मन के द्वारे लगा सांकल सारी दुनिया
मन के द्वारे लगा सांकल सारी दुनिया हँसी के फौव्वारे ठहाकों की दुनिया कहाँ खोई जाने चौपालों की दुनिया , ठहर सी गई आ कहाँ ज़िन्दगी ये मन के द्वारे सांकल लगा सारी दुनिया , गुड्डे-गुड़ियों का खेल बन्ना-बन्नी के गीत थाप ढोलक के नाचती नज़ारों की दुनिया , त्योहारों की रौनक वो गँवईं का मेला लकठा,जलेबी,फुलौड़ी,गुब्बारों की दुनिया , चवन्नी,अठन्नी में सारे ख़ुशी के सामान ख़रीद सकती कहाँ अब दौलत की दुनिया , गिल्ली-डंडा,कबड्डी,ताश की वो दोपहरी खेत-खलिहान,बगिया चहकती वो दुनिया , नेट,मोबाईल चाण्डालिन टैब चुड़ैल टी.वी ने चट कर दी सामाजिक समरसता की दुनिया । लकठा-बेसन का बना हुआ गुड़ में पगा शैल सिंह