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चाँद के साथ

चाँद के साथ - जुलाई 14, 2026 दूर मंज़िल बहुत हूँ तनहा डगर में मगर बाँटने मेरी तनहाइयाँ  साथ चलता रहा चाँद मेरे सफ़र में । कभी डाले मुख पे घटाओं के घूँघट  कभी बादलों के झरोखों से झाँके  कभी सुख की लाली का आलम लिए  दर्द की माँग भर जाये चुपके से आके । कभी वैरागी मन की पगडंडियों पर तृषित अंजली का अमृत जल पिला के कभी फ़ायदा भोलेपन का उठाता  लुकाछिपी करता रहा आते जाते । कभी सोई अनुभूतियों को जगाता कभी थम सा जाता पराजय पे आके कभी झकझोर कर हँसाता गुदगुदाता इक निर्धूम दीया रोशनी की जला के । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

मेरा अन्तर्द्वन्द

मेरा अन्तर्द्वन्द्व - जुलाई 08, 2026 मैं कौन हूँ क्या नाम है मेरा  अपनी ज़िंदगी पति और बच्चों में सिमटी सम्पूर्ण अस्तित्व अपना गिरवी रखी हुई अमानत के समान  परिवार रूपी रंगमंच पर अद्भुत व्यक्तित्व का मंचन  बेजान,बेस्वाद,बेअसर । निष्ठा और समर्पण का बेताज ख़िताब  अनूठा उपहास ।आख़िर हो तो औरत ही ना । हर पल हर शख़्स से सामंजस्य बिठाने में दिन महीने साल का गुज़रते जाना विषम परिस्थितियों में भी सन्तुलन बनाये रखना । घर की देहरी की संकीर्णता ज़िम्मेदारियों का छलावा  उत्तरदायित्वों के निर्वहन में ढलती उम्र की शाम अरे ! अपने तो लक्ष्य का पैमाना ही बदल गया  ना कोई मंज़िल ना कोई पड़ाव । घुटते देखना अहमियत को सिसकते देखना स्वत्व को, आशावादी दृष्टिकोण का दिशाहीन होना  वास्तविकता के धरातल पर धराशायी होता आत्मविश्वास  कुछ हासिल न कर पाने का मलाल । मक़सद और मज़बूत इरादों का तार-तार मंज़र , दम तोड़ती प्रतिभा आह ! भटकती हुई उम्मीदों की परवरिश के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत की खोज  अपना कोई अनुगामी नहीं सबकी सह गामिनी बन चलती रही  निर्दिष्ट खोह की अतल गहराई में ।...