जान भी ले लिया औ ज़िंदा भी ना छोड़ा दिल्लगी ने



इस क़दर जिसको चाहा उसकी मुस्कान की खातिर ।
हर दर्द ख़ुशी से अपना ली उसकी ख़ुशी की खातिर ।।
खोई रही सदा जिसके ख़यालों में ख़ुद को भुलाकर ।
बदल गया वो गुजरते वक्त के साथ मुझको भुलाकर ।।

ना अपना बनाया न रहने दिया किसी के क़ाबिल ही ।
नफ़रत भी नहीं न रखा हासिल करने के क़ाबिल ही ।।जाने कितना लगेगा वक्त उसे भुलाने की कोशिश में ।
गंवा रही ज़िन्दगी व्यर्थ दिल बहलाने की कोशिश में ।।

हम हम ना रहे दर्द इतना सहा मसखरी में ज़िंदगी ने ।
जान भी ले लिया औ ज़िंदा भी ना छोड़ा दिल्लगी ने ।।
बहुत रोये थे बिछड़ते वक़्त फैसला आसान नहीं था ।
फासले का ग़म बहुत जुदाई ऐसे होगी भान नहीं था ।।

गज़ब का कलाकार निकला वो अपनापन दिखाकर ।
बर्बाद किया जिन्दगी ख़्वाबों के सब्जबाग दिखाकर ।।
ज़िंदगी भर की चुभन खुशी को तरसती रही उम्रभर ।
आखिरी सांस तक किया इंतज़ार आंखों में अब्र भर ।।
अब्र-- बादल,घटा
शैल सिंह 
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