निपुणता से निभातीं किरदार कल्पनाएँ सारी
तुम्हें हमदर्द समझे मगर ख़ुदग़र्ज़ निकले तुम
मेरे एतबार से छल कर बड़े बेदर्द निकले तुम ।
खड़े रहते हो तुम दिन रात सिपाही की तरह
करते रहते हो प्रतिदिन नासूरों को तरोताजा
गरज क्या तनहाई में सेंध लगाने की बेवजह ।
तन्हाई की बस्ती में ख़ामोशी से लगा दरबार
एकाकी सीख ली मैंने जीने की कलाएँ सारी
ख़्यालों के रंगमंच पे सजा हर रोज़ महफ़िल
निपुणता से निभातीं किरदार कल्पनाएँ सारी ।
कितनी मिन्नतें की कितनी दी दुहाई वफ़ा की
कौन ज़िन्दगी में आ गया जो मुझपे जफ़ा की
गिला है यही दूर चले जाते रोकती नहीं मैं पर
किसी खलनायिका लिए कहना मैं बेवफ़ा थी ।
एकाकी—अकेले
शैल सिंह
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