संदेश

तेरे सिवा भी हैं बहुत लोग इस जहां में ओ सितमगर

ये भी पता तुम मिलोगे नहीं कभी ज़िन्दगी में मुझे  फिर भी तेरा  इन्तज़ार इन आंखों को रहता है क्यों  जिन रास्तों पर मिलकर जुदा हुए तुमसे हम कभी  उन रास्तों पर जाकर ये दिल बेक़रार रहता है क्यों । मालूम है कि  तेरे दिल में मेरे लिए   जगह  कोई नहीं  फिर भी तेरे लिए इस  दिल में  प्रेम  मचलता है क्यों   कितना नासमझ, नादां है दिल ये मेरा ओ बाज़ीगर  कि घाव पाकर भी दर्द का तलबगार रहता है क्यों । जबकि हाथ की रेखाओं में नाम तेरा खुदा ही नहीं  तो नयनों में तेरे नाम का खुमार चढ़ा रहता है क्यों  जानती हूॅं जुदा हैं तेरे औ मेरे  मंज़िल की  राहें  मगर  उस मंज़िल पर  चलने को तड़फड़ाता रहता है क्यों ।  विधी कैसी रचे आका भी  तुझे पाना लिखा ही नहीं  दिल पर इस क़दर यादों का अधिकार  रहता है क्यों  कितनी नासमझ धड़कनें हैं मेरी कुछ समझती नहीं  तो  ऐसी खता  दिल  आखिरकार करता रहता है क्यों ।  खुशी दे न सके दर्द देने का मिज़ाज जिस शख्स  की   ऐसी सौ...

मृगतृष्णा खींच ले आई रे कहॉं

खो गया ना जाने कहॉं मेरे गांव का मनोहारी परिदृश्य  ना पहले सी  मिट्टी में ख़ुशबू  रही ना वो पहले सी  रीति । जिस मिट्टी के ज़र्रे ज़र्रे में कुदरत का भरा खजाना था  पीपल की ठंडी छांव तले बचपन का  बीता  जमाना था  नैनों में तिरता अभी तलक हर मौसम का मोहित रूप  रंगों,सांसों में गांव बसा यादों में आंगन की सुहानी धूप । छूट गई खेतों की मेढ़ें,पगडंडी,छूटी बावड़ी,बाग,बगीचे  कहॉं गए वे दिन सुनहरे खाटें  बिछी  नीम गाछ के नीचे  गांव की छोड़ हवेली आये शहर के दो कमरों में बसेरा  ना आंगन दालान कहीं ना धूप लगे,लगे कब हो सवेरा । सूना पड़ा जगत कुएं का सूना दंगल,सूनी पड़ी चौपाल  छूटा गांव का पनघट,मजमा मेले का साले यही मलाल  कैसे भूलें प्राकृतिक आकर्षण या सुबह सांझ अनमोल  यहॉं परदेश में ना  कोई पूछता कुशल,क्षेम प्रेम से बोल । भले आ बस गये शहर में अंदर खालीपन सा लगता है  क्या कभी लौट पायेंगे गांव शहर प्रताड़न सा लगता है  ना गांव सी ताजी हवा की आहट ना कूजन विहंगों का  लोक लुभावन शहर प्रदूषित   मंज़र...

फीका लागे साजन तोरे बिना सोलहो सिंगार

हे बयार तनी दे आवा खबरिया परदेशिया के  झुलसे विरह  तपन में शरीरिया हाल हिया के । महावर, मेंहदी, चूड़ी, बिंदिया, कुंडल कंठहार । फीका  लागे साजन तोरे बिना सोलहो सिंगार  कबले जोगाईं  हया  संकोच  में हियवा  के बात  साँझे भिनुसहरे रास्ता निरखीं बीते नाहीं रात  चित्त धीर नाहीं उचट गई निंदिया अँखिया के  झुलसे विरह तपन में शरीरिया हाल हिया के । जोहत सुदिनवां हईं सवनवों बीतल जात बा  सुलगता करेजवा देखा फगुनवां के आस बा   भादों के रतिया डंसे बरसे नयना से बदरिया  तोहार सुधिया तड़पावे डंक मारेला सेजरिया  कहियाले निहारीं  अइसे हम तोहरा रहिया के  झुलसे विरह तपन में शरीरिया हाल हिया के । सगरी सखियां गवने गईं संग अपने सजन के  निसदिन बटिया  जोहीं बटोही  तोहरे  अवन के  बैरिन कोयलिया कुहुके कस करेजा  मोर  चीरे  केकरा से सनेसा भेजीं कगवो नाहीं बैठे मुंड़ेरे  काहे बेदर्दी भईला बुझला ना हमरे नेहिया के  झुलसे विरह तपन में शरीरिया हाल हिया के । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुर...

संघर्षों के अग्निपथ चल हौसलों में उड़ान भरना है ।

इक दिन होगी जीत मेरी, पढ़ना ख़बर अखबार में  हारे,टूटे,बिखरे अभी तक है असर का ख़ार मन में  भले गुजर गई उम्र इस जंग में  करना सफ़र बाकी  वक़्त  भले  ख़ामोश यकीं है आयेगी बहार  चमन में । कभी तो मुड़ेगी हवा की  रूख  मेरी भी ओर  देखना  सियासत ने छला जो ज़िद है जुनून हैं विकल्प मेरे  कभी दुश्मनों में भी होगी मेरी ही  शोहरत की चर्चा  बुलंदी की इबारत लिखेंगे आस्मान पर संकल्प मेरे । मेरी काबिलियत   शिकस्त खाई  कूटनीतिक चाल में  संघर्षों के अग्निपथ चल हौसलों में उड़ान भरना है  कितनी भी मुश्किलों के पहरे हों मंजिल की राह में  हठ लक्ष्य को है बेध ना परवाज़ों को आस्मां छूना है । ठोकरों के सबक ही करते मार्गदर्शन कामयाबी का  हार से खेल की शुरुआत होती  प्रतिज्ञा की कुंजी से  बदलेंगे दृष्टिकोण प्रश्नवाचक चिह्न लगाने वालों का  देंगे हर बाजी को मात विलक्षण दक्षता की पूंजी से । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

तेरी ख़ामोशी भी कहती है लफ़्ज़ चाहत की

फड़फड़ाते हैं होंठ मगर कुछ कह नहीं पाते निग़ाहों में छुपे ख़्वाब फ़क़त पढ़ लिये होते हया से झुकी पलकों पे अंकित भावनाएं हैं  वो दिल का दस्तावेज समझ पढ़ लिये होते । कबतक छुपाऊँ दास्ताँ दिल में मुहब्बत की  सोचूँ कुछ भी तेरा ख़्याल आँखों में मँडराये  कहाँ तक दबाऊं जिक्र तेरा लबों पे आने से  जब सांसें ही उल्फ़त का अल्फ़ाज़ बन गायें । परखने में नहीं कच्ची इकतरफा नहीं कहना  दिखा तेरी दीद में भी रूह से रूह का रिश्ता  तेरी ख़ामोशी भी कहती है लफ़्ज़ चाहत की  मेरी ज़िंदगी में आजा ना तुम बनके फ़रिश्ता । फ़क़त---सिर्फ़ या केवल दीद---आंखें शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

शेर

निर्जन निराशा विरानियां तन्हाईयां खालीपऩ  तेरी दी अमानतें,नज़र तुझे लौटाना चाहती हूँ ख़्वाबों की हिफ़ाज़त करना नियन्त्रण में नहीं  इक बार मिलो तो सही कुछ बताना चाहती हूँ । नज़र--तोहफ़ा शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

सुवास बन आ जा प्रिये

दिखा सकी न ताण्डव मैं भीतर के शोर का नख-शिख तक लपेटे रखी चुप्पी की चादर, छुपाये रखी दिल के पर्त में दर्द का ज़ख़ीरा  हंसती मुस्कुराती कोरें पलकों की भींगाकर । वेदना के प्रसाधन से अन्तर का सिंगार कर  मन का धो ली मलाल अश्रुओं के सैलाब से, जिस उर के उद्गार को कर सकी ना उजागर  उसे कर ली आभास धड़कन की आवाज़ से । तराश तेरी तस्वीर कल्पनाओं के तिरपाल पे  प्रायः कर लेती दीदार तूलिका के इमदाद से, समीर के झोंकों सा सुवास बन आ जा प्रिये  तुझे मिल जाऊंगी खड़ी तले तरू पलाश के । रहे वीराना सा मन का गलियारा गवारा नहीं  गुजरे उमर सारी तेरी याद में भी गवारा नहीं, तरस रहे   तेरी आवाज़ को  मुद्दत से  कान मेरे  किसी ने मुझे मेरी प्रिये कह भी पुकारा नहीं ।  इमदाद---मदद  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित