कितनों को हंसाया किये ख़ुद की हंसी के ठहाकों से 
क्या मालूम उन्हें कितना बेइंतहा ,ख़ुद रोये हैं रातों में ।

जब रजनी होती निस्तब्ध तो सुनाई देती सदा तुम्हारी ।
जब रौशनी होती नूरानी तो दिखाई देती छवि तुम्हारी । 
जब मूंदती ऑंखें तो आ जाते हो दबे पांव ख़यालों में । 
जब जागती रहती तो व्याकुल कर देती सुधि तुम्हारी ।

कुछ छोड़ गये मुझमें कुछ ले गए मेरे भी मन का तुम ।

तन्हाइयों में भी तन्हा रहने नहीं देतीं मुझे ।
कम्बख़्त यादें ये तेरी  सोने नहीं देती मुझे ।
जिन नैनों को थी मुहब्बत बेपनाह नींद से ।
हो गईं हैं वो भी बेपरवाह यादों से रूठ के ।

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