शनिवार, 22 अप्रैल 2023

दो पाट हैं इक नदी के हम

दो पाट हैं इक नदी के हम

जगे तो भी आँखों में
सोये तो भी आँखों में
जर्रे-जर्रे में महफ़िल के   
तन्हाई की पनाहों में ,       

हँसी के फुहारों में       
रोये तो भी आहों में 
चलूँ तो परछाई बन     
संग-संग साथ सायों में ,   

नजर फेरूं जिधर भी
हर पल साथ रहते हो
मुझे तुम छोड़ दो तन्हा
क्यूँ वार्तालाप करते हो ,

मत आ आकर घिरो 
नयन की घटाओं में 
छुप-छुप कर ना बैठो
उर के बिहड़ सरायों में ,

खटकाओ ना सांकल मौन की
ना दो शान्ति पर दस्तक 
बना लूंगी आशियाँ अपना
यादों के उजड़े दयारों में ,

जो गुजरी है वो काफी है
अब ना कोई सौग़ात बाकी है
दो पाट हैं हम इक नदी के 
बस मुसाफिर हैं कगारों में

दर्द से तड़प से मोह हमें
अब तो हो गई है बेइंतहा
ज़िन्दगी के शेष पन्नों को
उड़ाना है मुझे बहारों में ।

शैल सिंह

सोमवार, 17 अप्रैल 2023

पिरो दी हूँ एहसास दिल का अल्फ़ाज़ों में


हजारों ख़्वाहिशें भी ठुकरा दूँगी तेरे लिए
तूं ख़ुश्बू सा बिखर जा साँसों में मेरे लिए ।

ग़र मुकम्मल मुहब्बत का दो तुम आसरा
तुझे दिल में नज़र में अपने बसा लूँगी मैं
माँगकर तुझको मन्नत में हमदम ख़ुदा से
हथेली में नाम की तेरे मेंहदी रचा लूँगी मैं ।

सजाऊँ दिल में ग़ैर का अक़्स आसां नहीं
इस क़दर हूँ गिरफ़्तार तेरी मोहब्बत में मैं
ना गुजरा करो ऐसे यूँ कतराकर बग़ल से 
समझती ख़ुद को रईस तेरी सोहबत में मैं ।

लगे बिन तुम्हारे जहाँ में कोई अपना नहीं 
तेरे हाथों में रहे हाथ मेरा,बस सपना यही
तेरे ईश्क़ की नदी में डूब मर जाना क़ुबूल 
मगर तुझसे बिछड़ कर जीना तमन्ना नहीं ।

जरा दे दो तसल्ली तुम अपना बनाने की
नामंजूर तेरे आगे सारी ख़ुशियाँ जहाँ की
दिल का एहसास पिरो दी हूँ अल्फ़ाज़ों में
करो दिल पे तुम हुकूमत मैं मना कहाँ की ।

अब तक हैं फ़ासले क्यों तेरे मेरे दरमियाँ 
क्या मुझमें कमी है कैसी मुझमें ख़ामियाँ
दिल के दर्पण में नक़्श तेरा जो संवारी हूँ
उसके आगे मुझे फीकी लगे सारी दुनिया ।

सर्वाधिकार सुरक्षित 
शैल सिंह 

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