संदेश

जुलाई 8, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नारी व्यथा पर कविता

नारी व्यथा पर कविता-- हे ईश ! मेरी  मृगतृष्णा मिटा दो, थक गई हूँ विषम भार ढोते-ढोते  ज़िम्मेदारियां जो कांधे पर रखे तुम, पूँजी सौंप तुम्हें उन  कर्तव्यों की  अब मुक्त होना चाहती हूँ , कह रहा मन खिन्न हो जो  उस व्यथा का जरा संज्ञान लो, खो चुकी सर्वस्व निज का  तमाम रिश्तों के जंजाल में, बेटी,मां,बहन,भार्या,बहू से   खुद को परित्यक्त कर ,   इन संबोध नों से रिक्त होना चाहती हूँ , कुलटा,बेशरम,चरित्रहीन,पतिता  की उपाधि का विभूषण , जो ठप्पा कंचन कामिनी पर  तुम्हें  उदारता से  सहृदय दान कर   उन्मुक्त होना चाहती हूँ, मेरे त्याग ने लूटा मुझे  मेरी करूणा ने किया छिन्न-भिन्न, की ममता की धरा लज्जित मुझे  वात्सल्य ने निचोड़ा बहुत, बीच चौराहे पर हुई तार-तार मुझे मेरे आँचल ने किया नंगा धिक्  आत्मबल मृतप्राय सा  नाज़ुक पंखुरी से घायल हुई, अब नहीं कोमल भावनाओं में  पुनः संलिप्त होना चाहती हूँ, ना ही अब देवी रही मैं ना ही चण्डी, दुर्गा,भवानी, तेरी संरचना ...