फीका लागे साजन तोरे बिना सोलहो सिंगार

हे बयार तनी दे आवा खबरिया परदेशिया के 
झुलसे विरहा तपन में शरीरिया हाल हिया के ।

महावर, मेंहदी, चूड़ी, बिंदिया, कुंडल कंठहार 
फीका लागे साजन तोरे बिना सोलहो सिंगार 
कबले जोगाईं हया संकोच में हियवा के बात 
साँझे भिनुसहरे रास्ता निरखीं बीते नाहीं रात 
चित्त धीर नाहीं उचट गई निंदिया अँखिया के 
झुलसे विरहा तपन में शरीरिया हाल हिया के ।

जोहत सुदिनवां हईं सवनवों बीतल जात बा 
सुलगता करेजवा देखा फगुनवां के आस बा  
भादों के रतिया डंसे बरसे नयना से बदरिया 
तोहार सुधिया तड़पावे डंक मारेला सेजरिया 
कहियाले निहारीं अइसे हम तोहरा रहिया के 
झुलसे विरहा तपन में शरीरिया हाल हिया के ।

सगरी सखियां गवने गईं संग अपने सजन के 
निसदिन बटिया जोहीं बटोही तोहरे अवन के 
बैरिन कोयलिया कुहुके कस करेजा मोर चीरे 
केकरा से सनेसा भेजीं कगवो नाहीं बैठे मुंड़ेरे 
काहे बेदर्दी भईला बुझला ना हमरे नेहिया के 
झुलसे विरहा तपन में शरीरिया हाल हिया के ।

शैल सिंह 
सर्वाधिकार सुरक्षित 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

नई बहू का आगमन पर मेरी कविता

" विश्वव्यापी व्याधि पर कविता पर कविता "

बे-हिस लगे ज़िन्दगी --