तेरी ख़ामोशी भी कहती है लफ़्ज़ चाहत की
फड़फड़ाते हैं होंठ मगर कुछ कह नहीं पाते निग़ाहों में छुपे ख़्वाब फ़क़त पढ़ लिये होते हया से झुकी पलकों पे अंकित भावनाएं हैं वो दिल का दस्तावेज समझ पढ़ लिये होते । कबतक छुपाऊँ दास्ताँ दिल में मुहब्बत की सोचूँ कुछ भी तेरा ख़्याल आँखों में मँडराये कहाँ तक दबाऊं जिक्र तेरा लबों पे आने से जब सांसें ही उल्फ़त का अल्फ़ाज़ बन गायें । परखने में नहीं कच्ची इकतरफा नहीं कहना दिखा तेरी दीद में भी रूह से रूह का रिश्ता तेरी ख़ामोशी भी कहती है लफ़्ज़ चाहत की मेरी ज़िंदगी में आजा ना तुम बनके फ़रिश्ता । फ़क़त---सिर्फ़ या केवल दीद---आंखें शैल सिंह सर्वाधिकार सुरक्षित