तेरे सिवा भी हैं बहुत लोग इस जहां में ओ सितमगर

ये भी पता तुम मिलोगे नहीं कभी ज़िन्दगी में मुझे 
फिर भी तेरा इन्तज़ार इन आंखों को रहता है क्यों 
जिन रास्तों पर मिलकर जुदा हुए तुमसे हम कभी 
उन रास्तों पर जाकर ये दिल बेक़रार रहता है क्यों ।

मालूम है कि तेरे दिल में मेरे लिए जगह कोई नहीं 
फिर भी तेरे लिए इस दिल में प्रेम मचलता है क्यों  
कितना नासमझ,नादां है दिल ये मेरा ओ बाज़ीगर 
कि घाव पाकर भी दर्द का तलबगार रहता है क्यों ।

जबकि हाथ की रेखाओं में नाम तेरा खुदा ही नहीं 
तो नयनों में तेरे नाम का खुमार चढ़ा रहता है क्यों 
जानती हूॅं जुदा हैं तेरे औ मेरे मंज़िल की राहें मगर 
उस मंज़िल पर चलने को तड़फड़ाता रहता है क्यों । 

विधी कैसी रचे आका भी तुझे पाना लिखा ही नहीं 
दिल पर इस क़दर यादों का अधिकार रहता है क्यों 
कितनी नासमझ धड़कनें हैं मेरी कुछ समझती नहीं 
तो ऐसी खता दिल आखिरकार करता रहता है क्यों । 

खुशी दे न सके दर्द देने का मिज़ाज जिस शख्स की  
ऐसी सौगात पर भी दिल ऐतराज नहीं करता है क्यों  
तेरे सिवा भी हैं बहुत लोग इस जहां में ओ सितमगर 
तो दर्द देने वाले पे दिल पागल ऐतबार करता है क्यों ।

शैल सिंह 
सर्वाधिकार सुरक्षित 







टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नई बहू का आगमन पर मेरी कविता

यादों पर कविता

निस्पंद से पड़े