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जनवरी 18, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

लब पे हर वक्त नाम तेरा दिल में बसी तस्वीर तेरी

जो बिन बोले कीं गुफ्त़गू ऑंखों से ऑंखों ने सनम और तुम मुस्कुराये हर ज़ख्म का इलाज़ हो गया है । जब से तुझको नज़र भर कर देखी हैं ऑंखें सनम  आशिकों की तरह आशिकाना मिज़ाज हो गया है इश्क़ में तेरे डूबी जिस्म से रूह में समा गए सनम जमाना कहता दीवानों सा मेरा अंदाज़ हो गया है । लग जायेगी नज़र होगी जब ख़बर जहां को सनम  अब तो दिल भी तेरे इश्क़ का मोहताज हो गया है  इश्क़ में तेरे फनकार बन करने लगी शायरी सनम  मचल उठी लब पे ग़ज़ल मस्ताना साज़ हो गया है । तुम ही तुम सजने लगे ख्यालों ख़्वाबों में ऐ सनम  बदला चाल ढाल रंग ढंग खुद पर नाज़ हो गया है  दिन हसीं रंगीन शामें लगने लगीं आजकल सनम  उड़ने लगी हवा में मैं जबसे तूं सरताज हो गया है । जबसे मिले तुम संवर गई दुनिया निखर गये दिन  लगे धड़कनों की आवाज भी अल्फाज़ हो गया है  हर वक्त लब पे तेरा नाम दिल में बसी तस्वीर तेरी  लगन तुमसे जो लगाई ख़ुदा भी नाराज़ हो गया है । शैल सिंह सर्वाधिकार सुरक्षित 

कुछ शेर

जब भी कुछ छिपाती हूँ लोग कयास लगा लेते हैं  मुस्कुराहट की वजह क्या है अन्दाज़ लगा लेते हैं  काश तुम भी समझ लेते जज़्बात लोगों की तरह  लोग तो अनायास ख़्वाबों की बारात सजा देते हैं ।  शैल सिंह  मुझे कहना नहीं आया समझना तुम नहीं चाहे  कहीं कश्मक़श में दिल धड़कना भूल ना जाए  ना जाने कैसा रिश्ता जुड़ बैठा तुमसे अटूट सा  डर जग से कहीं ना उल्फ़त का राज खुल जाए ‌। शैल सिंह  जबसे ऑंखों में तेरा ख़्वाब सजाने लगी हूँ  जमाना पूछे किसे ऑंखों में बसाने लगी हूँ  ऑंखों में रहते तुम नज़र न लग जाये कहीं  आजकल ऑंखों में काजल लगाने लगी हूँ । शैल सिंह  तुम्हारे ऑंखों की खूबसूरती ने इश्क़ का पाठ पढ़ा दिया  मैं तो वाक़िफ भी ना थी मुहब्बत क्या अल्फ़ाज होता है  ख़ामोशी से अफ़साना तूने धड़कनों को बेधड़क सुनाया  दिल हर लिया इल्म़ नहीं क्या,ऑंखों में जज़्बात होता है । शैल सिंह  किस क़दर बेवफ़ा तूने वार किया दिल पर मुस्कुरा कर  कुचल डाले सारे अरमां किसी गैर की बांहों में समाकर  मैंने तो सब कुछ समर्पित कर दिया वफ़ा की उम्म...

मुकम्मल वो भी ना होगा किसी का जुदा हो मुझसे

इक ज़माना गुजरा ख़्वाब सा लगता उससे मिलना  पर तरसी निग़ाहों ने मुहब्बत को संजोया भी बहुत ।  मुद्दतों बाद इत्तिफ़ाक़ से वो आया भी तो इस तरह  बड़ी शफ़क़त से गले भी मिला और रोया भी बहुत  जाते-जाते विषाद दे गया अलविदा कह जुदाई का  तो फिर चाहत की चाशनी में क्यों डुबोया भी बहुत । मुक़द्दर ने भी गजब खेल खेला मिला के बिछड़ाया  हमीं से हमको दूर कर अश्क़ों में भिंगोया भी बहुत  गया तो ख़्याल छोड़ गया क्यों मलाल इस बात का  कभी तो एहसास होगा क्या पाकर खोया भी बहुत । मेरा होकर भी ना हुआ वो मेरा अधूरा रहा सफ़र यूं  दिल लगाने का इनाम दर्द दिल में पिरोया भी बहुत  मुकम्मल वो भी ना होगा किसी का मुझसे जुदा हो  खुद को मुझमें छोड़ कब चैन से वो सोया भी बहुत ।   शफ़क़त--ममता, अपनापन  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित