ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे


दिल का दरवाजा रोज़ खटखटाया ना करो
अपना चेहरा मेरे ख़्वाबों में सजाया ना करो ।

तुम्हारी यादों में भूली ज़माना और ख़ुद को
तेरे सिवा ना अपनाया अभी तक किसी को 
ज़िन्दगी भर रहा मलाल इसी बात का मुझे 
कितना चाहा तुझे था बता न पाई तुझी को ।

भले ही रह गयी हो अधूरी मेरी चाहत मगर 
तूं दूर रह कर भी है पास मेरे हर वक़्त मगर 
अधूरा रह कर भी रिश्ता ये खतम नहीं हुआ
देते ढेरों सुकूं दिल को यादों के दरख़्त मगर ।

कितना समझाते हैं दिल को भूल जाये तुझे
तुम मेरी क़िस्मत में नहीं थे बतलाये भी उसे
उसने नई दुनिया बसा ली कहा कितनी बार 
कहे और बढ़ती जाती याद कैसे भूलायें उसे ।

शैल सिंह 
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