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" पी ज़हर का प्याला भी ये दर्द मरता नहीं "

" पी ज़हर का प्याला भी ये दर्द मरता नहीं " मृदुल अहसासों  का असंख्य  उपहार दे ग़म,दर्द, ख़ुशी प्यार का अनन्य संसार दे  प्रीति की  ज्योति आँखों  में जलाकर गये चैन दिन का  नींद रातों की  चुराकर गये । मधुर बोलों से कर के  गुञ्जार श्रवणेंद्रियाँ अपने आधीन कर श्वांसें,धड़कनें,इन्द्रियाँ छू गात अनुराग से चित्त गुदगुदाकर गये मंजु कलिका उर में प्रेम की उगाकर गये । दिल,ज़िगर,क़रार सब अपने संग ले गये शूल इंतज़ार के एवज में वे बेअंत दे गये    रंगीन ख़्यालों के भंवर में उलझाकर गए तृषित नयनों में भोली छवि बसाकर गए । शरीर मेरा है मगर जीव  मुझमें मेरा नहीं उनके रंग में घुल बह रही अधीर मैं कहीं ले परिधि में बांहों के ज़न्नत दिखाकर गए  अनुराग का आसव  नैनों से पिलाकर गए । लगे सरसराहट हवा की मुझे आहट तेरी राह भूले गली का भला किस बाबत मेरी  क्यों झूठे वादों का दिलासा दिलाकर गए सितारे आसमानी दिवा में  दिखाकर गए । चाँद,तारे क्षितिज ...

नज़्म '' मेरे लफ़्ज़ों का दर्द क्या है वो काग़ज़ ही जानते हैं ''

 '' मेरे लफ़्ज़ों का दर्द क्या है वो  काग़ज़ ही जानते हैं  '' कहते हैं लोग मुझको दीया साँझ को जलाया करो जबकि रहता मकाँ रौशन उसके यादों के चराग़ से अब तलक ज़ेहन में ताज़ी है वस्ल की सुहानी रात कभी हिज्र में भी ना हुईं रुख़्सत वो यादें दिमाग़ से । बहुत सोचा कर दूँ ख़यालों को आज़ाद ग़िरफ़्त से      ख़ुश मिज़ाज यादें छोड़तीं ना पीछा दिल तोड़ कर  शुक्र है कि कर लेती हूँ  दर्द बयां लिख काग़ज़ों पर  वरना अब तक बिखर गई होती दिल कमजोर कर । जबकि मालूम ख़्वाब झूठे पर जिंदा रहने के लिए मेरी तन्हाइयों,ख़्वाबों को और महका जाता है वो ये कैसा अनूठा रिश्ता ज़ुदा हो भी नहीं होता ज़ुदा मेरी हर रात,अलस्सुबह ग़ुलों से सजा जाता है वो । कैसे सीखूँ  श्वासों में बसा उसे  भूल जाने का हुनर बड़ा दर्द होगा मर के जीना रातों का दर्द मिटाकर  घुल-घुलकर भुला दिया ख़ुद को उसकी चाहतों में उसकी आदत सी है रखा जिगर में दर्द संभालकर । सारे रिश्ते तोड़े उसने ताउम्र ब...

गूँगे कतरों में डूबे रहे दरिया की तरह

गूँगे कतरों में डूबे रहे दरिया की तरह झूठी मुस्कुराहटों के सूखे होंठों पे दर्द लफ़्ज़ बन उसे कर देंगे बज़्म में बेपर्द । पीये होती ग़र शराब हो जाता वबाल इसलिये पी लिया समन्दर आँखों का यदि होता हक़ीक़त सब पूछते सवाल इसलिये छुपा लिया बवंडर आँखों का । किसे परवाह इन मासूम आँसुओं की   तैरे बेबसी की  किश्ती सब्र आँख का रहके पलकों की हद में,लब रख हँसी करता रहता ख़ुदकुशी अब्र आँख का । ख़ुदा जानता है मेरे दिल में बात क्या वो होता बेनक़ाब कह देती बात क्या मुझको नहीं देना हर बात का जवाब ख़ामोशी बता देगी  दिल में बात क्या । ज़िन्दगी की भी कैसी हाय ये बेचारगी   रोने को विवश, ज़ब्त करने में लाचार  गूँगे कतरों में डूबे रहे दरिया की तरह भीतर की तबाही के सह के अत्याचार । अनायास खर्च किया मैंने आँसू हज़ार  बेवफ़ाई के मंडी में हुई वफ़ा शर्मसार चुपचाप बिखर जाऊँ या करुँ बयां दर्द या काटूँ सज़ा उम्मीद की करुं इंतज़ार । सर्वाधिकार सुरक्षित  शैल सिंह आँख

सुशांत सिंह राजपूत पर कविता '' हम सबके दिलों में रहोगे जिंदा मरते दम तक ''

सुशांत सिंह राजपूत पर कविता  हम सबके दिलों में रहोगे जिंदा मरते दम तक  होता नहीं यक़ीं कि तुम इस जहाँ में अब नहीं अश्क़ बहें तेरे याद में आँखें किसकी नम नहीं मुक़र गई नींद नैयनों से बिलखते गुजरती रात तुम अब लोक में नहीं कैसे दिलाएं यह विश्वास  , तस्वीर तेरी जब कहीं दिखाई देतीं आँखों को छलक उठते हठात् आँसू भींगो देते गालों को    जैसे ऋतु बरसात की आँखें रहतीं हरदम नम    क्यों मौत को लगा गले दिये इतने तुम ज़ख़म , अच्छा हुआ दिन शोक का देखने से पहले माँ  परलोक गईं सिधार वरना देखतीं यह हाल ना   न जाने बीतती क्या माता पर कैसा होता मंज़र असह्य वेदना सोच नयन में उतर आता समंदर , क्या होगा हाल पापा का इक बार भी न सोचा   थे इकलौते भाई बहनों के इक बार ये न सोचा  कैसी वेदना थी मन में ऊफ़ मथते रहे ख़ुद को  कष्ट यही,लेते व्यथा बांट दंड देते नहीं ख़ुद को , मातम अरमां का मना मृत्यु का ख़याल छोड़ते किसका डर,भय किस बात का मलाल बोलते कचोटता है हृदय सहा अपार द...

“ हम हैं विश्वगुरु “

भारत फिर से विश्व के मानस पटल पर एक अलग पहचान बना रहा है ।                                                        ' हम हैं विश्व गुरु '     हो चाँद हमारी मुट्ठी में हमें करना सूरज भी बस में      उत्तुंग शिखर से सागर तक हम चमकें सारे जग में । शांति,अमन के हम प्रहरी तुझे पाक उत्पात मचाना आता  जब ख़ुश्बू होगी आम हमारी करनी पर होगा तूं पछताता । हम बेजा वक़्त नहीें गंवाते तुझ सा असभ्य हरकतें कर के  करना मुकाबला तो आओ ना पथ विकास के चल कर के ।   भगवान हमारे मस्जिद में रमते ख़ुदा रहता मन्दिर में तेरा हम सुनें अज़ान मस्जिद की सुने तूं स्त्रोत मन्दिर का मेरा । हम मलयज सा महक फ़िज़ा में बिखरा रहे दिन-प्रतिदिन  ग़र देते लोबान का तुम सोंधापन आकंठ लगाते निशदिन । चाँद पर होगा घर अपना करेगा सूरज भी मेहमाननवाजी  बिछाओ चौपड़ की कोई भी बिसात हम जीतेंगे हर बाजी । जल,वायु,अवनि,अंबर ...

लॉकडाउन की तन्हाई पर कविता

गुमसुम सी है सुबह,सुनसान शाम आजकल  ख़बरदार मेरी तन्हाई में न डाले कोई ख़लल । करीब मेरे बेहिसाब ख़यालों के आशियाने हैं  दिल के बन्द कक्षों में कई यादों के ख़ज़ाने हैं इसीलिए तन्हाईयां मुझे तनहा होने नहीं देतीं जगाकर रखतीं रात भर कभी सोने नहीं देतीं । मुझे भी हो गई अकेलेपन से मुहब्बत इतनी भाईं नहीं किसी की भी नजदीकियां जितनी ख़ुशी ना उदासी बैठे हैं ख़ामोश सुबहो-शाम लगने लगीं सुखदायिनी भी तन्हाईयां कितनी । फिर पुराने मौसम आ गये लौट के तन्हाई में  अपनों से बिछड़ना दर्द,ग़म जख़म जुदाई में जो बीता,गुजरा लिखा मन बहला लिया मैंने और तन्हाई में तन्हा ही जश्न मना लिया मैंने । विरां वक़्त मग़र हैं बिचरते माज़ी के कारवां  मुद्दतों बाद भी महसूती आज भी वही समां अतीत के सुरंगों में संजो रखी जो असबाब मेरी तन्हाईयां उनसे ही गुलजार औ आबाद । असबाब--सामान,वस्तु सर्वाधिकार सुरक्षित                 शैल सिंह

" बस चितवन से पलभर निहारा उन्हें "

वो जो आए तो आई चमन में बहार सुप्त कलियाँ भी अंगड़ाई लेने लगीं चूस मकरंद गुलों के मस्त भ्रमरे हुए कूक कोयल की अमराई गूंजने लगीं । फिर हृदय में अभिप्सा उमगने लगीं नयन में चित्र फिर संजीवित हो उठे           मृदु स्पन्दन अंग की उन्मुक्त सिहरनें  पा आलिंगन पुन: पुनर्जीवित हो उठे । स्वप्न पलकों के आज इन्द्रधनुषी हुए निशा नवगीत सप्तस्वर में गाने लगी हृदय के द्वारे मज़मा आह्लाद के लगे चाँदनी और शोख़ हो मुस्कराने लगीं । अधर प्यासे वो सींचे अधर सोम से  मन के अंगनाई शहनाई बजने लगी बस चितवन से पलभर निहारा उन्हें भोर की तत्क्षण अरुणाई उगने लगी । फिर से बेनूर ज़िन्दगी महकने लगी  जब से ख़ुश्बू उनकी घुली साथ है हरसू लगने लगीं अब तन्हाईयाँ भी उर घुला  मधुर मखमली  एहसास है फासले हुए ऐसे नदारद ज़िन्दगी से  खुशनुमा-खुशनुमा हर पल आज है जब से आए हैं वो वीरां ज़िन्दगी में तब से सारा शहर लगता आबाद है, भयभीत होती नहीं हो  घनेरा तिमिर चाँद सा हसीं महबूब...