संदेश

जनवरी 18, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मुकम्मल वो भी ना होगा किसी का जुदा हो मुझसे

इक ज़माना गुजरा ख़्वाब सा लगता उससे मिलना  पर तरसी निग़ाहों ने मुहब्बत को संजोया भी बहुत ।  मुद्दतों बाद इत्तिफ़ाक़ से वो आया भी तो इस तरह  बड़ी शफ़क़त से गले भी मिला और रोया भी बहुत  जाते-जाते विषाद दे गया अलविदा कह जुदाई का  तो फिर चाहत की चाशनी में क्यों डुबोया भी बहुत । मुक़द्दर ने भी गजब खेल खेला मिला के बिछड़ाया  हमीं से हमको दूर कर अश्क़ों में भिंगोया भी बहुत  गया तो ख़्याल छोड़ गया क्यों मलाल इस बात का  कभी तो एहसास होगा क्या पाकर खोया भी बहुत । मेरा होकर भी ना हुआ वो मेरा अधूरा रहा सफ़र यूं  दिल लगाने का इनाम दर्द दिल में पिरोया भी बहुत  मुकम्मल वो भी ना होगा किसी का मुझसे जुदा हो  खुद को मुझमें छोड़ कब चैन से वो सोया भी बहुत ।   शफ़क़त--ममता, अपनापन  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित