कितनी रातें जाग बिताया मैंने

जब निस्तब्ध होती रजनी तो सुनाई देती सदा तुम्हारी 
जब नूरानी होती रोशनी तो दिखाई देती छवि तुम्हारी 
जब मूंदती ऑंखें तो आ जाते हो दबे पांव ख़यालों में 
जागती रहती तो छीन लेतीं चैन हरजाई सुधि तुम्हारी ।

कभी तनहाई में भी नहीं तनहा रहने देतीं हैं यादें तेरी 
कभी सुकून से भी तो नहीं सोने देतीं बावरी यादें तेरी 
जिन आंखों को होती थी कभी ढेरों शिकायत नींद से 
वही हो गईं हैं ओझल तेरी यादों से कुपित हो दीद से ।

दुनिया को अन्देखा कर दिल में बस तुझे बसाया मैंने 
निशि दिन ऑंजन के जैसे आंखों में तुझे सजाया मैंने 
कहीं टूट ना जाए दिल आईने सा तेरी दी अज़ीयत से 
तुझे पता कि तारे गिन कितनी रातें जाग बिताया मैंने ।

कुछ छोड़ गये मुझमें कुछ ले गए मेरे भी मन का तुम  मखमली सेज पर चिनगारी छोड़ गये तड़पन का तुम 
ऐ मन के मुसाफ़िर लफ़्ज़ों से खेल रहीं उंगलियां मेरी 
कब आओगे राह निरखतीं बेकल हो ये पुतलियां मेरी ।

दीद---आंखें,   अज़ीयत---पीड़ा
शैल सिंह 
सर्वाधिकार सुरक्षित 

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