संदेश

सितंबर 28, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मन के द्वारे लगा सांकल सारी दुनिया

मन के द्वारे लगा सांकल सारी दुनिया हँसी के फौव्वारे ठहाकों की दुनिया कहाँ खोई जाने चौपालों की दुनिया , ठहर सी गई आ कहाँ ज़िन्दगी ये मन के द्वारे सांकल लगा सारी दुनिया , गुड्डे-गुड़ियों का खेल बन्ना-बन्नी के गीत थाप ढोलक के नाचती नज़ारों की दुनिया , त्योहारों की रौनक वो गँवईं का मेला लकठा,जलेबी,फुलौड़ी,गुब्बारों की दुनिया , चवन्नी,अठन्नी में सारे ख़ुशी के सामान  ख़रीद सकती कहाँ अब दौलत की दुनिया , गिल्ली-डंडा,कबड्डी,ताश की वो दोपहरी खेत-खलिहान,बगिया चहकती वो दुनिया , नेट,मोबाईल चाण्डालिन टैब चुड़ैल टी.वी ने चट कर दी सामाजिक समरसता की दुनिया । लकठा-बेसन का बना हुआ गुड़ में पगा                                                           शैल सिंह

गिर्दाब में है नैया

गिर्दाब में है नैया दर-दर भटक रही अर्से से आसेबों से बचा ले कहाँ है मेरी मंज़िल,मंज़िल से खुद मिला दे , जिस चीज की तलाश में पागल बनी हूँ फिरती चुपके से आके फूल वो आँचल में खुद गिरा दे , लड़खड़ाती आस ,वक़्त के गिरदाब में है नैया बुझती हुई उम्मीदों के पलक दीप खुद जला दे , पड़ गए हैं आबले अब तो धैर्य के भी पाँव में अज़्मे-सफ़र में रब अमां के ग़ुंचे खुद खिला दे , ना असास मांगती हूँ ना शम्सो-क़मर ही माँगा नवाज़िशों से ख़ुदा किश्ते-दिल को खुद सजा दे , आशाओं की दहलीज़ पर शिकस्त बस है खाई अब किस दर पे जाऊँ ले कांसा तूं ही खुद बता दे , साईल बना दिया है कहाँ-कहाँ ना झख है मारा बेताबी-ए-एहसास,बेदर्द दुनिया को ख़ुद दिखा दे , नकारते हैं वह भी जो नहीं कहीं से मेरे क़ाबिल दबा कहाँ तक़दीर का पुलिंदा सुराग़ खुद बता दे , मौसम के साथ-साथ उम्र खिसक रही पल-पल तक़ाज़े का राग मेरे,अंदाज़ के साज़ खुद सुना दे । आसेबों -भटकन , गिरदाब -भंवर , आबले-छाले अज़्मे-सफ़र--अभिलाषा,यात्रा ,  अमां -संतुष्टि असास...