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सन पन्द्रह ने दिया सन सोलह का उपहार

सन पन्द्रह ने दिया सन सोलह का उपहार हम नई ऊर्जा के साथ चलो नए साल का करें स्वागत सन पन्द्रह की दी सौग़ात का क्या लिया क्या दिया है इस गुजरे साल ने लिया भूलें,याद रखें क्या दिया नए साल में , गीले,शिकवे,मलाल,द्वेष,क्लेश,अहंकर का  नाश करें हम बुराईयों के हर अंतर्जाल का मिटा कर तूं और मैं का दर्प,संकल्प लेकर  फासले मन से मन के मिटा इंसानियत का   बेकस,बेसहारों को दें संबल सबल बाँह का आओ नयी ऊर्जा के साथ हम नए साल का करें स्वागत सन पन्द्रह की दी सौग़ात का । भरें प्रेम,सौहार्द्र के सागर से मन का गिलास ज़श्न की मस्ती में खोकर भींगें हम एक साथ पंथ,सम्प्रदाय पर फिर कोई सियासत ना हो इक दूजे के प्रति दिल कोई ख़िलाफ़त ना हो ख़ाहिश हर मौसम उलीचे शगुन का तोहफ़ा आओ नयी ऊर्जा के साथ हम नए साल का करें स्वागत सन पन्द्रह की दी सौग़ात का । आओ एक साथ वीणा उठायें भलाई का हम चलो मुस्करा के वादा निभाएं वफ़ाई का हम ख़िज़ाँ के दर्द का भी हम मिल करें आंकलन एकता की ख़ुश्बू से करें मह-मह...

मन इतना आर्द्र है की बस .... मत पूछिये

मन इतना आर्द्र है कि बस मत पूछिये पठानकोट में शहीद हुए वीर जवान जो उनकी श्रद्धांजलि में अभी शपथ लो हिन्द के नौजवानों डटकर इन्तक़ाम लेने का ये सिलसिला तभी थमेगा जब  घुसकर तुम भी पाकिस्तान में मुँहतोड़ जवाब दे ऐसा हश्र करोगे पापी निशाचरों के ख़ेमे का । जो मक्खी,मच्छर जैसे पैदा करती तादातों में वाहियात औलादें ना कोई तहज़ीब,संस्कार सीखातीं बस जनती रहतीं हरामज़ादे उन्हें कोई अफ़सोस फ़र्क़ नहीं गोजर की एक टांग टूट जाने का ग़र महसूसती वज्र का पहाड़ टूटना मलाल होता कुछ खोने का । पर तेरी बहना तो थाल सजा बैठी थी इकलौते भाई की राहों में मेंहदी रचे हाथ,भरी चूड़ियाँ जो सिंगार तब्दील हो गए आहों में हसरत से देखती रस्ता जिस माँ की आँखों में निर्झर आँसू उमड़े उस वीर सैनिक की शहादत पर लेने होंगे तुम्हें भी फैसले तगड़े ।                                                             ...

चर्चा सारे शहर में तेरे नाम का

जाने किसने शरारत में गुगली है की बदनाम करने पर तूला रिश्ता पाक का चर्चा सारे शहर में तेरे,मेरे नाम का , अभी आँखों में बस था बसाया तुझे दिल की किताबों में था छुपाया तुझे अभी पन्ने पलटकर भी देखा नहीं अभी अलकें ना खोलीं कहीं राज की तुझे पलकों की छत पर भी रखा नहीं जाने किसने फैलाया धुवाँ आग का चर्चा सारे शहर में तेरे,मेरे नाम का । बस शराफ़त के तेरे थे कलमें पढ़े तेरी चर्चा पे थे कुछ कसीदे काढ़े भींड में भी नज़र का तुझे ढूंढ़ना ज़िक्र पर तेरे,लब का महज़ खोलना धड़कनों की ग़दर ही खबर बन गई जाने किस गंध ने दी पता हाल का चर्चा सारे शहर में तेरे,मेरे नाम का । कोंपलों ने अभी पांख खोला ना था गुप्त तहखाने का राज डोला ना था लफ़्ज़ निर्लज्ज हो कुछ भी बोले ना थे ख़्वाबों के पांव बाँधी थीं पाज़ेब तरंगें थीं स्वप्न के माथ चूमीं निगोड़ी उमंगें जाने क्या हश्र होगा इस तूफ़ान का चर्चा सारे शहर में तेरे,मेरे नाम का । सुलगती चिलम सी सीने में अगन इश्क़ की आग तपता भट्ठी सा वदन क्या तुझको भी ऐसे ज्वर की ताप है तेरे दिल का भी द्वार...

हरियाई लगे है मुरझाई लता द्वार की

हरियाई लगे है मुरझाई लता द्वार की कहां आया भटकता हुआ तूं अजनबी  हूर का दीदार करने हीर की इस गली । तेरी निग़ाहों ने ऐसा क़तल क्यों किया कि ज़िबह होते गए दिल के रुतबे मेरे हाथ खड़े कर दिए रसूखी प्रहरी सभी  टूटते गए इख़्तियार के सभी क़ब्ज़े मेरे । तुमने दीदा से दिल का हरफ़ पढ़ लिया नाम अपने वसीयत ज़िगर की लिखाई जादूई रंग भर दिया खाली कैनवास में कि हाथ मैंने मोहब्बत की मेंहदी रचाई । कोई अक़्स देखे न चश्म में महबूब की दुनिया से कटकर फ़र्लांग भरने लगी हूँ जमीं पर चांद गगन से उत्तर आया लगे तांत हसरतों के दिन-रात बुनने लगी हूँ । चुपके आके पवन कान कुछ कह गई हरी लगने लगी मुरझाई लता द्वार की भर लिया फाग का रंग ओढनी में सब छू रहा अम्बर चरन पूछ पता प्यार की । ज़माने की परवाह पीछा ना करती रहे तोड़ आई रिश्ते सभी पाषाणी नगर से किस्मत की लकीरों पे  दास्ताँ छोड़कर  अस्त सूरज के पहले चली आई घर से । चोरी के अब तक पड़े हैं जालिम निशां नकब  सीने में आँखों से तूने लगवाई जो देख वदन की उधे...

माँ लौट आऊँगा जब भी दोगी सन्देश

माँ लौट आऊँगा जब भी दोगी सन्देश संग ले गया वह घर की रौनक़ें सारी बुढ़ापा संग सांय-सांय करे फूलवारी, सावन भादों सी झर-झर बरसें आँखें जबकि बरसात का मौसम बीत गया सरहद पार बसे किसी और मुल्क़ जा उन औलादों के विषय में क्या कहना , किस मोहपाश में बांध रखी फिरंगन कि भूला गाँव,गली शहर अपना देश आँखों में सपने भर जो कह गया था   माँ आ जाऊंगा जब भी दोगी सन्देश , बूढ़ी हो गईं आँखें अब तो इंतजार कर शिथिल पड़े उमड़ता ममता का सागर जाने कब बाती गुल हो जाये दोनों की हृदय के ख़्वाब सुनहरे रह जाएँ क़ातर  पहले यदा कदा पाती भी आ जाती थी अब तो वह कड़ी भी धीरे-धीरे टूट गई जाने कब आएंगे परदेश को जाने वाले सांसों की डोर शनैः-शनैः अब छूट रही अपनी मंज़िल छोड़ मंज़िल तलाशने निकला था घर से अपनों से दूर बहुत माँ-बापू का कांधा भूल खो गया कहाँ कभी न मुड़कर देखा हृदय शूल बहुत , जमीन,ज़ायदाद,मकान जिनके लिए, किये,यत्न से तृण-तृण पाई-पाई जोड़ उस घर का देखो...

नाता तुड़ा दिया नईहर के सारे

अभी-अभी बेटी की शादी करके लौटी हूँ बेटी विदा करने का उद्वेलन क्या होता है बेटी वाला ही जान सकता है ,मैं भी अपने बाबूजी की बेटी थी ,अपने प्रियजनों से जुदा होते समय बेटी के मन में क्या आन्दोलन होता है ,वही हृदयस्पर्शी भाव मेरी कविता में व्यक्त है ,यह  हर बेटी की पीड़ा का असह्य व्याख्यान है । पिता ने लाड़ की नदी बहाई माँ ने ममता का सागर भैया के स्नेहिल बाँहों  की बड़ी हुई ओढ़कर चादर , परम्परा के निर्वहन में, मैं रीति की भेंट चढ़ा दी जाऊँगी कोई घोड़ी चढ़कर आएगा डोली में बिठा दी जाऊँगी , गाजे-बाजे साथ बाराती वर आया धूमधाम मेरे द्वारे चुटकी भर सिंदूर मांग भर नाता तुड़ा दिया नईहर के सारे, फूट-फूट रोई माँ मेरी पिता ने रुँधे गले दी ढाढ़स भैया विलख दिए कांधा सौंप दी अपनी पूँजी पारस , आँसुओं की छछनी बाढ़ भी जुदा करने से रोक नहीं पाई सर पे डाल ओहार चूनर की कर दी गई मेरी विदाई , जब से जनम लिया है सुनती आई पराई धन हूँ ये कैसी है विडम्बना ,मैं तुलसी और किसी आँगन हूँ , स्वयं लहू से सींचा माँ ने पिता ने धन दौलत था समझा भैया ने न...

कुछ पंक्तियाँ बिखरी-निखरी

चित्र
१-- कभी काजल के मानिन्द बसे हम उनकी बेजार निगाहों में अब नौबत कि नजरें चुराकर बगल से गुजरा करती उनकी , २-- मेरे ख़्वाबों में दबे पांव आता है कोई आकर मुझे  नींदों से जगाता है कोई , ३-- कम्बख़्त नज़र एक सी आग लगाई दोनों तरफ वहाँ करार उन्हें नहीं इधर चैन बेक़रारी को नहीं , ४-- जल कर मोहब्बत में दिन-रात दिल खाक़ कर लाए न बहारों का लुत्फ़ ले पाये न ख़िज़ाँ के साथ रह पाए , ५-- वायदों का अलाव जलाकर इन्तज़ार किया बहुत ऐतबार ने मगर क़त्ल किया है क़यामत की तरह , ६-- पाठ मोहब्बत का क्या पढ़ाया सबको भूला दिया तूने तो मासूम दिल पर  ऐसा कब्ज़ा जमा लिया पिला कर मय  निग़ाहों की दिखा  अदा के जलवे दूर ज़माने से किया  नकारा निकम्मा बना दिया , ७-- वहाँ घर उनके आई डोली इधर सर मैंने भी सेहरा बाँधा कितनी मजबूर मोहब्बत दुनिया से कर ना पाये साझा घर दोनों के रखना आबाद खुदा इतना तो रहम  करना जैसे राधा संग कांधा, इक दूजे के दिल में बसाये रखना । 8-- सूना कदम्ब सूना जमुना किनार...