संदेश

निस्तब्ध सुरों की वेदना सुन

भले अनुपस्थित हो ऑंखों के अभिलेखों से  पर पल-पल किया सांसों में महसूस  तुझको , मौन संवादों की संपदाएं लिख  विरह गीत में  प्रत्येक पंक्ति-पंक्ति में   किया अनुभूत  तुझको , इसी भ्रम में कि निस्तब्ध सुरों की वेदना सुन  शब्द-शब्द में अपने होने का हो बोध तुझको । निशा की निःशब्दता या दुःखदाई यादें लिखूं  या कान सुनने को आकुल  तेरी आहटें लिखूं , पीर हृदय के लिखूं या मिलन की टीसें  लिखूं या कांति कुम्हला गई जोत हुई धूमिल लिखूं , सूखकर खारिक सा हो  गया बदन विछोह  में    कि चैन दिन में  नही नींद रैन  क्या-क्या लिखूं । ले गये प्राण तन  से  हाल भी पूछा होता जरा  जी कि मर रही विरह में जटिल रोग हो गया , जड़ी-बूटी संजीवनी ही विरह के उपचार की  भेजे होते आख़िरी सांसें चल रहीं बीमार की , नीम-हकीम-वैद्य नब्ज़ धर कहें मर्ज़ गंभीर है  जब कि वियोग यातना में लरज रहा शरीर है । संपदाएं---भंडार,  निस्तब्ध---ख़ामोश खारिक---छुहारा,    जटिल ---पेचीदा लरज---कंपन होना शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्...

मुद्दत से नींद आई नहीं

बहारें भी आ आकर लौट गयीं  तेरा इंतज़ार करते करते, खोया चॉंद से चेहरे का नूर   तेरा इंतज़ार करते करते । ना कोई पैग़ाम ना दिलासा  उम्मीदें कहतीं हैं सब्र कर गुजरती जा रही है ज़िन्दगी तेरा इंतज़ार करते करते, बे-लगाम हो गईं ये ऑंखें थक गईं हार मानतीं नहीं   जिद पर अड़ीं बेसब्र पलकें  तेरा इंतज़ार करते करते । खटखटा कर कुंडिया  हवाएं लौट जातीं चौखट से  दौड़ पड़ती हर आहट पे तेरा इंतज़ार करते करते, इक तेरे दीद की ख़्वाहिश में  मुद्दत से नींद आई नहीं ख़्वाब जल रहे जां निकल रही  तेरा इंतज़ार करते करते । आते ना आते भेज तो देते  हसीं ख़्वाब ऑंखों की दहलीज़ पर  कहीं दर मौत  आ  ना जाए लेने       तेरा इंतज़ार करते करते, अब तो इंतज़ार से भी मुझे  मुहब्बत सी हो गई है  करार दे जा उदास ऑंखों को  इंतज़ार में बेक़रार करते करते । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

खुल कर जियो आज में ज़िन्दगी

भवजाल के जंजाल में ना फंस पिस जाए नौजवानी  छोटी सी ज़िन्दगी है मौज-मस्ती में बिताएं जिंदगानी  चार दिन हैं उम्र के ज़िन्दा-दिली ज़िंदगी के नाम कर  बेफिक्र हो ये ज़िंदगी का सफ़र सुबह-शाम में रवानी ।  मुश्किलें तमाम तो मुसीबतें प्रचुर ज़िंदगी की राह में  जीना तो हर हाल में मुस्कुराना भी  होता हर हाल में  सपनों की दौड़ में गुजरती जायेगी पीछे से ज़िन्दगी  ना सोचा ना किया होगा मिलेगा जो लिखा भाग्य में । कौन ऐसा है जिसके ज़िन्दग़ी की नहीं कोई कहानी  धुवें के छल्ले की तरह उड़ा दें हंस के सारी परेशानी  ज़िन्दगी के तजुर्बात सीखा देते ठोकरों से सावधानी  अपनी मौज में रह सीखें सलीका जीने का आसानी । ख़्वाहिशों के इंतज़ार में ही ना करते रहो  खींचातानी  कहीं आपाधापी उधेड़बुन में ही कट  ना  जाए  जवानी  क्या कल की फ़िक्र  खुल कर जियो आज में ज़िन्दगी  कुछ तो सोचा होगा देने वाले  स्रष्टा  ने हमें ये ज़िन्दग़ी । स्रष्टा---निर्माता शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

कितनी रातें जाग बिताया मैंने

जब निस्तब्ध होती रज नी तो सुनाई देती सदा तुम्हारी  जब नूरानी होती रोशनी तो दिखाई देती छवि तुम्हारी  जब मूंदती आंखें तो आ जाते हो दबे पांव ख़यालों में  जागती रहती तो छीन ले तीं चैन  हरजाई सुधि तुम्हारी । कभी तनहाई में भी नहीं तनहा रहने देतीं हैं यादें तेरी  कभी सुकून से भी तो नहीं सोने देतीं बावरी यादें तेरी  जिन ऑंखों को होती थी कभी ढेरों शिकायत  नींद से  वही हो गईं  हैं ओझल  तेरी  यादों से कुपित  हो  दीद से  । दुनिया को अनदेखा कर मन   में बस तुझे बसाया  मैंने  निशि दिन ऑंजन के जैसे ऑंखों  में  तुझे सजाया  मैंने  कहीं टूट ना जाए दिल आईने सा तेरी दी अज़ीयत से  तुझे पता कि  तारे गिन कितनी  रातें जाग  बिताया मैंने । कुछ छोड़ गये मुझमें कुछ ले गए मेरे भी मन का तुम मखमली सेज पर चिनगारी छोड़ गये तड़पन का तुम  ऐ मन के मुसाफ़िर लफ़्ज़ों से खेल रहीं उंगलियां मेरी  कब आओगे राह निरखतीं बेकल हो  ये पुतलियां मेरी । दीद---आंखें,   अज़ीयत---पीड़ा शैल सिं...

ख़ुद बेहिसाब रोते अकेले में

कितना हंसाया लोगों को मैंने ख़ुद की हंसी के ठहाकों से  क्या मालूम लोगों को तकिया  तर   किया अश्क़  से रातों में  जिस की राजदां हैं बे-ज़बान  ख़ुद की  तन्हाईयां, परछाईयां  कभी ग़म किया नहीं  ज़ाहिर  मस्त रही हंसी के ठहाकों में, जो बेहिसाब हंसाते  लोगों को  ख़ुद  बेशुमार  रो ते  अकेले में  जो हंस मिटाते   ग़म  औरों का   ख़ुद का ग़म  पीते  अकेले में  काश कोई पढ़े मस्तमौलों  के दिल की उदासी का द्वंद भी  जो  ग़म  का सैलाब  छुपा  हंसी के नक़ाब में रो ते अकेले में, जो महफ़िलों में दिखाता हुनर गाकर ग़ज़ल गहरे दर्द का ग़ज़ल, अंजुमन, हुजूम ही लगती  दवा  उसे अपने  मर्ज़ का कितने  दिल के दर्द  भी कराह उठते होंगे ग़ज़ल के हर्फ़ से जब वो  दर्द  ज़ज़्ब कर   सुनाते होंगे ग़ज़ल  बज़्म में  मर्म का, हुजूम---भीड़ या जन समूह,   बज़्म-- महफ़िल, शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

कैफ़ियत भी ना ली ना ही आये लौटकर ही

किस क़दर रूलाया बेवफ़ा ये तेरे ऐतबार ने  नतीजा  ये कि बेक़रार किया तेरे इन्तज़ार ने । एक रूह दो जिस्म हम तो दरम्यां कैसी दूरी  सारे ख़्वाब सारी ख़्वाहिशें ज़ीस्त की अधूरी  अब तो  अपने  यकीं पर भी तरस आता मुझे  आख़िर मुझसे बेवफ़ाई की क्या थी  मजबूरी । रफ़्ता-रफ़्ता टूटी बिखरी छुप-छुप  रोई  मगर  जी को देती रही ढाढस अज़ीयत  में  अक्सर  कैफ़ियत भी ना ली ना ही आये लौटकर ही  मुस्कुराहटों में छुपाती फिरी ग़म के समन्दर । मिटा सकी ना आज तक अधर से नाम तेरा  सजा रखी निग़ाहों में आज तक अक़्स तेरा  कितनी विवश चाहतें हैं वक़्त के सलीब पर  कभी साअत मिले  आना खुला दहलीज़  मेरा । ज़ीस्त---ज़िंदगी, अज़ीयत--तकलीफ़,   कैफ़ियत--हालत ,    साअत---समय या वक़्त  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

मेरी सांसों में तूं रूठकर जुदा सांसों से होना नहीं

सदा आंखें टिकीं देहरी पर  तेरा इन्तज़ार रहता है  बहुत कुछ तुमसे कहना है दिल इज़हार करता है । इक बार ही सही आ जाओ मिलने उसी मोड़ पर  कुछ देर ठहर कर चले जाना चाहे   वहीं छोड़ कर  क़सम मेरी मुझको नहीं रोकूँगी तुम्हें मजबूर  कर  जी लूंगी तेरी बेरुखी को ही तेरा प्यार समझ कर । आंखें रोये भी तो तुझे भूल जाना मेरे वश में नहीं  तुम्हें याद करने से गिले भी मुझे रोक सकते नहीं  मेरी सांसों में तूं रूठकर जुदा सांसों से होना नहीं  भले तूं रूठ जाना रस्म मनाने के  भूल  जाना नहीं । तुझे  कैसे मनाएं   कुछ तो  तरकीबें ही बता देते ग़र  भले ही  गिरवी रखनी पड़ जाती ये ज़िन्दगी अगर  तेरी ख़ुशी लिए अदा करती मोल  ख़ुद को हारकर  कितनी ख़ुशी मिलती तेरा मान जाना  बेकरार कर । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित