चाँद के साथ
चाँद के साथ - जुलाई 14, 2026 दूर मंज़िल बहुत हूँ तनहा डगर में मगर बाँटने मेरी तनहाइयाँ साथ चलता रहा चाँद मेरे सफ़र में । कभी डाले मुख पे घटाओं के घूँघट कभी बादलों के झरोखों से झाँके कभी सुख की लाली का आलम लिए दर्द की माँग भर जाये चुपके से आके । कभी वैरागी मन की पगडंडियों पर तृषित अंजली का अमृत जल पिला के कभी फ़ायदा भोलेपन का उठाता लुकाछिपी करता रहा आते जाते । कभी सोई अनुभूतियों को जगाता कभी थम सा जाता पराजय पे आके कभी झकझोर कर हँसाता गुदगुदाता इक निर्धूम दीया रोशनी की जला के । शैल सिंह सर्वाधिकार सुरक्षित