शीशे सा टूट बिखर नहीं जाऊं कहीं
मेरा दर्द नज़र ना आए किसी को मुस्कान अधरों पे बिछाये रखती हूॅं । दिल रोये असर ना दिखे किसी को आनन पर सिंगार सजाये रखती हूॅं । जो आंखों में भरा है पानी लबालब कहीं छलक पड़े ना दबाये रखती हूं । शीशे सा टूट बिखर नहीं जाऊं कहीं ख़ुद को दृढ़ सशक्त बनाये रखती हूॅं । शैल सिंह सर्वाधिकार सुरक्षित