सुवास बन आ जा प्रिये

दिखा सकी न ताण्डव मैं भीतर के शोर का
नख-शिख तक लपेटे रखी चुप्पी की चादर ,
छुपाये रखी दिल के पर्त में दर्द का ज़ख़ीरा 
हंसती मुस्कुराती कोरें पलकों की भींगाकर ।

वेदना के प्रसाधन से अन्तर का सिंगार कर 
मन का धो ली मलाल अश्रुओं के सैलाब से ,
जिस उर के उद्गार को ना कर सकी उजागर 
उसे कर ली महसूस धड़कन की आवाज़ से ।

तराश तेरी तस्वीर कल्पनाओं के तिरपाल पे 
प्रायः कर लेती दीदार तूलिका के इमदाद से ,
समीर के झोंकों सा सुवास बन आ जा प्रिये 
तुझे मिल जाऊंगी खड़ी तले तरू पलाश के ।

रहे उजाड़ सा मन का गलियारा गवारा नहीं 
गुजरे उमर सारी तेरी याद में भी गवारा नहीं ,
तरस रहे तेरी आवाज़ को अरसे से कान मेरे 
किसी ने मुझे मेरी प्रिये कह कर पुकारा नहीं ।

 इमदाद---मदद 

शैल सिंह 
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