संदेश

सितंबर 6, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मृगतृष्णा खींच ले आई रे कहॉं

खो गया ना जाने कहॉं मेरे गांव का मनोहारी परिदृश्य  ना पहले सी  मिट्टी में ख़ुशबू  रही ना वो पहले सी  रीति । जिस मिट्टी के ज़र्रे ज़र्रे में कुदरत का भरा खजाना था  पीपल की ठंडी छांव तले बचपन का  बीता  जमाना था  नैनों में तिरता अभी तलक हर मौसम का मोहित रूप  रंगों,सांसों में गांव बसा यादों में आंगन की सुहानी धूप । छूट गई खेतों की मेढ़ें,पगडंडी,छूटी बावड़ी,बाग,बगीचे  कहॉं गए वे दिन सुनहरे खाटें  बिछी  नीम गाछ के नीचे  गांव की छोड़ हवेली आये शहर के दो कमरों में बसेरा  ना आंगन दालान कहीं ना धूप लगे,लगे कब हो सवेरा । सूना पड़ा जगत कुएं का सूना दंगल,सूनी पड़ी चौपाल  छूटा गांव का पनघट,मजमा मेले का साले यही मलाल  कैसे भूलें प्राकृतिक आकर्षण या सुबह सांझ अनमोल  यहॉं परदेश में ना  कोई पूछता कुशल,क्षेम प्रेम से बोल । भले आ बस गये शहर में अंदर खालीपन सा लगता है  क्या कभी लौट पायेंगे गांव शहर प्रताड़न सा लगता है  ना गांव सी ताजी हवा की आहट ना कूजन विहंगों का  लोक लुभावन शहर प्रदूषित   मंज़र...