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शक्ल ढाले हैं जिनके हर हर्फ़ में

चाहती दर्द गाऊं पिरो गीत में  सुनने वाला कोई ऐसा हमदर्द हो  दिल के साज़ों के तारों को छेड़े कोई  तो सुनाऊं ग़ज़ल की तरह मर्म को । मन के अंदर समन्दर का तूफ़ान है  रोकर आँसू के मोती ना खोना मुझे  मन में छुपा पीर बह जायेगा अश्रु में  जो अज़ीज़ है दिल से खिलौना मुझे । अब ना और इम्तिहान ले ऐ ज़िन्दगी  कोई समझता नहीं अश्क़ों की ज़ुबान बिना आवाज़ रोने के दास्तान को  समझता कहाँ है बेरहम ये जहान । दफ़्न होकर ही रह गईं ख़ामोशियों में  जो मोहब्बत थी धड़कन ,एहसास में लब की ज़ुबान से जो कह ना सकी   तर कर ली ऐन की घटा के बरसात में । कहीं धुल ना जायें लिखे अल्फ़ाज़ मेरे  शक्ल ढाले हैं जिनके हर हर्फ़ में  कल्पनाओं के सैलाबों से डायरी रंग ख़ाक करती रही ज़िंदगी व्यर्थ में । ऐन ----ऑंख तर----भीगना शैल सिंह  सर्वाधिकार सुरक्षित