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नवंबर 16, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ग़ज़ल

बिना मेरे कैसे वक़्त गुज़ारोगे मुझे छोड़ने के बाद  दिल को क्या कह बहलाओगे मुझे छोड़ने के बाद । तुझ से कौन करेगा मोहब्बत मुझे छोड़ने के बाद  किसी और का न हो पाओगे मुझे छोड़ने के बाद  जो मेरी ऑंखों में अश्क़ों का तोहफ़ा दिया तुमने  तरस जाओगे तुम चाहत को मुझे छोड़ने के बाद । तेरा अपराध उजागर हो जायेगा मुझे छोड़ने के बाद  कैसे तोहमतों को करोगे बर्दाश्त मुझे छोड़ने के बाद  भींगाओगे तन्हाईयों में बालिश याद कर वफ़ाएं मेरी  बस नावाकिफ़ तुझे लोग मिलेंगे मुझे छोड़ने के बाद । मुझ सा किरदार नहीं पाओगे मुझे छोड़ने के बाद  हो जाओगे बदनाम ख़ल्क़ में मुझे छोड़ने के बाद  ठुकराया जिनके लिए दिया दर्द की सजा मुझको  मुझसा हमसफ़र नहीं पाओगे मुझे छोड़ने के बाद । दिल लगाना खता थी मेरी जाना मुझे छोड़ने के बाद  लब से हटा ना पाओगे नाम मेरा मुझे छोड़ने के बाद  जब भी झांकोगे खोल दरीचा दिल के आशियाने का  कोई दूर तलक नजर ना आयेगा मुझे छोड़ने के बाद । ख़ल्क़---दुनिया बालिश---तकिया या मसनद नावाकिफ़---अनजान या अजनबी दरीचा---खिड़की या झरोखा शैल सिंह  स...

शब्दों के मुक्ताहार

तुम ही तुम आये नज़र जब भी निहारा चेहरा आईने में  कैसे झपकायें नैन बैठे तन के नयनपट के शामियाने में  सजा रखा करीने से ख़तों का ख़ज़ाना दर्द की बस्ती में   सहेजती रही ख़्वाबों की वरासत लफ़्ज़ों के तहखाने में । बेजान अरसे से पड़ी थी दिल की जमीं तुम मुस्कुराये और तबियत हरी हो गई प्रेम का हल चला नैन किये उर्वरा जमीं पहले से और भी मुसीबत खड़ी हो गई । निगाहों ने जाने क्या ऐसा पयाम दे दिया  कि वह दिल की सरहद के पार आ गया लगा पैमाइश करने घर की दहलीज़ का आहिस्ता-आहिस्ता मन के द्वार आ गया । मेरे मन समन्दर में तूफ़ान आया कि नहीं  मेरे मुखड़े को उसका मुसल्सल निहारना  पलकों के तट पर बैठ सोचता आठों याम  कैसे यंत्र से है मुहब्बत का महल तराशना । जब जब एहसासों के समन्दर में सैलाब आया ख़्यालों की बस्ती में यादों ने कोलाहल मचाया तूलिका अंकवार दे दी व्याकरण के विस्तार से  वक्ष बेंधती गई वरक़ का शब्दों के मुक्ताहार से । मेरे तन्हाइयों की महफ़िल अब गुलज़ार रहती है  बिखरी ख़्वाबों के असबाबों की भरमार रहती है  ऑंखों की नींद चुरा जिनसे तुम व्यापार करते थे...