगी हमसे,हिंदुस्तान से हिंदी फिर अंग्रेज़ी के साथ हमारा क्या होगा गंगा,जमुनी  तहज़ीब संस्कृति, सभ्यता हमारे सनातन,धर्म का आगे क्या होगा , अंग्रेजी को आबाद कर चन्द हिमायती राष्ट्रभाषा का अनादर  कितना  करते हैं हमारी सांस्कृतिक विरासतों के गढ़ में   इसी अशिष्ट लिए उद्धत  इतना  रहते हैं , अंग्रेजों को  तो  खदेड़  दिया इस मुल्क़ से  ठाठ से ये अंग्रेजी  यहाँ  पोषित होती रही ग़फ़लत में हमारी इसी सौतन भाषा संग   सनातनी भाषा पग-पग शोषित होती रही, अंग्रेजी की वक़ालत करने वालों की बस      हिंदुस्तान में  मुश्किल से   मुट्ठी भर तादात  हिंदी करोड़ों भारतीयों के जुबां की रानी   कैसे करें  भला पराई भाषा हम बरदाश्त, रंग-ढंग   ना चाल-चलन,रत्ती भर तहज़ीब  ना छोटे-बड़ों  के  आदर-सम्मान का भाव  ख़ाक़ करेगी बेअदब मुकाबला हिंदी का जिसमें रखते देशप्रेमी   नहीं   जरा ...