मेरी सांसों में तूं रूठकर जुदा सांसों से होना नहीं
सदा आंखें टिकीं देहरी पर तेरा इन्तज़ार रहता है
बहुत कुछ कहना तुमसे दिल ये इज़हार करता है ।
इक बार ही सही आ जाओ मिलने उसी मोड़ पर
कुछ देर ठहर कर चले जाना चाहे वहीं छोड़ कर
क़सम मेरी मुझको नहीं रोकूँगी तुम्हें मजबूर कर
जी लूंगी तेरी बेरुखी को ही तेरा प्यार समझ कर ।
आंखें रोये भी तो तुझे भूल जाना मेरे वश में नहीं
तुम्हें याद करने से गिले भी मुझे रोक सकते नहीं
मेरी सांसों में तूं रूठकर जुदा सांसों से होना नहीं
भले तूं रूठ जाना रस्म मनाने के भूल जाना नहीं ।
तुझे कैसे मनाएं कुछ तो तरकीबें ही बता देते ग़र
भले ही गिरवी रखनी पड़ जाती ये ज़िन्दगी अगर
तेरी ख़ुशी लिए अदा करती मोल ख़ुद को हारकर
कितनी ख़ुशी मिलेगी तेरा मान जाना बेकरार कर ।
शैल सिंह
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