कैफ़ियत भी ना ली ना ही आये लौटकर ही
किस क़दर रूलाया बेवफ़ा ये तेरे ऐतबार ने
नतीजा ये कि बेक़रार किया तेरे इन्तज़ार ने ।
एक रूह दो जिस्म हम तो दरम्यां कैसी दूरी
सारे ख़्वाब सारी ख़्वाहिशें ज़ीस्त की अधूरी
अब तो अपने यकीं पर भी तरस आता मुझे
आख़िर मुझसे बेवफ़ाई की क्या थी मजबूरी ।
रफ़्ता-रफ़्ता टूटी बिखरी छुप-छुप रोई मगर
जी को देती रही ढाढस अज़ीयत में अक्सर
कैफ़ियत भी ना ली ना ही आये लौटकर ही
मुस्कुराहटों में छुपाती फिरी ग़म के समन्दर ।
मिटा सकी ना आज तक अधर से नाम तेरा
सजा रखी निग़ाहों में आज तक अक़्स तेरा
कितनी विवश चाहतें हैं वक़्त के सलीब पर
कभी साअत मिले आना खुला दहलीज़ मेरा ।
ज़ीस्त---ज़िंदगी, अज़ीयत--तकलीफ़,
कैफ़ियत--हालत , साअत---समय या वक़्त
शैल सिंह
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