शेर
निर्जन निराशा विरानियां तन्हाईयां खालीपऩ
तेरी दी अमानतें,नज़र तुझे लौटाना चाहती हूँ
ख़्वाबों की हिफ़ाज़त करना नियन्त्रण में नहीं
इक बार मिलो तो सही कुछ बताना चाहती हूँ ।
नज़र--तोहफ़ा
शैल सिंह
सर्वाधिकार सुरक्षित
ना मैं जानूं रदीफ़ ,काफिया ना मात्राओं की गणना , पंत, निराला की भाँति ना छंद व्याकरण भाषा बंधना , मकसद बस इक कतार में शुचि सुन्दर भावों को गढ़ना , अंतस के बहुविधि फूल झरे हैं गहराई उद्गारों की पढ़ना । निश्छल ,अविरल ,रसधार बही कल-कल भावों की सरिता , अंतर की छलका दी गागर फिर उमड़ी लहरों सी कविता , प्रतिष्ठित कवियों की कतार में अवतरित ,अपरचित फूल हूँ , साहित्य पथ की सुधि पाठकों अंजानी अनदेखी धूल हूँ । सर्वाधिकार सुरक्षित ''शैल सिंह'' Copyright '' shailsingh ''
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