बुधवार, 26 दिसंबर 2012

''हिदुत्व वादी धारा के अटल जी''

हिदुत्व वादी धारा के अटल जी

हिन्दू तन-मन हिन्दू धर्म का
सम्मोहन सबमें अब जागा है
देश प्रेम का ज्वार ना जिसमें
वह  कितना बड़ा अभागा है।

मातृ भक्त  वह  धन्य  पुरुष
जो दिव्य  ज्ञान है दान मिला
घट-घट  विष पी अमर हुआ
जग को अमृत का पान पिला । 

किसने  ज्ञान प्रदीप जलाकर
निशा   पंथ  में  किये  उजाले
किसने सोते   से  झिंझोड़कर
भटके मन  को कहा जगा ले। 

किसने माँ की कसम दिलाकर
पापी   पौरुष    को   धिक्कारा
धर्म,सभ्यता,संस्कृति,संस्कार की
अलख   जगाने   को  ललकारा। 

किसमें  सूली   के  पथ चलकर
है   निश्चय   का   प्रचंड  ज्वाल
किसको कहने में शर्म ना आती
हम  हिन्दू  हैं हिन्द  के   लाल। 

जीवन    की   संकरी  गलियों  से
जिसने,इतने अनुभव आज बटोरे
उसकी    पारदर्शिता ,  पराकाष्ठा  
तोलें  आज   पापी   और  छिछोरे। 

किसने  माँ  के  सुख सुहाग में
सब निज  का तर्पण कर डाला
लक्ष्य  साधना के हवन कुंड में
अपना जीवन अर्पण कर डाला। 

तृष्णा छू ना सकी कृष्णा को
राम के संपोषक तुम्हें प्रणाम
रंग-रंग में राग भरा भक्ति का
राष्ट्र   संवर्धक   तुम्हें   प्रणाम। 
                                        शैल सिंह 

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

जानें देश का हित किसमें

         जानें देश का हित किसमें 

मोदी-मोदी बस मोदी का लहर जगा है जाग गई है जनता
अब किस बात की देर भलाई सौंपो मोदी के हाथों में सत्ता,

पंथ,जाति,धर्म का कुष्ठ रोग मिटा,खुला बुद्धि विवेक का पत्ता
'विजय 'चरण चूमता कद्दावर मोदी का देकर विपक्ष को धत्ता,

इन्तज़ार लहरा रहा लाल किले पर हाथों मोदी के तिरंगा लत्ता
चेत लो अब से भी वरना बह जायेगा देश ये जैसे पानी में गत्ता,

दंगा,हिंसा करवाते राजनीतिक विरोधी लगता मोदी पर धब्बा
सांप्रदायिक,नकारात्मक पहलू दर्शाना देख रहा सच्चाई रब्बा,

एक जुट होगा वह दिन दूर नहीं अब जिस दिन देश का जत्था
करिश्माई,स्वच्छ,निराले नेता पर वर्ग विशेष भी टेकेगा मत्था,

बाकि है कसर थोड़ी यदि भ्रमित भाई भी रक्खें सिर पे हत्था
कर विपक्षियों को अनसुना दिल मिला लें जैसे पान में कत्था,

आशंका से घिरे बहकावे में बागीजन अंतर की सुनें अलबत्ता
किसमें खुद नजर आता दूरदर्शिता, स्पष्टता,दृढ़ता,प्रतिबद्धता,

फांस निकालो दिल से हो केवल तुम 'भारतीय' लिखा लो पट्टा
बहुमत से जीताकर देखो भाई इक बार लगा लो ऐसा भी सट्टा,

दल छोड़ सुर विरोधी राग छेड़,हुआ क्या ऐसा प्राप्त केशु बप्पा
इक दिन गुणगान करेगा नरेन्द्र मोदी का धरती का चप्पा-चप्पा ।
                                                                                            

शैल सिंह                                                


शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

गूंज उठता है इक दर्द भरा गीत सुनी वादियों में
जब हर सुबह हर शाम की ख़ामोशी में ढलती है,
उभर उठता है ख्यालों में भी इक मासूम चेहरा
जब सिसक कर दर्द जवां हो करवट बदलती है,
मचल उठता है होठों पे चिर-परिचित सा नाम
दरक कर जब जिंदगी लब से आह निकलती है ।



गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

संजीवनी

        संजीवनी

आज हृदय के द्वार पर हलचल
मैंने नीर भरी आँखों से देखा
पथ पर जाते एक बटोही को
था जो प्रियतम के रूप सरीखा ।

सिमट गया आँचल में आकर
पानी मान सरोवर का फीका
देखो प्रणय के मुझ जैसे मतवाले
मोती सी झर-झर गंगाजल का ।

डाली पर इतराती कलियाँ जो
रवि की किरणों में खिलती हैं
दुःख दर्द किसी के जीवन का
वो मुस्काती अधरों से कहती हैं ।

सुमनों के प्रेमी हे भ्रमरा तुम
उनक अंतर भावों को पढ़ लेना
जो मूक कहानी कहती हों उनके
प्रियतम से दूर देश में कह  देना ।

शब्दों में बिखराकर अन्तर गाथा
शिलाओं की सतह पर लिखती हूँ
पथ जाने वालों बतलाना उनको
सपनीले विश्राम गेह को चलती हूँ ।

निर्भय मृत्यु की मुझ पर महिमा
उसके तुमुल गर्जन से डरती हूँ
पर सांसों के विश्रृंखल पल में भी
मौत को संजीवनी दिया करती हूँ ।
 


मंगलवार, 27 नवंबर 2012

''गीत''

                 गीत

बंजर उर में प्रीत जगे जो गीत बन गए
जब से सच्चे तुम मेरे मनमीत बन गए ।

       उन्मद यौवन था ढला शाम सा
       जिजीविषा कुम्हलाई-कुम्हलाई
       प्रतिफल में केवल छली गयी मैं 
       हर कलि थी आशा की मुरझाई ।

हसरतों की सोई कलियाँ फिर जाग गईं
जब से बांहें तेरी गले का मेरे हार बन गईं ।

      सुख दुःख की लड़ियाँ साथ लिए
      टूटे नातों का मौन अभिशाप लिए
      बढ़ रही अकिंचन थी जीवन पथ
      पराजय का प्रतिक्षण ह्रास लिए।

दुर्गम राहों पर ढेरों पुष्प अवतरित हो गए
जब से उर मृदु गंध तुम उच्छ्वसित कर गए ।

      रच दिया रीति में क्वाँरे  सपने
      अंगों में रस घोल गई पुरवाई
      यौवन की बगिया महक उठी
      रससिक्त पुनः हो गई तरुणाई।

अनुराग तेरे,मेरे अधरों के संगीत बन गए
जब से नगर वीराना तुम नवनीत कर गए ।

      निष्ठुर जग से शिकवा गिला नहीं
      खोने मिलने का सिलसिला यही
      मृदु प्रणय का पाकर नेह निमंत्रण
      पुलक थिरक उठा मन कण-कण ।

इन्द्र धनुषी रंग बिखरा अभिसिक्त हो गए
जब से कपोल गुदना तुम मुखरित कर गए ।

      चमक रहा नभ का हर कोना
      जनम-जनम का तेरा अपना होना
      धड़कन में कुछ-कुछ बोल गयी
      मनभावन मुस्कान है डोल गयी ।

मन उपवन रीता सावन सुरभित हो गए
जब से स्नेह वर्षा मन तुम सिंचित कर गए ।

     मधु बैनी सी गीत सुनाउंगी मैं
     करके सोलह सिंगार मिलूंगी  
     प्रीत सागर से भरी मन मटकी
     काली रातों में चाँदनी छिटकी ।

हाथ छुड़ाकर हार जीवन के जीत बन गए
जब से अमर बन्धन बांध तुम हीत बन गए ।

                                                 ''शैल सिंह''



  

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

'नारी की फुफकार'

    नारी की फुफकार

आज की हर अबला भारत की
अब सबला बनकर जागी है
निरीह दया की मूर्ति ना समझो 
दबी चिन्गारी बन गयी बागी है । 

बहनों उठो पुकारता समय 
पद्मिनी सा जौहर दिखलाओ 
दुर्गावती,लक्ष्मीबाई सरीखी 
समय पर रणचंडी बन जाओ । 

अब गया वक्त देहरी भीतर 
बैठ सिंगार सजाने को 
माथे तिलक लगा मचली 
चूड़ी तलवार उठाने  को । 

तोड़ कर बन्धन पायल का 
और सुहाग की लाली का 
माँ अम्बा की ज्वाला बन 
हाहाकार मचा दे काली का । 

भारत का गौरव मेरा यौवन 
उसकी अस्मिता मेरी जवानी 
शस्य श्यामला मातृभूमि पर 
शत बार तरुणाई मेरी कुर्बानी । 

बाँझ,निपूती मत कह माँ 
कुछ अस्तित्व हमारा मानो 
हम भी ज़िगर के टुकड़े हैं 
हमें सुता नहीं सुत जानो । 

आँधी में भी जला करेगी 
निष्कम्प दीप की ज्योति 
सोते से अब तो जगा दिया 
माँ क्यों क्लान्त हो रोती । 

लिंग की भयावहता ने ललकारा 
चलो माँ का कर्ज़ उतारें 
दुहिता कपूत से लाख भली 
इस कटु मिथ्या की बाती बारें। 

लिप्सा में डूबे मानसिंह तो 
बहुत यहाँ पर आज भी हैं 
वह बहन नहीं जो छलना बन 
छल,जाये यह लाज भी है। 

उठा श्रद्धा के अतल सिन्धु में 
दमन का ज्वार धधकता आज
पृथ्वीराज की जोशीली आँखों का
सोणा सपना बन कर नाच ।  

राणा की बेटी हरगिज़ नहीं 
अब घास की रोटी खायेगी 
आज वही तोतली सयानी 
प्रण के रण में चेतक दौड़ायेगी । 

राष्ट्र हमारा गुजर रहा है 
भीषण षड़यंत्र के नारों से 
आओ भरें चेतना जन-जन में 
सुन्दर भावों के उद्दगारों से । 

जगो जगत की वीर बेटियों 
चुनौतियों से संघर्षिणी बनो 
देश भक्ति का उन्माद जगाकर 
दिशा-दिशा की सम्प्रेषिणी बनो । 

                                          'शैल सिंह' 

 

  


    


रविवार, 11 नवंबर 2012

''मन से मावस की रात भगाएं'

मन से मावस की कारी रात भगाएं

आओ हम सब मिलजुल कर 

तम् के नीचे नेह का दीप जलाएं ,

भरें तमस के आँचल उजियारा

घर पूनम की रात मीत बुलायें ,

स्नेह की ऐसी अलख जगायें

मन से मावस की रात भगाएं ,

इक दूजे के ग़म शूल खींचकर

दुःख-दर्द गले मिल बांटें हम  ,

कण-कण प्रकाश की लौ फेरकर 

शुभ दीवाली सुपर्व मनायें हम ,

करें बात जब लगे संगीत सा

झिलमिल फूटें सितारे फुलझड़ियों सा ,

रोमांच भरा हो  मिलन हमारा

लगे अट्टहास पटाखों की लड़ियों सा ,

समत्व सत्ता का आलोक बिछाकर

घर-घर जाकर मतभेद मिटाकर ,

खील बताशे खा-खाकर दे बधाई

खुशियों की मन में लहर जगाकर ,

बरस-बरस का महान पर्व बन्धु ये 

कड़वाहट का आओ म्लेच्छ भगायें ,

स्नेह की धार से नवकिरण बार 

एकता का जगमग दीप जलायें । 

रविवार, 4 नवंबर 2012

'शबनमीं मोती'

                  शबनमीं मोती

अश्क़ों का जाम पीते उम्र तन्हा गुजार दी 

एहसान आपने जो ग़म मुफ़्त में उधार दी। 

       वफ़ाओं के क़तरे भीगोयेंगे कभी दामन तेरा

       जब चुपके से तोड़ेंगे ज़ब्त ख़यालों का घेरा। 

लाखों इनायत करम आरजूवों प्यार में 

लम्हा-लम्हा काटा सफ़र है बेक़रार में।

         बहुत अख़्तियार था बेज़ुबाँ दर्द पे साथियों 

         उदास टूटे नग़मों की जमीं पे गर्द साथियों। 

मुस्कराती रही दिल जला बेशरम चाँदनी 

मखमली आँचल भिंगोती बेमरम चाँदनी। 

          

रविवार, 16 सितंबर 2012

'हिंदी दिवस पर'

           हम सभी देश वासियों के लिए यह शर्म की बात है कि हिंदी राष्ट्र भाषा होते हुवे भी अपनों के द्वारा अपने ही देश में हिंदी दिवस मनाने का प्रयोजन जगह- जगह पर किया जा रहा है ।अंग्रेजी की गुलाम हिंदी है या हिंदी की गुलाम अंग्रेजी ,इसी पर आधारित मेरी यह रचना पढ़िए और अपनी राय सुझाइए।                       

                            'हिंदी दिवस पर'  

रफ्ता-रफ्ता सेंध लगा अंग्रेजी 
घर में हिन्दी के हुई सयानी  
मेहमाननवाजी में खायी धोखा 
अपने ही घर में हुयी  बेगानी /

जड़ तक दिलो दिमाग पे छाई 
चट कर दी भावों भरा खजाना 
बेअदब हर कोने ठाठ बघारती 
मातृभाषा हिंदी भरती हर्जाना /

ये कितनी ढीठ है घाघ अंग्रेजी 
किस दुनियाँ से परा कर आयी 
हम पर हावी हो ऐसे फिरती 
घर में हिंदी की बनी लुगाई /

वक्त की मार में हो गयी बीमार 
अंग्रेजी महामारी ने पाँव पसारा 
आलम आज़ कि सांसे गिन-गिन 
हिंदी अपनी देहरी करे गुजारा /

मदर्स,टीचर्स,फादर्स,फ्रैंड्स डे 
चलन फलां ढेंका के बढ़-चढ़ के 
इठलाती बोले संग खेले अंग्रेजी 
घर में हिन्दी के सर चढ़-चढ़ के /

हिंदी दिवस का एक निवाला दे 
देश आज़ादी का बिगुल बजाता 
राष्ट्र भाषा का कर घोर अनादर
स्वदेशी हिन्दी को ठगा है जाता /

सुननें में लगता कितना अजीब 
हिंदी दिवस मनाना हिन्दुस्तानी 
दैवी भाषा किस  बिना पर तज 
अंग्रेजियत फैशन मन में ठानी /
                                   शैल सिंह 
       

शनिवार, 1 सितंबर 2012

'भारत का युवा वर्ग जाग्रत हो'

भारत का युवा वर्ग जाग्रत हो


देश के नौजवानों में झंकार और हुँकार पैदा करने के लिए,जिसकी देश को आज सख़्त जरुरत है                                           

ओ युवा सम्राट बता शक्ति का ओ ज्वार कहाँ अब
जिन  हौसलों में  संसार  बदलने के  भाव निहित थे
एक  समय  था  चारित्रिक  चिंतन  से  युवा  वर्ग  ही
नई-नई  घटनाओं  को  क्रियान्वित   किया करते थे ।

प्रचंड तूफान,पराक्रमी मन होता था जिसका
जिस दृढ़ विश्वासी की उर्जा होती थी चक्रवाती
वो तेजस्वी,दुर्बल इतना कमजोर है आज क्यों
जिससे महान हस्तियाँ भी थीं कभी थर्राती ।

प्रायः विश्व को दिशा निर्देशित करने वाला 
आश्चर्य ? स्वयं ही कलुषित  कैसे हो गया है 
युगनायक हिन्दुस्तान का युवा  कर्णधार ही
आज सर्वहारा,दिग्भ्रमित कैसे हो गया है।

राष्ट्रीय  विपन्नता  की जड़ तक  जाकर
प्रश्न का  सार्थक हल  निकालना  होगा
दयनीयता,दुर्बलता,कायरता त्याग कर
भटकाव,चूक की जमीं तलाशना होगा ।

अपार  शक्ति संग्रह का  भण्डार  कहाँ अब
नित आन्दोलित,उद्द्वेलित करती वो धारायें
जो सतत  आलोक  बिखेरा करती थीं भू पर
बौद्धिक चिन्तन में लिप्त वो  नितान्त सभायें ।

भय,भ्रम से पहले वज्र के समान था दम जिसमें
परिस्थितियों का रुख मोड़ दिया करते थे जो 
संगठित युवावर्ग ही एकमात्र घटनाओं का
सर्वत्र ज्वलंत  प्रतिनिधित्व  किया करते थे जो । 

जागो   राष्ट्रहित  के   लिए   विश्व   शांति  के   लिए
जगत आप्लावित करने कालचक्र घूमकर आयेगा
बिखरी इच्छाशक्ति  में पुनः समन्वय  लाकर देखो
विश्वास  है उन्नति  का महान  अवसर  भी  आयेगा ।

दुःख आतंक  से जलता  जन संसार  तुम्हारा
निमग्न निद्रा  में निर्भयता  से कैसे सो  लेते हो
आँखें खोलो  हृदयभेदी करुण आर्तनाद सुनो
दृष्टिपात  करो चौमुख ,देखो  क्या खो  देते हो ।

अखण्ड भारत के हो तुम्हीं  उज्जवल  भविष्य 
तेजस्वी,दृढ़ निश्चयी,विश्वासी, प्रहरी वीर्यवान
तुम्हारे  लौह नसों फौलादी स्नायु युक्त किशोर
सुदृढ़ कंधों पर है देश  का टिका  कमान ।

भटकी पगडंडियों पर  मंजिल नजर नहीं आयेगी
भ्रम भटकन की ऐसी कौन सी विषाक्त गहराई है
सत्यानाश,सर्वनाश के कगार पर खड़ा अकर्मण्य
चेत ले बल ,पुरुषार्थ ,छात्र वीर्य  तेरी ये तरुणाई है ।

प्रलय मचा देंगी ,धधकती आग ना ठंडी होने देना
शक्ति एवं उर्जा का  प्रचण्ड तूफान  उमड़ने देना
वीर नौजवां  जागो राष्ट्र  के और जगाओ  जग को
आज़ादी के मतवालों जैसा फूँक दो उसी मंत्र को ।

जिन भावों  की सरिता सतत प्रवाह  बहा करती थी
पावन स्पर्श  से तृषित  हृदय  तृप्त हुआ  करता था
उन  पावन  भावनावों की  गंगोत्तरी  कैसे सुख गयी
जिसमें डूबा मन आनन्द से सराबोर हुआ करता था ।

सुख-चैन छिना  मुल्क़ का  घातक विष ने
आतंकवाद का दशकों से दंश झेल रहे हैं
विवश खड़े नपुंसक बन  सारा मंजर देखें
दहशतगर्द बेख़ौफ़ खूनी खेल हैं खेल रहे ।

खण्ड-खण्ड  होती एकता  अखंडता राष्ट्र की
पाखण्डी राजनीति के भोथरे टुच्चे औजारों से
वैचारिक  बहसों के अकाल में   स्वप्न नदारद
आरोपों-प्रत्यारोपों , धर्मनिरपेक्षता  के वारों से ।

आतंकी ताबड़तोड़ क़हर ने जनाक्रोश उभार दिया है
विचारक्रांति  की जला  मशालें जन  अभियान चला है
अभिनव समाज  नूतन भारत की  हुई बुलन्द  आवाज
बौखलाया   राष्ट्र का हर युवा आत्ममंथन  ज्ञान चला है ।

गंगा जमुनी तहजीब ऋषि मुनियों की तपोभूमि पर
आँख दिखाने  वालों सुनो कांचें  निकाल   हम लेंगे
अपनी  सरहद  की  हद में  रहना सिख  लो वरना
हदें तोड़ सैलाब उमड़ जायेगा प्रलय मचा हम देंगे ।

हर मज़हब के खुश लोग यहाँ सर्वधर्म,सद्दभाव यहाँ
एकता,विविधता को ग्रहण लगा नजर लगी किसकी
राजनीति की कपट कुचालें सम्प्रदाय का विष फैला
जाति,वर्ग द्वेष में  मुल्क़  बाँटते किसे फ़िकर इसकी ।

निज का महामोह  त्याग अज्ञजनों के  लिए जलें जियें
मानव कल्याण हेतु महानिद्रा को जाग्रत करना होगा
सारी सीमाएं तोड़ हमें महाकाल का महासंकल्प कर
मानव जन्म सफल कर महापरमार्थ पर चलाना होगा ।

हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,ईसाई हम कुटुम्ब एक भवन के
राष्ट्र की मजबूत चिनारों  में महफ़ूज ये फूल चमन के
सुगन्धि,सुरभि,समरसता  कहाँ वातायन से चली गयी
पहचान  भारत की शान अस्मिता  किससे छली गयी ।

समूह शक्ति के  तल पर,नेतृत्व संघशक्ति  के बल पर
निजता निछावर कर यह राष्ट्र समर्थ-सशक्त बनाना है
विचार क्रांति का विराट् स्वरूप,जज्बा जोश जगाना है
मिशन है युग  परिवर्तन लाना  है विश्व को ये दर्शाना है ।

                                                                  'शैल सिंह '

   



     

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

" एकता की ताकत "

          एकता की ताकत 

सीमाएं बंट गयीं तो क्या समीर एक है 
भाव दुःख, दर्द एक  ही रुधिर  एक है 
लहू का  रंग एक , एक पान  क्षीर  की 
एक जैसी  प्यास,आस एक  नीर  की ।

रात दिन हमारे एक  शाम एक  सवेरा 
चाँद तारे सूर्य रोशनी में सबका बसेरा
एक ही  गगन  तले  धरा पर  एक  हम 
फिर क्यों मन में दूरियां तमाम हैं भरम ।

राम ही रहिमन तेरा ईसा ही राम है 
एक ही विधाता  के अनेक  नाम हैं 
एक ही ख़ुदा  के औलाद हम सभी 
एक ही जन्मदाता के संतान हम सभी । 

पुरखे हमारे एक ही सनातनी है जड़ जमीं 
चन्द ग़द्दारों ने बांट दी जाति कौम सरज़मीं 
चाह राह  एक  फिर  क्यों बंट  गये  हैं हम 
किसने दिखाई राह  कि बहक  गये कदम ।

बोली भाषा वेश भिन्न रंग रूप हैं अनेक 
अनेकता में एकता  की हो मिसाल एक 
बनें भविष्य  विश्व का करनी  है साधना 
अटूट सूत्र  में विविध  संस्कृत है बाँधना। 
 
क्यों आन,अभिमान,अहम,शान  के लिये 
ज़मीर  बेचता  ईमान झूठे  नाम के  लिये 
कर्म मान धर्म चल  सत्य न्याय  की डगर 
मिटा तिमिर अज्ञान,ज्ञान ज्योति जलाकर ।

कुटुम्ब ये कबीला किसको दिखाता मेला 
सब छूट जायेगा यहीं जायेगा तूं अकेला 
कल आये या न आये भज नाम राम की 
न जाने  टूट जाये  कब ये डोर  सांस की ।

आवरण में छुपा लाख ले कर्मों का माजरा 
मन के द्वार  खोल खुद  की  झाँक ले जरा 
क्या  देगा तूं  जवाब ख़ुदा  के हिसाब  का 
उम्र भर का ब्यौरा मांगेगा जब वो आपका ।

आये थे  हाथ  खाली ,खाली  ही  जाना है 
माटी  का  मिल  वदन  माटी  में  जाना  है
रख लाज मानवता  की परमार्थ थोड़ा कर
द्वन्द आपसी मिटा नाता मन का जोड़ा कर ।

संगठन की ताकतों से शत्रु को पछाड़ दें
दुश्मन हों पस्त हमसे हम ऐसी दहाड़ दें
मिटायें भ्रष्ट  तन्त्र प्रण  स्वतन्त्र  देश की
हम सबको प्राण प्यारा  गणतन्त्र देश की । 

सर्वाधिकार सुरक्षित 
शैल सिंह 



शनिवार, 11 अगस्त 2012

'देश गान'

देश के नौजवानों के लिए

       देश गान                                                             

आन, बान,अस्मिता लिए लड़ीं लड़ाईयां,
नौनिहालों शौर्य की सुन लो वो कहानियाँ
जय भारती जय वीरभूमि जय
जय भारती जय वीरभूमि जय। 

ललकारी थीं माँएं बहने अपनी आँख के तारों को
सौंपीं,स्वर्नाभूषण,चाँदी,मंगलसूत्र गले के हारों को
स्वाभिमान के समर में ढहा कटुता की दीवारों को
कर में तिलक लगा पकड़ायीं दुधारी तलवारों को
मातृभूमि लिए होम हर कौम ने कर दीं जवानियाँ
नौनिहालों शौर्य की सुन लो वो कहानियाँ
जय भारती जय वीरभूमि जय 
जय भारती जय वीरभूमि जय।  

पराक्रमी मराठे जूझे थे मुगलों के अत्याचारों से
वतन परस्ती का जज़्बा भर मतवाली हूँकारों से
सत्ता छीनकर किया हुक़ूमत गोरी शुरमेदारों  से
चूलें हिला दीं थीं  शूरवीरों ने इंक़लाब के नारों से
शेर शिवाजी राणा प्रताप ने दीं अपनी कुर्बानियाँ
नौनिहालों शौर्य की सुन लो वो कहानियाँ
जय भारती जय वीरभूमि जय 
जय भारती जय वीरभूमि जय।  

मनमानी की थीं अंग्रेजों ने जलियाँ  वाले बाग़ में
हल्दी घाटी में राजपुताना आयुद्ध  था उन्माद में
कूदीं हजारों पद्द्मिनियाँ ज़ौहर होने को आग में
कई मिसालें गौरव की हैं इस  माटी की नाभि में
वफ़ादार चेतक की रण में चौकड़ी कलाबाजियाँ
नौनिहालों शौर्य की सुन लो वो कहानियाँ
जय भारती जय वीरभूमि जय 
जय भारती जय वीरभूमि जय।  

सिर पर बांध तिरंगा सेहरा जांबाज़ी दिखलाई थी
सीने पर जाने कितनी गोली परवानों  ने खाईं थीं
देख दीवानगी वीरों की  उर्वी की छाती थर्राई थी
नयन के तारों की आहुति पर ये आज़ादी पाई थी
खेल रक़्त की होली तोड़ीं परतन्त्रता  की बेड़ियाँ
नौनिहालों शौर्य की सुन लो वो कहानियाँ
जय भारती जय वीरभूमि जय 
जय भारती जय वीरभूमि जय।  

लहर-लहर लहराये केसरिया शान से अभिमान की
स्वाधीनता का महाप्रसाद ये सूरमों के बलिदान की
ऋण तभी चुका पायेगा भारत होठों के मुस्कान की
छाती से लगाकर रखना थाती पुरखों के सम्मान की
चैन की बंशी बजा के सोती आज़ादी चादर तानियाँ
नौनिहालों शौर्य की सुन लो वो कहानियाँ
जय भारती जय वीरभूमि जय 
जय भारती जय वीरभूमि जय।  
                                                                    शैल  सिंह                                                            
 

गुरुवार, 24 मई 2012

गण का अमर दीया

             गण का अमर दीया

कलाएं संस्कृति पूजा ऋचाएं वेद सभ्यता
हिंदवासी की विशेषता अनेकता में एकता
    कोटि-कोटि शत्त नमन शीश में धवल चरण
    माँ भारती का ये चमन गायें जन-गण-मन
हम अनेक अंग हैं अखण्ड इस देश के
स्वेद अर्ध्य के लिए तैयार पुत्र  शेष के
   लहू का एक-एक बूंद मातृभूमि के लिए
   गीत देशभक्ति का गाते रहें इसके लिए। 


महान देवभूमि ये गुमान हमको देश पर
हम  देशवासियों को नाज भाषा,वेश पर
   ध्वज हमारी शान है झुकने न देंगे आन को
    देश की प्रगति लिए कुर्बान देंगे जान को
रणबांकुरों की सरजमीं धुरंधरों की ये धरा
आपदाओं में उतरते हम सतत ही खरा
    बुझ ना सकेगा कभी होशियार आज हम सभी
   जलता रहेगा हर हिया गण का ये अमर दिया।   

रिटायरमेंट के बाद

रिटायरमेंट के बाद-- सोचा था ज़िन्दगी में ठहराव आयेगा  रिटायरमेंट के बाद ऐसा पड़ाव आयेगा  पर लग गया विराम ज़िन्दगी को  अकेलापन,उदासी का चारों...