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लब पे हर वक्त नाम तेरा दिल में बसी तस्वीर तेरी

जो बिन बोले कीं गुफ्त़गू ऑंखों से ऑंखों ने सनम और तुम मुस्कुराये हर ज़ख्म का इलाज़ हो गया है । जब से तुझको नज़र भर कर देखी हैं ऑंखें सनम  आशिकों की तरह आशिकाना मिज़ाज हो गया है इश्क़ में तेरे डूबी जिस्म से रूह में समा गए सनम जमाना कहता दीवानों सा मेरा अंदाज़ हो गया है । लग जायेगी नज़र होगी जब ख़बर जहां को सनम  अब तो दिल भी तेरे इश्क़ का मोहताज हो गया है  इश्क़ में तेरे फनकार बन करने लगी शायरी सनम  मचल उठी लब पे ग़ज़ल मस्ताना साज़ हो गया है । तुम ही तुम सजने लगे ख्यालों ख़्वाबों में ऐ सनम  बदला चाल ढाल रंग ढंग खुद पर नाज़ हो गया है  दिन हसीं रंगीन शामें लगने लगीं आजकल सनम  उड़ने लगी मैं हवा में जबसे तूं सरताज हो गया है । जबसे मिले तुम संवर गई दुनिया निखर गये दिन  लगे धड़कनों की आवाज भी अल्फाज़ हो गया है  हर वक्त लब पे तेरा नाम दिल में बसी तस्वीर तेरी  लगन तुमसे जो लगाई ख़ुदा भी नाराज़ हो गया है । शैल सिंह सर्वाधिकार सुरक्षित 

कुछ शेर

जब भी कुछ छिपाती हूँ लोग कयास लगा लेते हैं  मुस्कुराहट की वजह क्या है अन्दाज़ लगा लेते हैं  काश तुम भी समझ लेते जज़्बात लोगों की तरह  लोग तो अनायास ख़्वाबों की बारात सजा देते हैं ।  शैल सिंह  मुझे कहना नहीं आया समझना तुम नहीं चाहे  कहीं कश्मक़श में दिल धड़कना भूल ना जाए  ना जाने कैसा रिश्ता जुड़ बैठा तुमसे अटूट सा  डर जग से कहीं ना उल्फ़त का राज खुल जाए ‌। शैल सिंह  जबसे ऑंखों में तेरा ख़्वाब सजाने लगी हूँ  जमाना पूछे किसे ऑंखों में बसाने लगी हूँ  ऑंखों में रहते तुम नज़र न लग जाये कहीं  आजकल ऑंखों में काजल लगाने लगी हूँ । शैल सिंह  तुम्हारे ऑंखों की खूबसूरती ने इश्क़ का पाठ पढ़ा दिया  मैं तो वाक़िफ भी ना थी मुहब्बत क्या अल्फ़ाज होता है  ख़ामोशी से अफ़साना तूने धड़कनों को बेधड़क सुनाया  दिल हर लिया इल्म़ नहीं क्या,ऑंखों में जज़्बात होता है । शैल सिंह  किस क़दर बेवफ़ा तूने वार किया दिल पर मुस्कुरा कर  कुचल डाले सारे अरमां किसी गैर की बांहों में समाकर  मैंने तो सब कुछ समर्पित कर दिया वफ़ा की उम्म...

इश्क़ में तेरे फनकार बन करने लगी शायरी सनम

जो बिन बोले गुफ्त़गू कीं ऑंखों से ऑंखों ने सनम  और तुम मुस्कुराये हर ज़ख्म का इलाज़ हो गया है । जब से तुझको नज़र भर कर देखी हैं ऑंखें सनम  आशिकों की तरह आशिकाना मिज़ाज हो गया है   इश्क़ में तेरे डूबी जिस्म से रूह में समा गये सनम  दुनिया कहती है दीवानों सा मेरा अंदाज़ हो गया है । लग जायेगी नज़र होगी जब ख़बर जहां को सनम  अब तो दिल भी तेरे इश्क़ का मोहताज हो गया है  इश्क़ में तेरे फनकार बन करने लगी शायरी सनम  मचल उठी लब पे ग़ज़ल मस्ताना साज़ हो गया है । तुम ही तुम सजने लगे ख्यालों ख़्वाबों में ऐ सनम  बदला रंग ढंग चाल ढाल ख़ुद पर नाज़ हो गया है  दिन हसीं रंगीन शामें लगने लगीं आजकल सनम  उड़ रही मैं हवाओं में जबसे तूं सरताज हो गया है । जबसे मिले तुम संवर गई दुनिया निखर गये दिन  लगे धड़कनों की आवाज़ भी अल्फाज़ हो गया है  हर वक्त लब पे नाम तेरा दिल में बसी तस्वीर तेरी  लगन तुमसे जो लगाई ख़ुदा भी नाराज़ हो गया है । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

मुकम्मल वो भी ना होगा किसी का जुदा हो मुझसे

इक ज़माना गुजरा ख़्वाब सा लगता उससे मिलना  पर तरसी निग़ाहों ने मुहब्बत को संजोया भी बहुत ।  मुद्दतों बाद इत्तिफ़ाक़ से वो आया भी तो इस तरह  बड़ी शफ़क़त से गले भी मिला और रोया भी बहुत  जाते-जाते विषाद दे गया अलविदा कह जुदाई का  तो फिर चाहत की चाशनी में क्यों डुबोया भी बहुत । मुक़द्दर ने भी गजब खेल खेला मिला के बिछड़ाया  हमीं से हमको दूर कर अश्क़ों में भिंगोया भी बहुत  गया तो ख़्याल छोड़ गया क्यों मलाल इस बात का  कभी तो एहसास होगा क्या पाकर खोया भी बहुत । मेरा होकर भी ना हुआ वो मेरा अधूरा रहा सफ़र यूं  दिल लगाने का इनाम दर्द दिल में पिरोया भी बहुत  मुकम्मल वो भी ना होगा किसी का मुझसे जुदा हो  खुद को मुझमें छोड़ कब चैन से वो सोया भी बहुत ।   शफ़क़त--ममता, अपनापन  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित    

अमानत मेरी हो न हो चाहे

चला गया दहर में छोड़कर तन्हा मुझे इस तरह  कभी ना लौटकर आने वाला वो बेखबर बेतरह  कुछ निशां छोड़ गया है पास ऐसा बेतरतीब सा  भूला ना पाऊं चाहकर भी वो चीज बेनजीर सा । मेरी सांसों को महका जातीं तेरे प्यार की खु़श्बू  तेरी हर बात बहका जातीं मैं तेरे इश्क़ में बहकूं  जितनी बार धड़कें धड़कनें जितने श्वांस लेती हूॅं  उतनी बार आते याद तुम तेरी यादों में मैं चहकूं । मेरे ख़्वाबों में बसते हो मुक़द्दर में हो न हो चाहे  लकीरों में तुझे देखूं अमानत मेरी हो न हो चाहे  कश्मक़श में जीती रख तुझे नज़र के समंदर में  उल्फ़त है मुझे तुमसे तुझे इक़रार हो न हो चाहे । फा़सले मिटा नहीं पाये मुहब्बत को रूह से मेरी   रहती फ़िक्र शिद्दत से मुझे रह के भी दूर से तेरी बेपनाह मोहब्बत है नियति में लिखा जुदा होना  पता है बेबसी का क्या कहूॅं है इश्क़ की मजबूरी । बेतरह---असामान्य बेतरतीब---अव्यवस्थित बेनजीर--अनुपम, बेजोड़  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

ऐ मेरे अल्फ़ाज़ों जा कह देना उनसे

करती भला किससे मैं जुदाई का शिकवा  दिखाई अंजुमन में फिर रूबाई का जलवा । लिखने को थी तो बहुत सारी दास्तां मगर  चन्द लफ़्ज़ों की एक ग़ज़ल लिखकर मैंने  सुनाई जो महफ़िल में जोश भरे अंदाज़ में उनका अलहेदा ग़ज़ल पे लहज़ा देखा मैंने । नज़्मों का पैमाना छलकना था बाकी अभी  हो गये बज़्म से ओझल झट नजरें चुराकर  हिज़्र की रात का दर्द था शायरी में पिरोया बिन सुने हुये रुख़्सत सारी फ़िक्रें भुलाकर । सदियों की जुदाई तो दिया उन्हीं ने आखिर  वक्त तन्हा गुजारते क्यों मयखाने में‌ जाकर  गुजर रही ज़िन्दगी बिना उन एक-एक दिन  करते परेशां क्यों मुझे मेरे ख़्वाबों में आकर । बिछड़ने का तहज़ीब भी तो ना आया उन्हें  जुदाई का दर्द बयां करती चेहरे की उदासी ऐ मेरे अल्फ़ाज़ों जा कह देना उनसे,यकीन तोड़ा उन्होंने सुकुन छीना मैंने दिन-रात की । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

स्वर्ण विहान कर विदा हो रात आखिरी

    छंटे मन की उदासी सजे मधुर कल्पना      नव वर्ष में हों साकार कुल मनोकामना      गूंजे दिशाओं में मस्त अमन की बांसुरी      स्वर्ण विहान कर विदा हो रात आखिरी । स्वर्णिम,उज्वल,सुखद हो हम सबका भविष्य  उमंग तरंग भरा नये वर्ष का अनोखा हो दृश्य  मन के मतभेद मिटा भाईचारा सद्भाव बढ़ाना  नव संवत्सर उम्मीदों की नवकिरण बिखराना । नई ताज़गी के साथ शुरुआत हो नये साल की‌   खूबसूरत हो ज़िंदगी का हर पल नये साल की  न कोई मायूस रहे ना चेहरे पे किसी के उदासी  गुजरे वर्ष तुझे अलविदा मुबारक नये साल की । दुआ है सफ़र हो सुहाना सलामत रहें सब लोग  प्रेम सौहार्द बांटते हॅंसते मुस्कुराते रहें सब लोग  हर ख़्वाहिशें हों पूरी मिले कामयाबी हर क्षेत्र में  खुशियां ही खुशियां हो नमी ना हो किसी नेत्र में । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित