कविता '' गीली-गीली फुहारों से भींगो यादों की ''
'' गीली-गीली फुहारों से भींगो यादों की '' उमड़ कर बही वेदना जो अश्रु धार में बह गई उनके यादों की धूप-छांव भी वहम ही सही तो भी कुछ कम ना था हृदय में था बसा भले पीर का गाँव ही , काश होती व्यथा की जुबान भी अगर मुस्कराती नहीं मैं ग़म छुपा इस तरह न भावना का उमड़ता अथाह समंदर न ग्रन्थ लिखती ज़िन्दगी का इस तरह , एकाकीपन से मुझे तो अटूट प्यार था क्यूँ रोज आता ख़्यालों में दबे पांव वो सुलगाता विरह की अगन से अंतहीन छितर जाता है हर्फ़ सा काग़ज़ों पे जो , वो आकर मेरी कल्पना कुञ्ज की गली पुराने मौसम का पुरवा बहा कर गया फिर से अनवरत् ख़्वाबों का कांच के जत्था पलकों पर मेरी बिछा कर गया , भरकर उन्माद पोर-पोर में वसन्त सा पी अधर का पराग उर लगा कर गया गीली-गीली फुहारों से भींगो यादों की आलम तन्हाई का यूँ महका कर गया , नई कोंपलें खिला यादों के दरख़्त पर झट उदासी के...