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सुवास बन आ जा प्रिये

दिखा सकी न ताण्डव मैं भीतर के शोर का नख-शिख तक लपेटे रखी चुप्पी की चादर , छुपाये रखी दिल के पर्त में दर्द का ज़ख़ीरा  हंसती मुस्कुराती कोरें पलकों की भींगाकर । वेदना के प्रसाधन से अन्तर का सिंगार कर  मन का धो ली मलाल अश्रुओं के सैलाब से , जिस उर के उद्गार को ना कर सकी उजागर  उसे कर ली महसूस धड़कन की आवाज़ से । तराश तेरी तस्वीर कल्पनाओं के तिरपाल पे  प्रायः कर लेती दीदार तूलिका के इमदाद से , समीर के झोंकों सा सुवास बन आ जा प्रिये  तुझे मिल जाऊंगी खड़ी तले तरू पलाश के । रहे उजाड़ सा मन का गलियारा गवारा नहीं  गुजरे उमर सारी तेरी याद में भी गवारा नहीं , तरस रहे तेरी आवाज़ को अरसे से कान मेरे  किसी ने मुझे मेरी प्रिये कह कर पुकारा नहीं ।  इमदाद---मदद  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित

चले गये पंछी कहाँ ना जाने

लिखो लेखनी अनुभूति मेरे मेरी अंतरंग संगिनी बनकर  कैसे तन्हाई का हाथ पकड़  काट रही ज़िंदगी का सफ़र ।  चहुंओर घना पसरा सन्नाटा   सब घर की निस्तब्ध दीवारें  वीरान दिखें बागों के दरख़्त  चले गये पंछी कहाँ ना जाने । चला गया जाने कहां सुहाना  अपने लोगों के साथ का दौर  उन्हीं घड़ियों की सुनहरी यादें  थिरकतीं स्मृतिपटल पर और । लिख तन्हाई की कंबल ओढ़े  गुज़र रही मेरी तन्हा ज़िन्दगी  जिसे भी देखती वही अकेला  करें किससे ठिठोली दिल्लगी । जब भी निकली घर से बाहर  जो भी मिला दिखा तन्हाई में  अलबत्ता मिला दिया स्वयं से  मुझको मुझसे ऐसी तन्हाई ने । किसके संग बैठ जी बहलायें  सभी घर निर्जन सुनसान पड़े  कौन किसे सांत्वना देवे भला  चित्त भी सबके बियाबान पड़े। अकेलेपन के इस रेगिस्तान में  तन्हाई नितान्त मैं मेरी परछाईं  ऐसा ही परिदृश्य दिखा हर घर  दूरस्थ हुए बच्चे रह गई तन्हाई । कभी अंगारों सी सुलगाती यह  कभी नागिन सी डंसती तन्हाई  पढ़ मन का अवसाद सीखा दी  तन्हा जीने का हुनर भी तन्हाई ...

चाँद के साथ

चाँद के साथ - जुलाई 14, 2026 दूर मंज़िल बहुत हूँ तनहा डगर में मगर बाँटने मेरी तनहाइयाँ  साथ चलता रहा चाँद मेरे सफ़र में । कभी डाले मुख पे घटाओं के घूँघट  कभी बादलों के झरोखों से झाँके  कभी सुख की लाली का आलम लिए  दर्द की माँग भर जाये चुपके से आके । कभी वैरागी मन की पगडंडियों पर तृषित अंजली का अमृत जल पिला के कभी फ़ायदा भोलेपन का उठाता  लुकाछिपी करता रहा आते जाते । कभी सोई अनुभूतियों को जगाता कभी थम सा जाता पराजय पे आके कभी झकझोर कर हँसाता गुदगुदाता इक निर्धूम दीया रोशनी की जला के । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

मेरा अन्तर्द्वन्द

मेरा अन्तर्द्वन्द्व - जुलाई 08, 2026 मैं कौन हूँ क्या नाम है मेरा  अपनी ज़िंदगी पति और बच्चों में सिमटी सम्पूर्ण अस्तित्व अपना गिरवी रखी हुई अमानत के समान  परिवार रूपी रंगमंच पर अद्भुत व्यक्तित्व का मंचन  बेजान,बेस्वाद,बेअसर । निष्ठा और समर्पण का बेताज ख़िताब  अनूठा उपहास ।आख़िर हो तो औरत ही ना । हर पल हर शख़्स से सामंजस्य बिठाने में दिन महीने साल का गुज़रते जाना विषम परिस्थितियों में भी सन्तुलन बनाये रखना । घर की देहरी की संकीर्णता ज़िम्मेदारियों का छलावा  उत्तरदायित्वों के निर्वहन में ढलती उम्र की शाम अरे ! अपने तो लक्ष्य का पैमाना ही बदल गया  ना कोई मंज़िल ना कोई पड़ाव । घुटते देखना अहमियत को सिसकते देखना स्वत्व को, आशावादी दृष्टिकोण का दिशाहीन होना  वास्तविकता के धरातल पर धराशायी होता आत्मविश्वास  कुछ हासिल न कर पाने का मलाल । मक़सद और मज़बूत इरादों का तार-तार मंज़र , दम तोड़ती प्रतिभा आह ! भटकती हुई उम्मीदों की परवरिश के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत की खोज  अपना कोई अनुगामी नहीं सबकी सह गामिनी बन चलती रही  निर्दिष्ट खोह की अतल गहराई में ।...

शक्ल ढाले हैं जिनके हर हर्फ़ में

चाहती दर्द गाऊं पिरो गीत में  सुनने वाला कोई ऐसा हमदर्द हो  दिल के साज़ों के तारों को छेड़े कोई  तो सुनाऊं ग़ज़ल की तरह मर्म को । मन के अंदर समन्दर का तूफ़ान है  रोकर आँसू के मोती ना खोना मुझे  मन में छुपा पीर बह जायेगा अश्रु में  जो अज़ीज़ है दिल से खिलौना मुझे । अब ना और इम्तिहान ले ऐ ज़िन्दगी  कोई समझता नहीं अश्क़ों की ज़ुबान बिना आवाज़ रोने के दास्तान को  समझता कहाँ है बेरहम ये जहान । दफ़्न होकर ही रह गईं ख़ामोशियों में  जो मोहब्बत थी धड़कन ,एहसास में लब की ज़ुबान से जो कह ना सकी   तर कर ली ऐन की घटा के बरसात में । कहीं धुल ना जायें लिखे अल्फ़ाज़ मेरे  शक्ल ढाले हैं जिनके हर हर्फ़ में  कल्पनाओं के सैलाबों से डायरी रंग ख़ाक करती रही ज़िंदगी व्यर्थ में । ऐन ----ऑंख तर----भीगना शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित   

मेरे भाव नदी का उमड़ता सोता

  मेरे भाव नदी का उमड़ता सोता -  जुलाई 03, 2026 ऐ कविता शब्दों की तह में  मेरे सारे दर्द छुपा लेना , जब अंतस् का भाव जगे और हृदय आकुल हो जाये  भींच अंक में सकल वेदना  पंख पे कलम बिठा लेना  ऐ कविता शब्दों की तह में  मेरे सारे दर्द छुपा लेना , भर जाये कोरी छाती जब मुझको बस इतना दे देना काग़ज़ का थोड़ा सा कोना प्रिय मेरे लिए बचा लेना  ऐ कविता शब्दों की तह में  मेरे सारे दर्द छुपा लेना , जब पीड़ा वश से बाहर हो  और उसे मैं भूल ना पाऊँ  जिसे बाँट सके ना कोई अपना तब भागीदार बना लेना ऐ कविता शब्दों की तह में  मेरे सारे दर्द छुपा लेना , भीगे दामन में इतना ऋण देना  शब्दों की ऊर्जा बाढ़ रोक ले मन का मीत मैं तुझमें ढूँढूँ अपनी प्रेयसी मुझे बना लेना ऐ कविता शब्दों की तह में  मेरे सारे दर्द छुपा लेना , सहना मुश्किल हो जाये जब  और मैं शिथिल विकल हो जाऊँ  जीवन से उकता जाऊँ जब जीने की राह दिखा देना  ऐ कविता शब्दों की तह में  मेरे सारे दर्द छिपा लेना , प्यार भरी अतलांत नदी में  मन पलाश जब डूबना चाहे ऐ कविता मेर...

गर्मी और मानसून पर कविता

अंबर दहकाये ज्वाला कड़क धूप की देखो बेशर्मी  हे सूरज देव तपन मिटाओ व्यवहार में लाओ नर्मी तरस खाओ अरे इन्द्रदेव जनजीवन पर रहम करो सूख रहे हैं उपवन हरी-भरी अवनि की जठर करो झुलस रहे खलिहान खेत सूख गये पोखर तालाब  लू के थपेड़े मार रहे बरसा रहा गगन है जैसे आग उमड़ घुमड़ कर आओ ना फौरन मेघराज मेरे गांव  झुलस रही है वसुंधरा अनगिन पड़ गए छाले पांव मुंह पर चढ़ा सुबह से पारा सूरज हंटर है बरसाता अंगीठी जैसे तपे वदन नहीं तरस तनिक है खाता  ऐ मानसून कब आओगे प्रकृति सिंगार को मचले चातक की प्यास बुझाने बता कब आओगे पगले इतने प्रचंड,क्रूर और निर्मम बन क्या पाओगे तुम  सब कुछ कर लोगे बरबाद क्या तब आओगे तुम । जठर------कोख या गर्भाशय  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

कैसे लिखूं

कलम पड़ी है सुस्त मेरी कागज हो गये हैं बेजान  भाव न जाने हो गये लोप कहॉं  कैसे लिखूं अन्तर्द्वन्दों का आख्यान  उमड़ घुमड़ रहे भीतर भीतर  कथ्यों के कितने बवंडर  कह ना सकूं जिसे जता सकूं ना  बस भरूं दृगों में समंदर  किससे घायल मन की पीर कहूॅं कैसे दिखाऊं अन्तर्मन का टूटा दर्पण व्यथा की मथनी से मथ मथ कर पी रही छाछ सा अंदर का तूफ़ान  भाव न जाने हो गये लोप कहॉं  कैसे लिखूं अन्तर्द्वन्दों का आख्यान । रूठ गई शब्दों की माला कैसे वाक्यों को दूं आकार रूह उकेरना चाह रही पर मुंह बिसूर रहे उद्गार मूक उक्तियों की सिसकी अनदेखी चीखों की दास्तान  अनकही विलापतीं अभिव्यक्तियां सहेजूं कहां वृतान्तों का आसमान  भाव न जाने हो गये लोप कहॉं  कैसे लिखूं अन्तर्द्वन्दों का आख्यान । करूणा कलप रही है  देख समाज का विकृत मंजर आहत, द्रवित,अचंभित,विस्मित हूं कितना कोलाहल है अंदर कलम की भोथरी धार पड़ी है  कैसे अनन्त क्रंदन करूं बयान  धधक रही इक आह हृदय में सूझ रहा ना कुछ निदान  भाव न जाने हो गये लोप कहॉं  कैसे लिखूं अन्तर्द्वन्दों का आख्...

भजन

रम जाऊं मगन हो तेरे भजन में  अपनी कृपा बरसा दो अम्बे मां वास करो आ हृदय कुन्ज में मेरे अपनी सेविका बना लो अम्बे मां ।। दुःख दर्द हरो मन का खड्ग खप्पर वाली मां गुणगान करूं तेरा अन्नपूर्णा अम्बे भवानी मां रूप अनेकों तेरे तूं है आदिशक्ति की अवतार  अपरम्पार है तेरी महिमा    मिटा दे मन का अंधियार ।। हर भक्त डूबा भक्ति में सजा के चौकी चौबारा तेरे नाम की घण्टी बाजे हर घर गूंजे जयकारा  सुख समृद्धि से भर आंचल फले फूले परिवार  संसार झुका तेरे चरणों में  कर दे नई उर्जा का संचार ।। तेरे दरबार से जाऊं ना खाली भर दे झोली मां वंश बेलि बढ़ा मेरी अब तक बहुत हूँ रो ली मां स्वीकार करो वंदना मेरी लाचार खड़ी तेरे द्वार  मँझधार फंसी मेरी नैया  मां तारिणी लगा दे पार ।। मेरे सोये भाग्य जगा दो इक तुझसे आसरा मां अवगुण ना देखो मेरे मैं अज्ञानी कालिका मां सर्वशक्तिमान कल्याणी नारायणी ज्योत वाली   दरस दिखा दो खोल किवाड़ खोलो किस्मत के द्वार ।। शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

अबकी बार होली में

केसर रंग,रंग देना पिया अंग अबकी बार होली में गाते बजाते चैती,फाग मृदंग  अबकी बार होली में । माथे पे रोली गाल गुलाल कोरी चूनर कर देना लाल  धो देना मन का मलाल  अबकी बार होली में । तन भी भींगे मन भी भींगे  अंचरा भी भींगे अंगिया भी भींगे  हरे,नीले,पीले रंग जामुनी डाल अबकी बार होली में । संग तेरे मैं बेसुध नाचूं ऑंखों में प्रीत की पाती बांचूं  कर देना नेह बरसा निहाल अबकी बार होली में । छल से ना रंगना पिया बरजोरी बल से ना रंगना चलने ना दूंगी कोई तेरी चाल  अबकी बार होली में । होश ना खोना पीकर भंग  तोड़ना ना संयम का प्रतिबंध  रखना लोक लाज का ख़याल  अबकी बार होली में । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

पाकर मधुऋतु का उपहार

पाकर मधुऋतु का उपहार आया वसंत का मौसम  उत्सव मना रही प्रकृति  उत्साह उमंग और उल्लास से चित्त वैरागी हो गया हर्षित । कुदरत ने बड़े चाव से  भू-मंडल का किया श्रृंगार  देख अलौकिक छटा वसंत की मगन मन गाये गीत मल्हार । आह्लादित हो ऋतुपति के नेह से  नवयौवना सी इठला रही धरा  मनमोहक लगे किरन भोर की सुन्दर सुखद लगे सुरमई फिज़ा । होश हवास खो बौरा गईं हवाएं   झूम रहा विभोर हो अमलतास हौले-हौले हरिया रहे दरख़्त भगवा रंग में दहक रहा पलाश । चढ़ तरूड़ाई की दहलीज़  मादकता में डूबा रसाल मकरन्द चूस प्रसूनों का मधुकर हो रहा निहाल । इठलाने लगी टहनियां  नव पल्लव का ओढ़ लिबास  नवजीवन पा पतझड़ मुस्काया कलरव कर विहग करें विलास । मलयज का शीतल झोंका पा खिल गयी कली कचनार बहकने लगा दिग् दिगन्त स्निग्ध बहे वसन्ती बयार । वनस्थली सज गयी वधू सी मह-मह महका हरसिंगार  गदराया फसलों का तन    पाकर मधुऋतु का उपहार । आलिंगनबद्ध हुईं लतायें तोड़ कर अहंकार रुआब पोर-पोर वनस्पतियों का खिला कोंपलें पट खोल हुईं रक्ताभ । पतझड़ ने अपना चोला बदला मधुमासी रूप सलोना पाकर...

निपुणता से निभातीं किरदार कल्पनाएँ सारी

तुम्हें हमदर्द समझे मगर ख़ुदग़र्ज़ निकले तुम  मेरे एतबार से छल कर बड़े बेदर्द निकले तुम । क्यूं दिल के दुर्ग के द्वार पे डट संतरी बनकर  खड़े रहते हो तुम दिन रात सिपाही की तरह  करते रहते हो तरोताजा नासूरों को प्रतिदिन गरज क्या तनहाई में सेंध लगाने की बेवजह । तन्हाई की बस्ती में लगा दरबार ख़ामोशी से    अकेले जीने की सीख ली हमने कलाएँ सारी  ख़्यालों के रंगमंच पे सजा हर रोज़ महफ़िलें  निपुणता से निभातीं किरदार कल्पनाएँ सारी । कितनी मिन्नतें की कितनी दी दुहाई वफ़ा की  ज़िन्दगी में आ गया कौन जो मुझपे जफ़ा की  गिला है यही चले जाते दूर रोकती नहीं मैं पर  किसी खलनायिका लिए कहना मैं बेवफ़ा थी । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे

दिल का दरवाजा रोज़ खटखटाया ना करो अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो । तुम्हारी यादों में भूली ज़माना और ख़ुद को तेरे सिवा ना अपनाया अभी तक किसी को  ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे  कितना चाहा तुझे था बता न पाई तुम्हीं को  इस क़दर याद में सिरफिरा बनाया ना करो  अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो । भले ही रह गयी हो अधूरी मेरी चाहत मगर  तूं दूर रह कर भी है मेरे पास हर वक़्त मगर  अधूरा रह कर भी रिश्ता ये खतम नहीं हुआ  दिल को देते सुकूं ढेरों यादों के दरख़्त मगर  मन के मुँडेरों पर चाँद बन के आया ना करो  अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो । कितना समझाते हैं दिल को भूल जाये तुझे तुम मेरी क़िस्मत में थे नहीं बतलाये भी उसे उसने नई दुनिया बसा ली कहा कितनी बार  कहता बढ़ती जाये याद कैसे भूल जायें उसे  मन अतीत की वादियों में भटकाया ना करो  अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

जान भी ले लिया औ ज़िंदा भी ना छोड़ा दिल्लगी ने

इस क़दर जिसको चाहा उसकी मुस्कान की खातिर । हर दर्द ख़ुशी से अपना ली उसकी ख़ुशी की खातिर ।। खोई रही सदा जिसके ख़यालों में ख़ुद को भुलाकर । बदल गया वो गुजरते वक्त के साथ मुझको भुलाकर ।। ना अपना बनाया न रहने दिया किसी के क़ाबिल ही । नफ़रत भी नहीं न रखा हासिल करने के क़ाबिल ही ।। जाने कितना लगेगा वक्त उसे भुलाने की कोशिश में । गंवा रही ज़िन्दगी व्यर्थ दिल बहलाने की कोशिश में ।। हम हम ना रहे दर्द इतना सहा मसखरी में ज़िंदगी ने । जान भी ले लिया औ ज़िंदा भी ना छोड़ा दिल्लगी ने ।। बहुत रोये थे बिछड़ते वक़्त फैसला आसान नहीं था । फासले का ग़म बहुत जुदाई ऐसे होगी भान नहीं था ।। गज़ब का कलाकार निकला वो अपनापन दिखाकर । जिन्दगी बर्बाद किया ख़्वाबों के सब्ज़बाग दिखाकर ।। ज़िंदगी भर की चुभन तरसती रही खुशी को उम्रभर । आखिरी सांस तक किया इंतज़ार आंखों में अब्र भर ।। अब्र-- बादल,घटा शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

जो ज़ख्म दिया तूने वो मवाद लिए फिरते हैं

इतनी चुप और ख़ामोश क्यों हूँ कैसे बताऊं  दिल के टूटने की आवाज़ किसको दिखाऊं  हंसी की वजह जो थे हो गए किसी और के  वो खुश है भींगी ऑंखें मेरी क्यों कैसे बताऊं निज को खो दिया जिसको पाने की खातिर  वही निकला बेवफ़ा दिल को कैसे समझाऊं । खुली ऑंखों में पले ख़्वाब परिहास करते हैं  होंठों पर मुस्कान का लिबास डाले फिरते हैं  कौन समझे मुस्कुराहटों में छिपे दर्द का मर्म  तुम नहीं साथ मगर एहसास  लिए फिरते हैं  बेइंतहा दीवानगी की मिली ये सजा वफ़ा में  जो ज़ख्म दिया तूने वो मवाद लिए फिरते हैं । कितने बेखबर तुम हो मेरे दिल के तूफ़ान से  फासले कर लिये मिल के किसी अनजान से  किस दौलतमंद ने खरीद लिया है ज़मीर तेरा  नासमझ जान भी न पाई मैं क्या तदबीर तेरा जबसे तेरी याद में मैंने भी तड़पना क्या छोड़ा तबसे इस बेवकूफ़ दिल ने धड़कना ही छोड़ा । तदबीर--योजना, युक्ति  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

शीशे सा टूट बिखर नहीं जाऊं कहीं

मेरा दर्द नज़र ना आए किसी को  मुस्कान अधरों पे बिछाये रखती हूॅं । दिल रोये असर ना दिखे किसी को  आनन पर सिंगार सजाये रखती हूॅं । जो आंखों में भरा है पानी लबालब   कहीं छलक पड़े ना दबाये रखती हूं । शीशे सा टूट बिखर नहीं जाऊं कहीं   ख़ुद को दृढ़ सशक्त बनाये रखती हूॅं । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

लब पे हर वक्त नाम तेरा दिल में बसी तस्वीर तेरी

जो बिन बोले कीं गुफ्त़गू ऑंखों से ऑंखों ने सनम और तुम मुस्कुराये हर ज़ख्म का इलाज़ हो गया है । जब से तुझको नज़र भर कर देखी हैं ऑंखें सनम  आशिकों की तरह आशिकाना मिज़ाज हो गया है इश्क़ में तेरे डूबी जिस्म से रूह में समा गए सनम जमाना कहता दीवानों सा मेरा अंदाज़ हो गया है । लग जायेगी नज़र होगी जब ख़बर जहां को सनम  अब तो दिल भी तेरे इश्क़ का मोहताज हो गया है  इश्क़ में तेरे फनकार बन करने लगी शायरी सनम  मचल उठी लब पे ग़ज़ल मस्ताना साज़ हो गया है । तुम ही तुम सजने लगे ख्यालों ख़्वाबों में ऐ सनम  बदला चाल ढाल रंग ढंग खुद पर नाज़ हो गया है  दिन हसीं रंगीन शामें लगने लगीं आजकल सनम  उड़ने लगी हवा में मैं जबसे तूं सरताज हो गया है । जबसे मिले तुम संवर गई दुनिया निखर गये दिन  लगे धड़कनों की आवाज भी अल्फाज़ हो गया है  हर वक्त लब पे तेरा नाम दिल में बसी तस्वीर तेरी  लगन तुमसे जो लगाई ख़ुदा भी नाराज़ हो गया है । शैल सिंह सर्वाधिकार सुरक्षित 

कुछ शेर

जब भी कुछ छिपाती हूँ लोग कयास लगा लेते हैं  मुस्कुराहट की वजह क्या है अन्दाज़ लगा लेते हैं  काश तुम भी समझ लेते जज़्बात लोगों की तरह  लोग तो अनायास ख़्वाबों की बारात सजा देते हैं ।  शैल सिंह  मुझे कहना नहीं आया समझना तुम नहीं चाहे  कहीं कश्मक़श में दिल धड़कना भूल ना जाए  ना जाने कैसा रिश्ता जुड़ बैठा तुमसे अटूट सा  डर जग से कहीं ना उल्फ़त का राज खुल जाए ‌। शैल सिंह  जबसे ऑंखों में तेरा ख़्वाब सजाने लगी हूँ  जमाना पूछे किसे ऑंखों में बसाने लगी हूँ  ऑंखों में रहते तुम नज़र न लग जाये कहीं  आजकल ऑंखों में काजल लगाने लगी हूँ । शैल सिंह  तुम्हारे ऑंखों की खूबसूरती ने इश्क़ का पाठ पढ़ा दिया  मैं तो वाक़िफ भी ना थी मुहब्बत क्या अल्फ़ाज होता है  ख़ामोशी से अफ़साना तूने धड़कनों को बेधड़क सुनाया  दिल हर लिया इल्म़ नहीं क्या,ऑंखों में जज़्बात होता है । शैल सिंह  किस क़दर बेवफ़ा तूने वार किया दिल पर मुस्कुरा कर  कुचल डाले सारे अरमां किसी गैर की बांहों में समाकर  मैंने तो सब कुछ समर्पित कर दिया वफ़ा की उम्म...

मुकम्मल वो भी ना होगा किसी का जुदा हो मुझसे

इक ज़माना गुजरा ख़्वाब सा लगता उससे मिलना  पर तरसी निग़ाहों ने मुहब्बत को संजोया भी बहुत ।  मुद्दतों बाद इत्तिफ़ाक़ से वो आया भी तो इस तरह  बड़ी शफ़क़त से गले भी मिला और रोया भी बहुत  जाते-जाते विषाद दे गया अलविदा कह जुदाई का  तो फिर चाहत की चाशनी में क्यों डुबोया भी बहुत । मुक़द्दर ने भी गजब खेल खेला मिला के बिछड़ाया  हमीं से हमको दूर कर अश्क़ों में भिंगोया भी बहुत  गया तो ख़्याल छोड़ गया क्यों मलाल इस बात का  कभी तो एहसास होगा क्या पाकर खोया भी बहुत । मेरा होकर भी ना हुआ वो मेरा अधूरा रहा सफ़र यूं  दिल लगाने का इनाम दर्द दिल में पिरोया भी बहुत  मुकम्मल वो भी ना होगा किसी का मुझसे जुदा हो  खुद को मुझमें छोड़ कब चैन से वो सोया भी बहुत ।   शफ़क़त--ममता, अपनापन  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित    

अमानत मेरी हो न हो चाहे

चला गया दहर में छोड़कर तन्हा मुझे इस तरह  कभी ना लौटकर आने वाला वो बेखबर बेतरह  कुछ निशां छोड़ गया है पास ऐसा बेतरतीब सा  भूला ना पाऊं चाहकर भी वो चीज बेनजीर सा । मेरी सांसों को महका जातीं तेरे प्यार की खु़श्बू  तेरी हर बात बहका जातीं मैं तेरे इश्क़ में बहकूं  जितनी बार धड़कें धड़कनें जितने श्वांस लेती हूॅं  उतनी बार आते याद तुम तेरी यादों में मैं चहकूं । मेरे ख़्वाबों में बसते हो मुक़द्दर में हो न हो चाहे  लकीरों में तुझे देखूं अमानत मेरी हो न हो चाहे  कश्मक़श में जीती रख तुझे नज़र के समंदर में  उल्फ़त है मुझे तुमसे तुझे इक़रार हो न हो चाहे । फा़सले मिटा नहीं पाये मुहब्बत को रूह से मेरी   रहती फ़िक्र शिद्दत से मुझे रह के भी दूर से तेरी बेपनाह मोहब्बत है नियति में लिखा जुदा होना  पता है बेबसी का क्या कहूॅं है इश्क़ की मजबूरी । बेतरह---असामान्य बेतरतीब---अव्यवस्थित बेनजीर--अनुपम, बेजोड़  शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

ऐ मेरे अल्फ़ाज़ों जा कह देना उनसे

करती भला किससे मैं जुदाई का शिकवा  दिखाई अंजुमन में फिर रूबाई का जलवा । लिखने को थी तो बहुत सारी दास्तां मगर  चन्द लफ़्ज़ों की एक ग़ज़ल लिखकर मैंने  सुनाई जो महफ़िल में जोश भरे अंदाज़ में उनका अलहेदा ग़ज़ल पे लहज़ा देखा मैंने । नज़्मों का पैमाना छलकना था बाकी अभी  हो गये बज़्म से ओझल झट नजरें चुराकर  हिज़्र की रात का दर्द था शायरी में पिरोया बिन सुने हुये रुख़्सत सारी फ़िक्रें भुलाकर । सदियों की जुदाई तो दिया उन्हीं ने आखिर  वक्त तन्हा गुजारते क्यों मयखाने में‌ जाकर  गुजर रही ज़िन्दगी बिना उन एक-एक दिन  करते परेशां क्यों मुझे मेरे ख़्वाबों में आकर । बिछड़ने का तहज़ीब भी तो ना आया उन्हें  जुदाई का दर्द बयां करती चेहरे की उदासी ऐ मेरे अल्फ़ाज़ों जा कह देना उनसे,यकीन तोड़ा उन्होंने सुकुन छीना मैंने दिन-रात की । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

स्वर्ण विहान कर विदा हो रात आखिरी

    छंटे मन की उदासी सजे मधुर कल्पना      नव वर्ष में हों साकार कुल मनोकामना      गूंजे दिशाओं में मस्त अमन की बांसुरी      स्वर्ण विहान कर विदा हो रात आखिरी । स्वर्णिम,उज्वल,सुखद हो हम सबका भविष्य  उमंग तरंग भरा नये वर्ष का अनोखा हो दृश्य  मन के मतभेद मिटा भाईचारा सद्भाव बढ़ाना  नव संवत्सर उम्मीदों की नवकिरण बिखराना । नई ताज़गी के साथ शुरुआत हो नये साल की‌   खूबसूरत हो ज़िंदगी का हर पल नये साल की  न कोई मायूस रहे ना चेहरे पे किसी के उदासी  गुजरे वर्ष तुझे अलविदा मुबारक नये साल की । दुआ है सफ़र हो सुहाना सलामत रहें सब लोग  प्रेम सौहार्द बांटते हॅंसते मुस्कुराते रहें सब लोग  हर ख़्वाहिशें हों पूरी मिले कामयाबी हर क्षेत्र में  खुशियां ही खुशियां हो नमी ना हो किसी नेत्र में । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

अधुरा प्रेम

तुम संग रेखाओं में परिणय लिखा या नहीं  ये पता तो नहीं था मन से मन के मिलन में  कितने सपने सलोने संजोए हमारे नयन थे  संबंध स्वाहा हुआ ग्रह कुण्डली के हवन में ।  पीकर अश्रुओं को रश्मों के दस्तूर निभाना  मेंहदी किसी के नाम की मौन साधे रचाना  निर्जीव देह की भीत हल्दी चंदन लगवाना  कितनी त्रासदी से गुजरी किसी ने न जाना । कहीं रूसवा ना हो प्रेम पावन मेरा तुम्हारा  प्रतिष्ठा मान की दुहाई हृदय असहाय हारा  श्रृंगार तन पे सजा मन की देहरी सूनी रही  बेगाना आलम ना जाना तड़पती रोती रही ।  मजबूरियों की शिला पर लिख रही दास्तां  विवशताओं की बेड़ियां जकड़ी रहीं रास्ता  रो उठा आईना भी देख नैनों में चेहरा तेरा  कैद पिंजड़े में फड़फड़ाता रहा परिंदा तेरा । की हजारों जतन कोई युक्ति आई ना काम  थी तमन्ना मिलन की पर वह आई ना शाम  कितने संदेश भेजे पाती लिख भेजी तमाम  पाती आई तो बहुत कोई मेरे आई ना नाम । एक अजनबी के संग बंधी डोर ज़िंदगी की  ना ही तेरी ना मुक़म्मल हो सकी किसी की  कर सकी अवज्ञा न लड़ सकी चुनौतियों से  ...

नव वर्ष पर शुभकामनाएं

मह-मह महके फूलों सी जीवन की बाग सर्वदा  खुशियों का अनमोल उपहार नव वर्ष ले आना  रहें हम सब जीवन भर सुखमय खुशहाल सदा  सौगातों का अंबार नव वर्ष आंजुरी भर लुटाना । गुजरा साल पुराना,नूतन साल तेरा अभिनन्दन  खट्टी-मीठी यादों संग करें गुजरे साल को वंदन  नई किरण नये उम्मीदों संग करते सत्कार तेरा  जोशो,उल्लास से स्वागत करते नया साल तेरा । किस्मत के ताले खोल गुलशन में फूल खिलाना नई चेतना नई स्फूर्ति भर दशों दिशाएं महकाना मन में संजोए सपने अंतर में छिपी अभिलाषाएं  तेरे मार्गदर्शन में फलीभूत हों देना शुभकामनाएं । नव वर्ष का ऐसा हो शुभारंभ देश का हो उत्थान  मानवता का कल्याण हो पूर्ण सबके हों अरमान  निर्भयता का चमन रहे हर्षित हो सबका अंतर्मन  कण-कण मुस्काए बसुधा चतुर्दिक शान्ति अमन । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित