ख़ुद बेहिसाब रोते अकेले में
कितना हंसाया लोगों को मैंने ख़ुद की हंसी के ठहाकों से क्या मालूम लोगों को तकिया तर किया अश्क़ से रातों में जिस की राजदां हैं बे-ज़बान ख़ुद की तन्हाईयां, परछाईयां कभी ज़ाहिर किया नहीं ग़म मस्त रही हंसी के ठहाकों में, जो बेशुमार हंसाते लोगों को ख़ुद बेहिसाब रोते अकेले में जो हंस मिटाते ग़म औरों का ख़ुद का ग़म पीते अकेले में काश कोई पढ़ता मस्तानों के दिल की उदासी के द्वंद भी जो छिपा ग़म के सैलाब हंसी के नक़ाब में रोते अकेले में, जो महफ़िलों में दिखाता हुनर गाकर ग़ज़ल गहरे दर्द का ग़ज़ल, अंजुमन, हुजूम ही लगते दवा उसे अपने मर्ज़ का कितने दिल के दर्द भी कराह उठते होंगे ग़ज़ल के हर्फ़ से जब वो दर्द ज़ज़्ब कर सुनाते होंगे बज़्म में ग़ज़ल मर्म का, शैल सिंह सर्वाधिकार सुरक्षित