निस्तब्ध सुरों की वेदना सुन
भले अनुपस्थित हो ऑंखों के अभिलेखों से पर पल-पल किया सांसों में महसूस तुझको , मौन संवादों की संपदाएं लिख विरह गीत में प्रत्येक पंक्ति-पंक्ति में किया अनुभूत तुझको , इसी भ्रम में कि निस्तब्ध सुरों की वेदना सुन शब्द-शब्द में अपने होने का हो बोध तुझको । निशा की निःशब्दता या दुःखदाई यादें लिखूं या कान सुनने को आकुल तेरी आहटें लिखूं , पीर हृदय के लिखूं या मिलन की टीसें लिखूं या कांति कुम्हला गई जोत हुई धूमिल लिखूं , सूखकर खारिक सा हो गया बदन विछोह में कि चैन दिन में नही नींद रैन क्या-क्या लिखूं । ले गये प्राण तन से हाल भी पूछा होता जरा जी कि मर रही विरह में जटिल रोग हो गया , जड़ी-बूटी संजीवनी ही विरह के उपचार की भेजे होते आख़िरी सांसें चल रहीं बीमार की , नीम-हकीम-वैद्य नब्ज़ धर कहें मर्ज़ गंभीर है जब कि वियोग यातना में लरज रहा शरीर है । संपदाएं---भंडार, निस्तब्ध---ख़ामोश खारिक---छुहारा, जटिल ---पेचीदा लरज---कंपन होना शैल सिंह सर्वाधिकार सुरक्...