मुकम्मल वो भी ना होगा किसी का जुदा हो मुझसे

इक ज़माना गुजरा ख़्वाब सा लगता उससे मिलना 
पर तरसी निग़ाहों ने मुहब्बत को संजोया भी बहुत । 

मुद्दतों बाद इत्तिफ़ाक़ से वो आया भी तो इस तरह 
बड़ी शफ़क़त से गले भी मिला और रोया भी बहुत 
जाते-जाते विषाद दे गया अलविदा कह जुदाई का 
तो फिर चाहत की चाशनी में क्यों डुबोया भी बहुत ।

मुक़द्दर ने भी गजब खेल खेला मिला के बिछड़ाया 
हमीं से हमको दूर कर अश्क़ों में भिंगोया भी बहुत 
गया तो ख़्याल छोड़ गया क्यों मलाल इस बात का 
कभी तो एहसास होगा क्या पाकर खोया भी बहुत ।

मेरा होकर भी ना हुआ वो मेरा अधूरा रहा सफ़र यूं 
दिल लगाने का इनाम दर्द दिल में पिरोया भी बहुत 
मुकम्मल वो भी ना होगा किसी का मुझसे जुदा हो 
खुद को मुझमें छोड़ कब चैन से वो सोया भी बहुत ।
 
शफ़क़त--ममता, अपनापन 

शैल सिंह 
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