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जान भी ले लिया औ ज़िंदा भी ना छोड़ा दिल्लगी ने

इस क़दर जिसको चाहा उसकी मुस्कान की खातिर । हर दर्द ख़ुशी से अपना ली उसकी ख़ुशी की खातिर ।। खोई रही सदा जिसके ख़यालों में ख़ुद को भुलाकर । बदल गया वो गुजरते वक्त के साथ मुझको भुलाकर ।। ना अपना बनाया न रहने दिया किसी के क़ाबिल ही । नफ़रत भी नहीं न रखा हासिल करने के क़ाबिल ही ।। जाने कितना लगेगा वक्त उसे भुलाने की कोशिश में । गंवा रही ज़िन्दगी व्यर्थ दिल बहलाने की कोशिश में ।। हम हम ना रहे दर्द इतना सहा मसखरी में ज़िंदगी ने । जान भी ले लिया औ ज़िंदा भी ना छोड़ा दिल्लगी ने ।। बहुत रोये थे बिछड़ते वक़्त फैसला आसान नहीं था । फासले का ग़म बहुत जुदाई ऐसे होगी भान नहीं था ।। गज़ब का कलाकार निकला वो अपनापन दिखाकर । जिन्दगी बर्बाद किया ख़्वाबों के सब्ज़बाग दिखाकर ।। ज़िंदगी भर की चुभन तरसती रही खुशी को उम्रभर । आखिरी सांस तक किया इंतज़ार आंखों में अब्र भर ।। अब्र-- बादल,घटा शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

जो ज़ख्म दिया तूने वो मवाद लिए फिरते हैं

इतनी चुप और ख़ामोश क्यों हूँ कैसे बताऊं  दिल के टूटने की आवाज़ किसको दिखाऊं  हंसी की वजह जो थे हो गए किसी और के  वो खुश है भींगी ऑंखें मेरी क्यों कैसे बताऊं निज को खो दिया जिसको पाने की खातिर  वही निकला बेवफ़ा दिल को कैसे समझाऊं । खुली ऑंखों में पले ख़्वाब परिहास करते हैं  होंठों पर मुस्कान का लिबास डाले फिरते हैं  कौन समझे मुस्कुराहटों में छिपे दर्द का मर्म  तुम नहीं साथ मगर एहसास  लिए फिरते हैं  बेइंतहा दीवानगी की मिली ये सजा वफ़ा में  जो ज़ख्म दिया तूने वो मवाद लिए फिरते हैं । कितने बेखबर तुम हो मेरे दिल के तूफ़ान से  फासले कर लिये मिल के किसी अनजान से  किस दौलतमंद ने खरीद लिया है ज़मीर तेरा  नासमझ जान भी न पाई मैं क्या तदबीर तेरा जबसे तेरी याद में मैंने भी तड़पना क्या छोड़ा तबसे इस बेवकूफ़ दिल ने धड़कना ही छोड़ा । तदबीर--योजना, युक्ति  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित