माटी के रंग
माटी के रंग ये हकीकत है आज़ की , माटी से टूटा है नाता सभी का , सोंधी-सोंधी ख़ुश्बूओं से परे , बनावट के आवरण में वास्तविक गंध को भूल जाना, आज का वातावरण,समाज एक ऐसा मुखौटा बन गया है जैसे गुलदस्ते में सजे फुल सरीखा खिले रहने के बनावटी अंदाज, कैसा मुलम्मा चढ़ा लिया है , खाली उजाड़ होकर भी चेहरे पर , हँसी पर साधनों का खेप डालकर अन्तर के आंदोलन का मातम मनाते हुए, खोखला विद्रूप मन लिए कॉस्मेटिक का मोटा लेप चढ़ा कर , अन्तर में माटी की गंध को सीने से लगाये तड़पना , फलने-फूलने की अभीष्ट चाह अपनी माटी को तलाशती ज़िन्दगी क्या है असल ज़िंदगी की ख़ुशी का मानदण्ड सब कुछ पाकर भी क्या खो दिया है भौतिकता और आधुनिकता के उसूलों में, कितने कृत्रिम हो गए हैं हम कृत्रिमता हमें किस कदर आकर्षित कर रही है , स्थाई रस का अभाव मौलिकता का मटियामेट होना , नैतिकता का पतन होना , कितने नैराश्य और निरंकुश हो गए हैं हम । इतने सारे गैजेट्स , संसाधनों के पालनों में झूलते हुए हंसी को तरसते , समूह की तलाश...