संदेश

ख़ुद बेहिसाब रोते अकेले में

कितना हंसाया लोगों को मैंने ख़ुद की हंसी के ठहाकों से  क्या मालूम लोगों को तकिया  तर   किया अश्क़  से रातों में  जिस की राजदां हैं बे-ज़बान  ख़ुद की  तन्हाईयां, परछाईयां  कभी ज़ाहिर किया नहीं ग़म मस्त रही हंसी के ठहाकों में, जो बेशुमार हंसाते  लोगों को  ख़ुद   बेहिसाब   रोते  अकेले में  जो हंस मिटाते   ग़म  औरों का   ख़ुद का ग़म  पीते  अकेले में  काश कोई पढ़ता मस्तानों  के दिल की उदासी के द्वंद भी  जो  छिपा ग़म  के सैलाब   हंसी के नक़ाब में   रोते अकेले में, जो महफ़िलों में दिखाता हुनर गाकर ग़ज़ल गहरे दर्द का ग़ज़ल,  अंजुमन, हुजूम ही लगते  दवा  उसे अपने  मर्ज़ का कितने  दिल के दर्द  भी कराह उठते होंगे ग़ज़ल के हर्फ़ से जब वो  दर्द  ज़ज़्ब कर   सुनाते होंगे  बज़्म में  ग़ज़ल मर्म का, शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

कैफ़ियत भी ना ली ना ही आये लौटकर ही

किस क़दर रूलाया बेवफ़ा ये तेरे ऐतबार ने  नतीजा  ये कि बेक़रार किया तेरे इन्तज़ार ने । एक रूह दो जिस्म हम तो दरम्यां कैसी दूरी  सारे ख़्वाब सारी ख़्वाहिशें ज़ीस्त की अधूरी  अब तो  अपने  यकीं पर भी तरस आता मुझे  आख़िर मुझसे बेवफ़ाई की क्या थी  मजबूरी । रफ़्ता-रफ़्ता टूटी बिखरी छुप-छुप  रोई  मगर  जी को देती रही ढाढस अज़ीयत  में  अक्सर  कैफ़ियत भी ना ली ना ही आये लौटकर ही  मुस्कुराहटों में छुपाती फिरी ग़म के समन्दर । मिटा सकी ना आज तक अधर से नाम तेरा  सजा रखी निग़ाहों में आज तक अक़्स तेरा  कितनी विवश चाहतें हैं वक़्त के सलीब पर  कभी साअत मिले  आना खुला दहलीज़  मेरा । ज़ीस्त---ज़िंदगी, अज़ीयत--तकलीफ़,   कैफ़ियत--हालत ,    साअत---समय या वक़्त  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

मेरी सांसों में तूं रूठकर जुदा सांसों से होना नहीं

सदा आंखें टिकीं देहरी पर  तेरा इन्तज़ार रहता है  बहुत कुछ तुमसे कहना है दिल इज़हार करता है । इक बार ही सही आ जाओ मिलने उसी मोड़ पर  कुछ देर ठहर कर चले जाना चाहे   वहीं छोड़ कर  क़सम मेरी मुझको नहीं रोकूँगी तुम्हें मजबूर  कर  जी लूंगी तेरी बेरुखी को ही तेरा प्यार समझ कर । आंखें रोये भी तो तुझे भूल जाना मेरे वश में नहीं  तुम्हें याद करने से गिले भी मुझे रोक सकते नहीं  मेरी सांसों में तूं रूठकर जुदा सांसों से होना नहीं  भले तूं रूठ जाना रस्म मनाने के  भूल  जाना नहीं । तुझे  कैसे मनाएं   कुछ तो  तरकीबें ही बता देते ग़र  भले ही  गिरवी रखनी पड़ जाती ये ज़िन्दगी अगर  तेरी ख़ुशी लिए अदा करती मोल  ख़ुद को हारकर  कितनी ख़ुशी मिलती तेरा मान जाना  बेकरार कर । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

अभी प्यार की ख़्वाहिशें ज़िंदा हैं इसलिए

तुम तो ठुकरा कर   चल दिये थे दर से मेरे । मैंने हंस कर किया विदा दर्द दिल में लिए  आखिर तेरी ख़ुशी का था सवाल जो यहां  था मलाल मगर खुश रहे तूं हंसी इसलिए । क्या कहें भी दास्तां ज़िन्दगी की किसी से  नाम तेरा न आये  होंठ   सील लिये  इसलिए  ख़ुद ही मरहम लगाती चोटिल ज़ख़्मों पर  अभी प्यार की  ख़्वाहिशें  ज़िंदा हैं  इसलिए । चाहे जो भी ख़ता हुई हो न  ऐसी सज़ा दो  चाहे जितने भी ख़फ़ा फिर वज़ह बता दो  मुझे भूलाने का ख़्याल दिल में लाना नहीं  जाना है जाओ न सिर्फ़ तुम्हारा हूं बता दो । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

तेरे सिवा भी हैं बहुत लोग इस जहां में ओ सितमगर

तुम मिलोगे नहीं ये भी पता कभी ज़िन्दगी में मुझे  फिर भी तेरा  इन्तज़ार इन आंखों को रहता है क्यों  जिन रास्तों पर मिलकर जुदा हुए तुमसे हम कभी  उन रास्तों पर जाकर ये दिल बेक़रार रहता है क्यों । मालूम है कि  तेरे दिल में मेरे लिए   जगह  कोई नहीं  फिर भी तेरे लिए इस  दिल में  प्रेम  मचलता है क्यों   कितना नासमझ, नादां है दिल ये मेरा ओ बाज़ीगर  कि घाव पाकर भी दर्द का तलबगार रहता है क्यों । जबकि हाथ की रेखाओं में नाम तेरा खुदा ही नहीं  तो नयनों में तेरे नाम का खुमार चढ़ा रहता है क्यों  जानती हूॅं जुदा हैं तेरे औ मेरे  मंज़िल की  राहें  मगर  उस मंज़िल पर  चलने को तड़फड़ाता रहता है क्यों ।  विधी कैसी रचे आका भी  तुझे पाना लिखा ही नहीं  दिल पर इस क़दर यादों का अधिकार  रहता है क्यों  कितनी नासमझ धड़कनें हैं मेरी कुछ समझती नहीं  तो  ऐसी खता  दिल  आखिरकार करता रहता है क्यों ।  खुशी दे न सके दर्द देने का मिज़ाज जिस शख्स  की   ऐसी सौ...

मृगतृष्णा खींच ले आई रे कहॉं

खो गया ना जाने कहॉं मेरे गांव का मनोहारी परिदृश्य  ना पहले सी  मिट्टी में ख़ुशबू  रही ना वो पहले सी  रीति । जिस मिट्टी के ज़र्रे ज़र्रे में कुदरत का भरा खजाना था  पीपल की ठंडी छांव तले बचपन का  बीता  जमाना था  नैनों में तिरता अभी तलक हर मौसम का मोहित रूप  रंगों,सांसों में गांव बसा यादों में आंगन की सुहानी धूप । छूट गई खेतों की मेढ़ें,पगडंडी,छूटी बावड़ी,बाग,बगीचे  कहॉं गए वे दिन सुनहरे खाटें  बिछी  नीम गाछ के नीचे  गांव की छोड़ हवेली आये शहर के दो कमरों में बसेरा  ना आंगन दालान कहीं ना धूप लगे,लगे कब हो सवेरा । सूना पड़ा जगत कुएं का सूना दंगल,सूनी पड़ी चौपाल  छूटा गांव का पनघट,मजमा मेले का साले यही मलाल  कैसे भूलें प्राकृतिक आकर्षण या सुबह सांझ अनमोल  यहॉं परदेश में ना  कोई पूछता कुशल,क्षेम प्रेम से बोल । भले आ बस गये शहर में अंदर खालीपन सा लगता है  क्या कभी लौट पायेंगे गांव शहर प्रताड़न सा लगता है  ना गांव सी ताजी हवा की आहट ना कूजन विहंगों का  लोक लुभावन शहर प्रदूषित   मंज़र...

फीका लागे साजन तोरे बिना सोलहो सिंगार

हे बयार तनी दे आवा खबरिया परदेशिया के  झुलसे विरह  तपन में शरीरिया हाल हिया के । महावर, मेंहदी, चूड़ी, बिंदिया, कुंडल कंठहार । फीका  लागे साजन तोरे बिना सोलहो सिंगार  कबले जोगाईं  हया  संकोच  में हियवा  के बात  साँझे भिनुसहरे रास्ता निरखीं बीते नाहीं रात  चित्त धीर नाहीं उचट गई निंदिया अँखिया के  झुलसे विरह तपन में शरीरिया हाल हिया के । जोहत सुदिनवां हईं सवनवों बीतल जात बा  सुलगता करेजवा देखा फगुनवां के आस बा   भादों के रतिया डंसे बरसे नयना से बदरिया  तोहार सुधिया तड़पावे डंक मारेला सेजरिया  कहियाले निहारीं  अइसे हम तोहरा रहिया के  झुलसे विरह तपन में शरीरिया हाल हिया के । सगरी सखियां गवने गईं संग अपने सजन के  निसदिन बटिया  जोहीं बटोही  तोहरे  अवन के  बैरिन कोयलिया कुहुके कस करेजा  मोर  चीरे  केकरा से सनेसा भेजीं कगवो नाहीं बैठे मुंड़ेरे  काहे बेदर्दी भईला बुझला ना हमरे नेहिया के  झुलसे विरह तपन में शरीरिया हाल हिया के । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुर...