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अबकी बार होली में

केसर रंग,रंग देना पिया अंग अबकी बार होली में फाग,चैती गाते बजाते मृदंग  अबकी बार होली में । माथे पे रोली गाल गुलाल कोरी चूनर कर देना लाल  धो देना मन का मलाल  अबकी बार होली में । तन भी भींगे मन भी भींगे  आंचल भींगे अंगिया भी भींगे  हरे,नीले,पीले रंग जामुनी डाल अबकी बार होली में । संग तेरे मैं बेसुध नाचूं ऑंखों में प्रीत की पाती बांचूं  कर देना नेह बरसा निहाल अबकी बार होली में । पिया छल से ना रंगना  बरजोरी बल से ना रंगना चलने ना दूंगी तेरी कोई चाल  अबकी बार होली में । होश ना खोना पीकर भंग  संयम का तोड़ना ना प्रतिबंध  रखना लोक लाज का ख्याल अबकी बार होली में । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

पाकर मधुऋतु का उपहार

पाकर मधुऋतु का उपहार आया वसंत का मौसम  उत्सव मना रही प्रकृति  उत्साह उमंग और उल्लास से चित्त वैरागी हो गया हर्षित । कुदरत ने बड़े चाव से  भू-मंडल का किया श्रृंगार  देख अलौकिक छटा वसंत की मगन मन गाये गीत मल्हार । आह्लादित हो ऋतुपति के नेह से  नवयौवना सी इठला रही धरा  मनमोहक लगे किरन भोर की सुन्दर सुखद लगे सुरमई फिज़ा । होश हवास खो बौरा गईं हवाएं   झूम रहा विभोर हो अमलतास हौले-हौले हरिया रहे दरख़्त भगवा रंग में दहक रहा पलाश । चढ़ तरूड़ाई की दहलीज़  मादकता में डूबा रसाल मकरन्द चूस प्रसूनों का मधुकर हो रहा निहाल । इठलाने लगी टहनियां  नव पल्लव का ओढ़ लिबास  नवजीवन पा पतझड़ मुस्काया कलरव कर विहग करें विलास । मलयज का शीतल झोंका पा खिल गयी कली कचनार बहकने लगा दिग् दिगन्त स्निग्ध बहे वसन्ती बयार । वनस्थली सज गयी वधू सी मह-मह महका हरसिंगार  गदराया फसलों का तन    पाकर मधुऋतु का उपहार । आलिंगनबद्ध हुईं लतायें तोड़ कर अहंकार रुआब पोर-पोर वनस्पतियों का खिला कोंपलें पट खोल हुईं रक्ताभ । पतझड़ ने अपना चोला बदला मधुमासी रूप सलोना पाकर...

निपुणता से निभातीं किरदार कल्पनाएँ सारी

तुम्हें हमदर्द समझे मगर ख़ुदग़र्ज़ निकले तुम  मेरे एतबार से छल कर बड़े बेदर्द निकले तुम । क्यूं दिल के दुर्ग के द्वार पे डट संतरी बनकर  खड़े रहते हो तुम दिन रात सिपाही की तरह  करते रहते हो तरोताजा नासूरों को प्रतिदिन गरज क्या तनहाई में सेंध लगाने की बेवजह । तन्हाई की बस्ती में लगा दरबार ख़ामोशी से    अकेले जीने की सीख ली हमने कलाएँ सारी  ख़्यालों के रंगमंच पे सजा हर रोज़ महफ़िलें  निपुणता से निभातीं किरदार कल्पनाएँ सारी । कितनी मिन्नतें की कितनी दी दुहाई वफ़ा की  ज़िन्दगी में आ गया कौन जो मुझपे जफ़ा की  गिला है यही चले जाते दूर रोकती नहीं मैं पर  किसी खलनायिका लिए कहना मैं बेवफ़ा थी । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे

दिल का दरवाजा रोज़ खटखटाया ना करो अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो । तुम्हारी यादों में भूली ज़माना और ख़ुद को तेरे सिवा ना अपनाया अभी तक किसी को  ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे  कितना चाहा तुझे था बता न पाई तुम्हीं को  इस क़दर याद में सिरफिरा बनाया ना करो  अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो । भले ही रह गयी हो अधूरी मेरी चाहत मगर  तूं दूर रह कर भी है मेरे पास हर वक़्त मगर  अधूरा रह कर भी रिश्ता ये खतम नहीं हुआ  दिल को देते सुकूं ढेरों यादों के दरख़्त मगर  मन के मुँडेरों पर चाँद बन के आया ना करो  अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो । कितना समझाते हैं दिल को भूल जाये तुझे तुम मेरी क़िस्मत में थे नहीं बतलाये भी उसे उसने नई दुनिया बसा ली कहा कितनी बार  कहता बढ़ती जाये याद कैसे भूल जायें उसे  मन अतीत की वादियों में भटकाया ना करो  अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

जान भी ले लिया औ ज़िंदा भी ना छोड़ा दिल्लगी ने

इस क़दर जिसको चाहा उसकी मुस्कान की खातिर । हर दर्द ख़ुशी से अपना ली उसकी ख़ुशी की खातिर ।। खोई रही सदा जिसके ख़यालों में ख़ुद को भुलाकर । बदल गया वो गुजरते वक्त के साथ मुझको भुलाकर ।। ना अपना बनाया न रहने दिया किसी के क़ाबिल ही । नफ़रत भी नहीं न रखा हासिल करने के क़ाबिल ही ।। जाने कितना लगेगा वक्त उसे भुलाने की कोशिश में । गंवा रही ज़िन्दगी व्यर्थ दिल बहलाने की कोशिश में ।। हम हम ना रहे दर्द इतना सहा मसखरी में ज़िंदगी ने । जान भी ले लिया औ ज़िंदा भी ना छोड़ा दिल्लगी ने ।। बहुत रोये थे बिछड़ते वक़्त फैसला आसान नहीं था । फासले का ग़म बहुत जुदाई ऐसे होगी भान नहीं था ।। गज़ब का कलाकार निकला वो अपनापन दिखाकर । जिन्दगी बर्बाद किया ख़्वाबों के सब्ज़बाग दिखाकर ।। ज़िंदगी भर की चुभन तरसती रही खुशी को उम्रभर । आखिरी सांस तक किया इंतज़ार आंखों में अब्र भर ।। अब्र-- बादल,घटा शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

जो ज़ख्म दिया तूने वो मवाद लिए फिरते हैं

इतनी चुप और ख़ामोश क्यों हूँ कैसे बताऊं  दिल के टूटने की आवाज़ किसको दिखाऊं  हंसी की वजह जो थे हो गए किसी और के  वो खुश है भींगी ऑंखें मेरी क्यों कैसे बताऊं निज को खो दिया जिसको पाने की खातिर  वही निकला बेवफ़ा दिल को कैसे समझाऊं । खुली ऑंखों में पले ख़्वाब परिहास करते हैं  होंठों पर मुस्कान का लिबास डाले फिरते हैं  कौन समझे मुस्कुराहटों में छिपे दर्द का मर्म  तुम नहीं साथ मगर एहसास  लिए फिरते हैं  बेइंतहा दीवानगी की मिली ये सजा वफ़ा में  जो ज़ख्म दिया तूने वो मवाद लिए फिरते हैं । कितने बेखबर तुम हो मेरे दिल के तूफ़ान से  फासले कर लिये मिल के किसी अनजान से  किस दौलतमंद ने खरीद लिया है ज़मीर तेरा  नासमझ जान भी न पाई मैं क्या तदबीर तेरा जबसे तेरी याद में मैंने भी तड़पना क्या छोड़ा तबसे इस बेवकूफ़ दिल ने धड़कना ही छोड़ा । तदबीर--योजना, युक्ति  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

शीशे सा टूट बिखर नहीं जाऊं कहीं

मेरा दर्द नज़र ना आए किसी को  मुस्कान अधरों पे बिछाये रखती हूॅं । दिल रोये असर ना दिखे किसी को  आनन पर सिंगार सजाये रखती हूॅं । जो आंखों में भरा है पानी लबालब   कहीं छलक पड़े ना दबाये रखती हूं । शीशे सा टूट बिखर नहीं जाऊं कहीं   ख़ुद को दृढ़ सशक्त बनाये रखती हूॅं । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित