कुछ शेर
जब भी कुछ छिपाती हूँ लोग कयास लगा लेते हैं
मुस्कुराहट की वजह क्या है अन्दाज़ लगा लेते हैं
काश तुम भी समझ लेते जज़्बात लोगों की तरह
लोग तो अनायास ख़्वाबों की बारात सजा देते हैं ।
शैल सिंह
मुझे कहना नहीं आया समझना तुम नहीं चाहे
कहीं कश्मक़श में दिल धड़कना भूल ना जाए
ना जाने कैसा रिश्ता जुड़ बैठा तुमसे अटूट सा
डर जग से कहीं ना उल्फ़त का राज खुल जाए ।
शैल सिंह
जबसे ऑंखों में तेरा ख़्वाब सजाने लगी हूँ
जमाना पूछे किसे ऑंखों में बसाने लगी हूँ
ऑंखों में रहते तुम नज़र न लग जाये कहीं
आजकल ऑंखों में काजल लगाने लगी हूँ ।
शैल सिंह
तुम्हारे ऑंखों की खूबसूरती ने इश्क़ का पाठ पढ़ा दिया
मैं तो वाक़िफ भी ना थी मुहब्बत क्या अल्फ़ाज होता है
ख़ामोशी से अफ़साना तूने धड़कनों को बेधड़क सुनाया
दिल हर लिया इल्म़ नहीं क्या,ऑंखों में जज़्बात होता है ।
शैल सिंह
किस क़दर बेवफ़ा तूने वार किया दिल पर मुस्कुरा कर
कुचल डाले सारे अरमां किसी गैर की बांहों में समाकर
मैंने तो सब कुछ समर्पित कर दिया वफ़ा की उम्मीद में
रंज यही परख सके ना फितरतें तेरी ऑंखों में समाकर ।
शैल सिंह
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