संदेश

संघर्षों के अग्निपथ चल हौसलों में उड़ान भरना है ।

इक दिन होगी जीत मेरी, पढ़ना ख़बर अखबार में  हारे,टूटे,बिखरे अभी तक है असर का ख़ार मन में  भले गुजर गई उम्र इस जंग में  करना सफ़र बाकी  वक़्त  भले  ख़ामोश यकीं है आयेगी बहार  चमन में । कभी तो मुड़ेगी हवा की  रूख  मेरी भी ओर  देखना  सियासत ने छला जो ज़िद है जुनून हैं विकल्प मेरे  कभी दुश्मनों में भी होगी मेरी ही  शोहरत की चर्चा  बुलंदी की इबारत लिखेंगे आस्मान पर संकल्प मेरे । मेरी काबिलियत   शिकस्त खाई  कूटनीतिक चाल में  संघर्षों के अग्निपथ चल हौसलों में उड़ान भरना है  कितनी भी मुश्किलों के पहरे हों मंजिल की राह में  हठ लक्ष्य को है बेध ना परवाज़ों को आस्मां छूना है । ठोकरों के सबक ही करते मार्गदर्शन कामयाबी का  हार से खेल की शुरुआत होती  प्रतिज्ञा की कुंजी से  बदलेंगे दृष्टिकोण प्रश्नवाचक चिह्न लगाने वालों का  देंगे हर बाजी को मात विलक्षण दक्षता की पूंजी से । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

तेरी ख़ामोशी भी कहती है लफ़्ज़ चाहत की

फड़फड़ाते हैं होंठ मगर कुछ कह नहीं पाते निग़ाहों में छुपे ख़्वाब फ़क़त पढ़ लिये होते हया से झुकी पलकों पे अंकित भावनाएं हैं  वो दिल का दस्तावेज समझ पढ़ लिये होते । कबतक छुपाऊँ दास्ताँ दिल में मुहब्बत की  सोचूँ कुछ भी तेरा ख़्याल आँखों में मँडराये  कहाँ तक दबाऊं जिक्र तेरा लबों पे आने से  जब सांसें ही उल्फ़त का अल्फ़ाज़ बन गायें । परखने में नहीं कच्ची इकतरफा नहीं कहना  दिखा तेरी दीद में भी रूह से रूह का रिश्ता  तेरी ख़ामोशी भी कहती है लफ़्ज़ चाहत की  मेरी ज़िंदगी में आजा ना तुम बनके फ़रिश्ता । फ़क़त---सिर्फ़ या केवल दीद---आंखें शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

शेर

निर्जन निराशा विरानियां तन्हाईयां खालीपऩ  तेरी दी अमानतें,नज़र तुझे लौटाना चाहती हूँ ख़्वाबों की हिफ़ाज़त करना नियन्त्रण में नहीं  इक बार मिलो तो सही कुछ बताना चाहती हूँ । नज़र--तोहफ़ा शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

सुवास बन आ जा प्रिये

दिखा सकी न ताण्डव मैं भीतर के शोर का नख-शिख तक लपेटे रखी चुप्पी की चादर, छुपाये रखी दिल के पर्त में दर्द का ज़ख़ीरा  हंसती मुस्कुराती कोरें पलकों की भींगाकर । वेदना के प्रसाधन से अन्तर का सिंगार कर  मन का धो ली मलाल अश्रुओं के सैलाब से, जिस उर के उद्गार को कर सकी ना उजागर  उसे कर ली आभास धड़कन की आवाज़ से । तराश तेरी तस्वीर कल्पनाओं के तिरपाल पे  प्रायः कर लेती दीदार तूलिका के इमदाद से, समीर के झोंकों सा सुवास बन आ जा प्रिये  तुझे मिल जाऊंगी खड़ी तले तरू पलाश के । रहे वीराना सा मन का गलियारा गवारा नहीं  गुजरे उमर सारी तेरी याद में भी गवारा नहीं, तरस रहे   तेरी आवाज़ को  मुद्दत से  कान मेरे  किसी ने मुझे मेरी प्रिये कह भी पुकारा नहीं ।  इमदाद---मदद  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित

चले गये पंछी कहाँ ना जाने

लिखो लेखनी अनुभूति मेरे मेरी अंतरंग संगिनी बनकर  कैसे तन्हाई का हाथ पकड़  काट रही ज़िंदगी का सफ़र ।  चहुंओर घना पसरा सन्नाटा   सब घर की निस्तब्ध दीवारें  वीरान दिखें बागों के दरख़्त  चले गये पंछी कहाँ ना जाने । चला गया जाने कहां सुहाना  अपने लोगों के साथ का दौर  उन्हीं घड़ियों की सुनहरी यादें  थिरकतीं स्मृतिपटल पर और । लिख तन्हाई की कंबल ओढ़े  गुज़र रही मेरी तन्हा ज़िन्दगी  जिसे भी देखती वही अकेला  करें किससे ठिठोली दिल्लगी । जब भी निकली घर से बाहर  जो भी मिला दिखा तन्हाई में  अलबत्ता मिला दिया स्वयं से  मुझको मुझसे ऐसी तन्हाई ने । किसके संग बैठ जी बहलायें  सभी घर निर्जन सुनसान पड़े  कौन किसे सांत्वना देवे भला  चित्त भी सबके बियाबान पड़े। अकेलेपन के इस रेगिस्तान में  तन्हाई नितान्त मैं मेरी परछाईं  ऐसा ही परिदृश्य दिखा हर घर  बच्चे हुए  दूरस्थ  रह गई तन्हाई । कभी अंगारों सी सुलगाती यह  कभी नागिन सी डंसती तन्हाई  पढ़ मन का अवसाद सीखा दी  तन्हा जीने का हुन...

चाँद के साथ

चाँद के साथ - जुलाई 14, 2026 दूर मंज़िल बहुत हूँ तनहा डगर में मगर बाँटने मेरी तनहाइयाँ  साथ चलता रहा चाँद मेरे सफ़र में । कभी डाले मुख पे घटाओं के घूँघट  कभी बादलों के झरोखों से झाँके  कभी सुख की लाली का आलम लिए  दर्द की माँग भर जाये चुपके से आके । कभी वैरागी मन की पगडंडियों पर तृषित अंजली का अमृत जल पिला के कभी फ़ायदा भोलेपन का उठाता  लुकाछिपी करता रहा आते जाते । कभी सोई अनुभूतियों को जगाता कभी थम सा जाता पराजय पे आके कभी झकझोर कर हँसाता गुदगुदाता इक निर्धूम दीया रोशनी की जला के । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

मेरा अन्तर्द्वन्द

मेरा अन्तर्द्वन्द्व - जुलाई 08, 2026 मैं कौन हूँ क्या नाम है मेरा  अपनी ज़िंदगी पति और बच्चों में सिमटी सम्पूर्ण अस्तित्व अपना गिरवी रखी हुई अमानत के समान  परिवार रूपी रंगमंच पर अद्भुत व्यक्तित्व का मंचन  बेजान,बेस्वाद,बेअसर । निष्ठा और समर्पण का बेताज ख़िताब  अनूठा उपहास ।आख़िर हो तो औरत ही ना । हर पल हर शख़्स से सामंजस्य बिठाने में दिन महीने साल का गुज़रते जाना विषम परिस्थितियों में भी सन्तुलन बनाये रखना । घर की देहरी की संकीर्णता ज़िम्मेदारियों का छलावा  उत्तरदायित्वों के निर्वहन में ढलती उम्र की शाम अरे ! अपने तो लक्ष्य का पैमाना ही बदल गया  ना कोई मंज़िल ना कोई पड़ाव । घुटते देखना अहमियत को सिसकते देखना स्वत्व को, आशावादी दृष्टिकोण का दिशाहीन होना  वास्तविकता के धरातल पर धराशायी होता आत्मविश्वास  कुछ हासिल न कर पाने का मलाल । मक़सद और मज़बूत इरादों का तार-तार मंज़र , दम तोड़ती प्रतिभा आह ! भटकती हुई उम्मीदों की परवरिश के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत की खोज  अपना कोई अनुगामी नहीं सबकी सह गामिनी बन चलती रही  निर्दिष्ट खोह की अतल गहराई में ।...