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मेरी सांसों में तूं रूठकर जुदा सांसों से होना नहीं

सदा आंखें टिकीं देहरी पर  तेरा इन्तज़ार रहता है  बहुत कुछ तुमसे कहना है दिल इज़हार करता है । इक बार ही सही आ जाओ मिलने उसी मोड़ पर  कुछ देर ठहर कर चले जाना चाहे   वहीं छोड़ कर  क़सम मेरी मुझको नहीं रोकूँगी तुम्हें मजबूर  कर  जी लूंगी तेरी बेरुखी को ही तेरा प्यार समझ कर । आंखें रोये भी तो तुझे भूल जाना मेरे वश में नहीं  तुम्हें याद करने से गिले भी मुझे रोक सकते नहीं  मेरी सांसों में तूं रूठकर जुदा सांसों से होना नहीं  भले तूं रूठ जाना रस्म मनाने के  भूल  जाना नहीं । तुझे  कैसे मनाएं   कुछ तो  तरकीबें ही बता देते ग़र  भले ही  गिरवी रखनी पड़ जाती ये ज़िन्दगी अगर  तेरी ख़ुशी लिए अदा करती मोल  ख़ुद को हारकर  कितनी ख़ुशी मिलती तेरा मान जाना  बेकरार कर । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

अभी प्यार की ख़्वाहिशें ज़िंदा हैं इसलिए

तुम तो दिल-ए-नाशाद कर  गये दर से मेरे । मैंने हंस कर विदा किया दर्द दिल में लिए ।  आख़िर तेरी ख़ुशी का था सवाल जो यहां ।  था मलाल मगर ख़ुश रहे तूं हंसी इसलिए । क्या कहें भी दास्तां ज़िन्दगी की किसी से  नाम तेरा न आये  होंठ   सील लिये  इसलिए  ख़ुद ही मरहम लगाती चोटिल ज़ख़्मों पर  अभी प्यार की  ख़्वाहिशें  ज़िंदा हैं  इसलिए । चाहे जो भी ख़ता हुई हो न  ऐसी सज़ा दो  चाहे जितने भी ख़फ़ा चलो वज़ह बता दो  मुझे भूलाने का ख़्याल दिल में लाना नहीं  जाना है जाओ न सिर्फ़ तुम्हारा हूं बता दो । शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित 

तेरे सिवा भी हैं बहुत लोग इस जहां में ओ सितमगर

तुम मिलोगे नहीं ये भी पता कभी ज़िन्दगी में मुझे  फिर भी तेरा  इन्तज़ार इन आंखों को रहता है क्यों  जिन रास्तों पर मिलकर जुदा हुए तुमसे हम कभी  उन रास्तों पर जाकर ये दिल बेक़रार रहता है क्यों । मालूम है कि  तेरे दिल में मेरे लिए   जगह  कोई नहीं  फिर भी तेरे लिए इस  दिल में  प्रेम  मचलता है क्यों   कितना नासमझ, नादां है दिल ये मेरा ओ बाज़ीगर  कि घाव पाकर भी दर्द का तलबगार रहता है क्यों । जबकि हाथ की रेखाओं में नाम तेरा खुदा ही नहीं  तो नयनों में तेरे नाम का खुमार चढ़ा रहता है क्यों  जानती हूॅं जुदा हैं तेरे औ मेरे  मंज़िल की  राहें  मगर  उस मंज़िल पर  चलने को तड़फड़ाता रहता है क्यों ।  विधी कैसी रचे आका भी  तुझे पाना लिखा ही नहीं  दिल पर इस क़दर यादों का अधिकार  रहता है क्यों  कितनी नासमझ धड़कनें हैं मेरी कुछ समझती नहीं  तो  ऐसी खता  दिल  आखिरकार करता रहता है क्यों ।  खुशी दे न सके दर्द देने का मिज़ाज जिस शख्स  की   ऐसी सौ...