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गीत कविता

राह तकते कटे दिन रैन  तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया जब भी मेरी बस्ती से गुजरा कोई राही दौड़ झांकती झरोखा दिखते तुम नाहीं बीते लमहों को याद कर रोईं बहुत ॳॅंखिया तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया । मुरझा गया मनमोहक जूड़े का गजरा बह गया ऑंसू़ संग आंखों का कजरा  गालों की सुर्खी पर खींची रेखा कारी रंगिया तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया । थाल फूलों से सजाया अगवानी को तेरे मेंहदी हाथों में महावर पांव नाम का तेरे  पिया किससे कहूं कैसे हिया की गूढ़ बतिया  तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया । पता ना ठिकाना दिये लिखूं कैसे पतिया आवन को कह गये निकली झूठी बतिया बीते करवट बदलते रातें भींग जाती तकिया  तुम नहीं आए पथरा गईं ॳॅंखिया । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

निस्पंद से पड़े

हे कर्णधार साईं नाव मंझधार पार लगा दो दीन,हीन,मलीन पे महिमा बरसा अपार दो । कितनी कीं याचनायें सरकार तेरे दरबार में  कभी प्रार्थनाओं का तुझपर असर ना हुआ क्या कमी थी प्रभु भक्ति,भाव,अर्चनाओं में  के मेरी वेदनाओं का तुझको खबर ना हुआ । दिन रात तेरे अक्स को उतार कल्पनाओं में  पूजती रही मन ही मन शाश्वत भावनाओं में  तुम पूजा ना सके साध ज़िन्दगी की एक भी  क्या कमी रही बताओ ना मेरी साधनाओं में । सुधि लोगे कब स्वामी कब बरसाओगे कृपा  सर्वव्यापी भगवन हरोगे कब पीर,कष्ट,व्यथा कर दो प्रभामंडल से अपने संतृप्त चित्त प्रभु कब प्रसन्न हो बहाओगे संभावनाओं की दया । क्या करें तुझको अर्पण करूं कैसे स्तुति तेरी  निस्पंद से पड़े ना सुनते क्यों कोई अर्जी मेरी  तुम्हीं सृष्टि के रचयिता तुम भाग्य के विधाता  तुम ही सर्वशक्तिमान चाहे जो करो मर्ज़ी तेरी । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित