शेर

निर्जन निराशा विरानियां तन्हाईयां खालीपऩ 
तेरी दी अमानतें,नज़र तुझे लौटाना चाहती हूँ
ख़्वाबों की हिफ़ाज़त करना नियन्त्रण में नहीं 
इक बार मिलो तो सही कुछ बताना चाहती हूँ ।

नज़र--तोहफ़ा
शैल सिंह 
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