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अगस्त 18, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

''गोल्डन पेन''

                              ''गोल्डन पेन''  होली का पर्व अब चार-पांच दिन ही रह गया है , इधर बेटे की बोर्ड परीक्षाएं भी चल रही हैं ,अति व्यस्तता के बावजूद भी सोचा होली के उपलक्ष्य में बहुत नहीं तो थोड़ा-थोड़ा ही करके घर की साफ सफाई शुरू कर दूँ ,इन पर्वों के चलते ही अन्दर तक की वार्षिक सफाई हो पाती है ,अन्यथा दैनिक दिनचर्या में तो इतना समय ही नहीं मिल पाता कि लीक से हटकर कुछ और किया जा सके ,और फिर गुझिया ,मठरी ,नमकीन भी तो बनाने हैं जिनको तैयार करने में अच्छी खासी कसरत और मशक्कत करनी पड़ती है। बच्चों की पढ़ाई ,स्कूल के झमेलों से कई बार बिल्कुल फुर्सत नहीं मिलती कि कोने अंतरों तक पहुँचा जा सके.       काफी सोच विचार के बाद सोचा क्यूँ ना आज का अभियान आलमारी से ही शुरू करूँ ,इधर बहुत दिनों से बाहर कहीं आना जाना नहीं हुआ था ,इसलिए आलमारी भी अधिकतर बन्द ही रही। आज जब सफाई के उद्देश्य से अस्त-व्यस्त पड़ी आलमारी को करीने से सुव्यवस...

''शरारती चाँद''

                  ''शरारती चाँद''         मुखड़ा  दिखावे  चाँद  बदरा की ओट से  लुका-छिपी करे ओढ़ी घटा की चदरिया ,      हमें कांहें तड़पावे तरसावे मुस्काई के       रही -रही टीस उठे जांईं जब सेजरिया , हमका रिझाई करे चन्द्रिका से  बतिया  अंखिया मिलावे कभी फेरी ले नज़रिया ,       देखि ई निराला प्रेम करवट कटे रतिया        लोचन से लोर ढुरे जईसे बरसे बदरिया , बलमा अनाड़ी नाहीं बूझे मोरे मन की  निंदिया बेसुध  सोवे तानी के चदरिया ,       हियरा के गूंढ़ बात अब कहीं  केकरा से       तनी अस केहू होत लेत हमरो ख़बरिया।  

एक निवेदन

''एक निवेदन'' ओ माटी के लाल  सात समुन्दर पार ना जाना   दूर देश परदेश में  ढेरों भरा ख़जाना अपनी  बोली भाषा वेश में।  चंद सुखों की खातिर छूटे  ये कुटुम्ब परिवार  शहर पराया अनजान नगर  छोड़ के ना जा ये घर बार।  हमजोली संग मनी रंगरेलियाँ  याद करो बचपन की गलियाँ  गाँव का मेला घर,चौबारा  दीया दीवाली फुलझड़ियाँ।  थाल सजा चन्दन औ रोली  हाथ बंधी रेशम की डोरी  नटखट बहना की प्यारी राखी  कहाँ मृदुल ममता की छाती।  कहाँ बजेगी पायल की रुनझुन  कहाँ सुनोगे चूड़ी की खनखन  चुनर में लिपटी लाज की लाली  कहाँ मिलेगी अनुपम दुल्हन।  होली का हुड़दंग ना होगा  ना झुला सावन की कजरी  रीति रिवाज त्यौहार ना कोई  ना व्यंजन पकवान कढ़ी।  ओ माटी के लाल  सात समुन्दर पार ना जाना दूर देश परदेश में ढेरों भरा ख़जाना अपनी बोली भाषा वेश में।           ...

ये नक़ाब

    ये नक़ाब चलती थी सडकों पे बेनक़ाब     हुस्न ने परदा गिरा दिया        जब याद जमाने ने मुझे           उम्र का दरजा दिला दिया। कैद कर लो हिज़ाब में     शोख अदाएं ये मस्त जवानी        कह -कह कर बुजुर्गों ने मेरे            जिस्म का जर्रा जला दिया। मुड़-मुड़ के देखते थे लोग      जिस गली से कूच करती थी          मेरी बेबसी का ऐ खुदा तूने              अंजाम ये कैसा सिला दिया। इस नालाकश में बताईये ज़नाब      मुस्कुराएँ तो भला हम कैसे          कहाँ से आई ये पागल शवाब             जो हमें परदानशीं बना दिया। रुख पे कैसा लगा ये रुव़ाब    किन अल्फ़ाज़ में कहूँ लोगों        इस बेकसूर हूर को बस           तसब्बुर का आईना बन...

नूतन पीढ़ी

      नूतन पीढ़ी यह  युग  लाया  जाने  दौर है कैसा कि तिनका-तिनका बिखर गया है। आज  जिस  दौर  से  गुजर रहे हम जिस पर सबसे असर पड़ा है ज्यादा वह  है  सारे  रिश्तों   के  टूटे  बिखरे संवेदनशील   सम्बन्धों   का  धागा। इस  युग  की  युवा  पीढ़ी  को भाता लोग  बाग़ समूह से परे एकाकीपन नटखट  खो  गया  अबोध  बालपन हुआ  परिपक्व समय से पहले मन। भाँति-भाँति के खेल गुलेल लुप्त सब संग,साथ,चौकड़ियों का हुआ अभाव आपस  का सारा सद्दभाव मिटा रहा कंम्प्यूटर, मोबाईल का  बढ़ता चाव। नैतिकता  खो  रही  यह  नूतन पीढ़ी पल रही  दिनचर्या  अपसंस्कृति  में श्रम प्रयास से विमुख हो रहे सबलोग  तत्पर लाभ की परिचर्चा विकृति में। शर्म,हया,भय,संकोच मिटा दिये सभी  दूर हो रही मुख से मासूमियत भोली टूटते बिखरते तालमेल सुमेल खो रहे आँखें विनम्रहीन,ओछी हो रही बोली। मुशफ़िरख़ा...