संदेश

गुजरे ज़माने की बातें

काल खण्ड की बातें  सब कुछ आज है पास मेरे  नहीं जो साथ रहा करते थे हम बाबूजी की पर्णकुटी में  आनंद विहार किया करते थे , थोड़ा ही सुख था तो भी क्या  दुःख थोड़ा ही किया करते थे  बैठ कुटुम्ब कबीला संग,नव  प्रेरक सद्भाव बहा करते थे , अभावग्रस्त था जीवन फिर भी  लघु दीप जला करते आदर्शों के  अनुकंपा असीम देवों की बरसती  लक्ष्य होते बस रोटी,घर,वस्त्रों के , नत शीश हृदय से जोड़ अंजुरियाँ  प्रभु का आह्वान किया करते थे  देवत्व,साधना,तप,स्तुति में नयना  शाश्वत सुख अभिराम किया करते थे , तृप्ति थी संतुष्टि अपार भी  अवसाद नहीं दबाव था कोई  नेह,दया,अनुराग अलख भाव  मन आँगन करुणा पूँजी बोई , नहीं ईर्ष्या,द्वेष,क्लेश किसी से  ना दंभ,भय,लोभ किसी से कोई  पाट की खाट पर सारी रतिया  सबने सुख की निंदिया सोई , साधन,सम्पति,समृद्धि सब कुछ  हृदय घट ही क्यों है सूख गया  जिस पनघट पर सब मिलते थे,वो  अलमस्त आलम कहाँ म...

कुछ क्षणिकाएँ

हे मेरे अन्तर्यामी प्रभो   जीवन के  सूने स्वप्न सदन में   सृष्टि  की  समरसता  भर  दो   उद्भ्रान्त पथिक के विवर मन में            शाश्वत जीवन का रंग भर दो , लगता मेरा दुःख सबका दुःख है  सबका दुःख मेरा अपना दुःख है  तभी तो  राग एक  है रंग अनेक  और भाव एक है बस अंग अनेक , हम सब जलती आग के ईंधन हैं  मरना सबको इक दिन सत्य यही  क्षणिक मिलन के मोद में भूलें ना  मिलने औ बिछड़ने के तथ्य कहीं , दृढ़ प्रतिज्ञ हों तन-मन से यदि  तो नहीं असम्भव होता कुछ भी  जितनी विकट हो राह लक्ष्य की हो जाती सुगम पथ कंटकमय भी , कभी लक्ष्य नहीं देखता     धुप,ताप,छाँह,बिजलियाँ        पग चल पड़ते हैं बेपरवाह          दिशा की खोज में अन्जान              चाहे लाख काँटों भरी हों...

माँ अम्बे

           माँ अम्बे ये शिलाएं तो बेजान शिल्पी की रचना क्यूँ भटकती रही आज तक द्वारे-द्वारे माँ के दर्शन को प्यासी ये दोनों आखें जगदम्बे बसी जब कि उर में हमारे , मन में विश्वास का एक मन्दिर बनाकर कल्पनाओं में साकार प्रतिमा सजाकर सच्ची लगन का दीया,धूप,चन्दन,अगर अखण्ड श्रद्धा की रोली,अक्षत चढ़ाकर , विश्व संताप के शमन को हवन हैं किए सुख शांति औ समृद्धि अमन के लिए आरती भी उतारी पूजन,अर्चन किया शीश चरण में झुकाया नमन के लिए , जग की नैया डांवाडोल अब हो रही देवभूमि से संस्कृति विलुप्त हो रही हम सबकी आधार माँ बस तू-ही-तू टूटी कश्ती की पतवार इक तू-ही-तू , दोनों कर जोड़ती अर्चना सुन ले माँ स्याह फैला अँधेरा धरा पर मिटा दे मन से मन के सभी टूटे तार जोड़कर प्रेम की जग में पावन सी गंगा बहा दे , मन के दुर्भाव कर भष्म नैन ज्वाल से जग में सद्भाव भर दे अभय हस्त से हम सन्मार्ग पर ही सदा चलते जाएं कभी जिसपे न आँधी औ तूफान आए , भाव भक्ति का भर सदाचारी बना स्वार्थ सारे मिटा परोपकारी बना शिष्य तेरे सभी स...

''अपनों ने जो दर्द दिया''

अपनों ने जो दर्द दिया कहना तो चाहुँ बहुत कुछ मगर सम्भल जाये ज़ुबाँ तो मैं क्या करूँ , शब्द शिकवे के बड़े ही लचीले यहाँ अर्थ का अनर्थ ना हो जाए कहीं मोड़ एक पड़ाव पर जो ठहरे अभी हैं परे हटकर कुछ हो ना जाये कहीं मैं अनुरक्त उनकी वो समझ ना सके भ्रान्ति मन में उठे तो मैं क्या करूँ । लाख दे दो हमें तुम बद्दुवाएं मगर साये से अपने विरत ना करना कभी मुझसे प्रश्नों की झड़ियाँ लगाने से पहले अरे परखा तो होता विश्वास को भी पृष्ठ पीछे क्या-क्या गुल खिला दिए गये  आप मुझसे छुपाएं तो मैं क्या करूँ । उस ग्रन्थि को कैसे सुलझाऊँ भला,जो निपुणता से रंग-रंग में बोई पिरोई गई मिलेगा कहाँ रंग-रोगन खुद ही बता दो पालिश कला में ये जुबां जो डुबोई नहीं मुझे तूलिका में सही रंग भरने ना आया हजार रंगों की ये दुनिया तो मैं क्या करूँ । अब समझने को बाक़ी कुछ भी नहीं भाषा भावों की आती है पढ़नी मुझे विवश धैर्य का ज़ाम थामे मैं घुटती रही सही समय की प्रतीक्षा ने रोका मुझे कौन कितना ग़लत कौन कितना सही आप इससे अन्जान हैं तो...

नक़ाब पर ग़ज़ल

नक़ाब पर ग़ज़ल  चलती थी सड़कों पे बेनक़ाब हुस्न  ने  परदा  गिरा  दिया  जब   याद  ज़माने  ने  मुझे  उम्र  का  दरजा दिला दिया ।  क़ैद कर लो हिज़ाब  में जरा   ये शोख़ अदाएं ये मस्त जवानी  कह - कह कर बुज़ुर्गों  ने  मेरे ज़िस्म का ज़र्रा-ज़र्रा जला दिया ।  मुड़ -मुड़  के  देखते  थे  लोग  जिस गली से  कूच करती थी  मेरी  बेबसी का ऐ  खुदा  तूने  अंजाम  ये कैसा  सिला दिया ।  इस बेबसी  में बतायें ज़नाब  मुस्कराएं तो भला हम  कैसे  कहाँ से आई ये पाग़ल शबाब   जो हमें परदानशीं बना दिया ।  रुख़ पे कैसा लगा रूवाब ये  किन अल्फ़ाज़ में कहूँ लोगों  इस बेकसूर  नूरे हूर  को बस  तसब्बुर का आईना बना दिया  ।                                ...

कुछ शेर

             कुछ शेर छोड़कर अपना सामा शहर आपके छोड़कर जब चली मैं शहर आपका अहदे-वफ़ा के महकते रस्ते वो लम्हें  साथ आया याद का कारवां आपका , तेरी अता करूँ या परस्तिश ऐ मौला कभी तो गुजारिश मेरी भी सुन ले भर दे झोली मेरी भी मता-ए-ऐश से मुज्ज़तर बहुत हूँ तारीक मेरा हर ले , भर दिए वक़्त ने तो हर ज़ख़्म लेकिन  वक़्त गुजारने में क्या से क्या गुजर गई क्या मालूम उन्हें शबे-फ़िराक़ की सदा ख़ामशी ना जाने क्या-क्या निगल गई । अता--तारीफ़ , अज़ाब--मुश्क़िल , मता-ए-ऐश--सुख चैन की पूंजी मुज्तर--घायल,दुखी,  तारिक--अँधेरा,  शबे-फ़िराक़--जुदाई की रात                                    शैल सिंह   

हे प्रभो

हे प्रभो  आस्था श्रद्धा की अविरल बौछार प्रभो जलधार समझ कर पी लेना , मेरी निष्ठा,नैतिकता,पुनीत कर्म को प्रभो अगर,अक्षत गंध बना लेना , मेरी साधन क्षमता ही तेरा नैवेद्य प्रभो सम्पदा का चन्दन घिस लेना , करुणा दया सद्दभाव समझ भोग प्रभो सद्द्गुणों का दीप जला लेना , चरण रज सामर्थ्य का पुष्प अर्पित प्रभो अनुकम्पा असीम बरसा देना , अस्तित्व तेरा जग में है अन्तर्यामी प्रभो अद्वैत चमत्कार दिखला देना , मन का मनोरथ तिरोहित कर देना प्रभो विश्वास बलवान बना देना ।                                                    शैल सिंह