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धूँधली सी है परछाईं

धूँधली सी है परछाईं  फिर लौट के आ जा बचपन मेरे अगाध स्नेह,वात्सल्य से नहलाने बाबा चाचा,भईया,अम्मा,बापू के प्यारी थपकी से दुलराने सहलाने , मऊनी ,कुरुई भरकर दाना,भेली बैठ मचान पर गुड्डे,गुड़िया खेली चने,मटर की फलियाँ फाँड़ में भर छिप कोली टिकोरे अमिया तोड़ी , संग आज़ भी धूँधली सी परछाईं , मेले,गांव,गोहार,गोईड़े,कोइड़ारे की सखी,सहेली,बाग़,बगईचा,पोखरा घुघुरी,रस और पट्टी कोल्हुवाड़े की , जी चाहे जी भर रो लूँ फ़फ़क कर ममता के आँचल का छोर ढूंढती स्नेहमयी ममता की मूरत कहाँ तूं  ऑंखें ढूंढतीं अविरल लोर ढूरती, हवा,नदी,करील,बबूल,पलाश से तेरा पता पूछती माँ सभी पहर से माँ शब्द जुबां पर सजा सदा रहेगा साँसों से जब तक नाता जुड़ा रहेगा ,                           शैल सिंह

क्या इसी को कहते वैलेंटाइन

क्या इसी को कहते वैलेंटाइन  मीठा-मीठा दर्द मिला , इश्क चढ़ा परवान , ना कोई जिसकी भाषा , ना कोई जिसकी जुबान , दिल से दिल की आँखों ने , पढ़ लीं दिल की दस्तान , लगे हसीन समां सारा , लगे हसीन जहाँ , लगे सुहानी रात चांदनी , दिन लगे है पंख समान , दिल की लगी का जाने , होता है कैसा गुमां ।                          शैल सिंह

कहानी 'आपके लिए आपका खज़ाना '

                                                      'आपके लिए आपका खज़ाना '      मैं घर छोड़कर जा रही हूँ , अपना और अपने बच्चों का ख़याल रखना . निशा बहुत ही मुलायमियत से यह बात कह कर बिना रोशन जी की तरफ मुख़ातिब हुए डग भरती हुई सर्र से उनके सामने से निकल गई .रोशन जी को इस बात का जरा भी इल्म नहीं हुआ कि निशा कहाँ,क्यों और किसलिए जा रही है,उन्होंने सोचा यह भी रोज की तरह धमकी का एक और अध्याय है जो प्रायः ही सुनने को मिलता है . पेपर पढ़कर आराम से उठे नहा,धोकर पूजा ,पाठ कर ऑफिस के लिए तैयार होने का उपक्रम करने लगे ,वे तैयार होकर ही नाश्ते की टेबल पर आते हैं पर निशा को घर में कहीं नहीं देखकर स्वयं रसोई में जाकर अपनी प्लेट लगाकर ले आये और इत्मीनान से नाश्ता करने लगे ,निशा ने पूरे दिन का खाना बनाकर ढंक दिया था ,त...