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एक सिरफिरा

     एक सिरफ़िरा  लड़का --- जुल्फ़ों के घुँघर पेंच ना रुख़ पर गिराइए गेसुओं तले ना चाँद सा मुखड़ा छिपाइए  लत लगी नज़र को क्या नज़र है आपकी  बला की इस अदा से ना बिजली गिराइए ।  छुप-छुप के मेरे ख़्वाब ना दिल के चुराइए  ना बन के खुश्बू ख़्वाब के सिरहाने आइए  क्या हुश्न का जलवा क्या शक़ल है आपकी  ऐ अज़ीज ना इस फ़न का दीवाना बनाइए ।  लड़की -- कसम ख़ुदा की आपके जज़्बात को सलाम  होश फ़ाख़ता हो जाये न सुन मेरा ये कलाम नज़ीर बेमिसाल रब की हूँ होगा बुरा अंज़ाम   हुज़ूर दिल के इस हरिना को लगाइये लगाम । निग़ाहों की तीखी बरछी ना मुझपर चलाइये    इल्तज़ा है ज़नाब हनक से घर पर आ जाइये  गुरू ख़िदमत से होगी खूब हज़ामत आपकी   आकर पापा से आशिक़ी का भूत उतरवाइये। 

होली के लिए विशेष

            होली के लिए विशेष  होलिका दहन में मन का अहंकार दहन कीजिए मिल-बैठ बांटिये अग़र हो सके दुःख-दर्द आपसी इर्ष्या,द्वेष भाव,सन्ताप और विकार शमन कीजिए । सच्ची प्रीति की बरसातों का फुहार चलन कीजिए फाग गाते ढोल,तासे और मजीरे झूमकर बजाइए रंगों की होली धूम-धाम से जाकर घर-घर मनाईये खिलखिलाईए  खुलकर   मिटाकर  मन की तल्ख़ियाँ  ठण्डई, भांग  में  मिसरी  प्यार की घोल कर  पिलाइए । हमसे शांति औ अमन जाने ख़फ़ा-ख़फ़ा सा  है  क्यूँ   हम  गले से   लगाते जिनको  करते  जाने   जफ़ा  हैं  क्यूँ   उन्मादी हो  गए कुछ  लोग  जो  करते  ख़ता  बार-बार  उनको भी  जरा   मुहब्बत से अर्क प्यार का चखाईये ।      

मेरी पहचान 'शैल शिखर' सा

मेरी पहचान 'शैल शिखर' सा ग़र दे न सको कभी मान तो अपमान ना करो कभी ख़ुद के सस्ते नाम पर अभिमान ना करो ।  मैं कोई   नामचीन  हस्ती  की आवाज नहीं हूँ फिर भी  किसी परिचय का  मोहताज़ नहीं हूँ गीत,ग़जल  बस  शगल  मेरा अन्दाज़  यही हूँ 'शैल शिखर' सी हूँ  शैल  बस आगाज़ यही हूँ । दर्द-ए-ग़म ढाल गीतों,ग़ज़लों में मैंने गा लिया इस तरह नई  दुनिया मैंने ख़ुद की बना लिया जब-जब  किसी ने भेंट की तौहीन की सौग़ात  दिल में ज़ज्ब कर  उसे मैंने ग़ज़ल बना लिया ।  क्यों चश्में-नम हुई,का राज क्यों हैं आप पूछते आप की ही दी सौग़ात फिर क्यों  हैं  बात पूछते पूछना ही ग़र तो रख कर दिल पर हाथ पूछिए क्यूँ  आप  ऐसे हँसते हुए दुखते हैं लम्हात पूछते । जलाकर दिल का दीप घर में रौशनी कर लिया सब पूछते क्यों सारी रात 'शैल' जलता  है दीया जिस तरह   शमा  ये  रात भर जल कर जलायी है जानती हूँ  साथ  मेरे   सारी रात  जल रोया है दीया । क्यों बार-बा...

एक दीवाना ऐसा भी

एक दीवाना ऐसा भी  हटा दो लाज का  पहरा      सबर आँखों का जाता है            मेरी बेचैन चाहत को                अदा नायाब भाता है।  काली घटा सी जुल्फ़ें     क्या बिजली गिराती हो         मैं मदहोश हुआ जाता            ग़जब चिलमन गिराती हो।   चुराकर चैन सोती तुम       सपन की मीठी बाँहों में           पल भर कटी ना रातें              मगन बोझल निग़ाहों में।  अगर तुम ला नहीं सकतीं     जुबां पर दिल की वो बातें        निग़ाहों से बयां कर देतीं           जुबां और दिल की वो बातें। तेरे खंजर नयन नशीले     कहीं जान ना मेरी ले लें        सुर्ख लबालब होंठ रसीले         ...

कुछ शेर

कुछ शेर  तड़पा लो जी भरकर ये तेरे इख़्तियार में है मुझे तो तमाम उम्र तेरा इंतज़ार प्यार में है। हालातों के हश्र का कौन सा सुबूत पेश करूँ पत्थर के बुत सच की तासीर क्या समझेंगे कुछ मुक़द्दर से कुछ ज़िंदगी से फिर ख़ुलुश दे शौक से दिल की बर्बाद तबाहियों से खेलेंगे । थम जाती राह ज़िंदगी की सफ़र में अक्सर गुजरते हुए उन ख़यालों,ख़्वाब के मुक़ाम पर कहीं वो तो नहीं उनकी तस्वीर तो नहीं,ठहर जाती है,शाद हो मायूस ज़िंदगी हर नाम पर। निग़ाहें नाज़ से दर बदर ढूंढ़ती रहीं उनको जवां हसरतें झूमीं नशेमन,महफ़िल मगर  बुझ गए जल चराग़ भी बज़्म के इन्तज़ार कर सो गए रूठ जलवे भी क़ायनातों के बेख़बर। जीते हैं कैसे किस तरह ये सवाल ना पूछो वरना मायूस ज़िंदगी फिर मुरझा जाएगी इक बेवफ़ा यार की दी बेजोड़ अमानतें हैं ये कुरेदने से यादें फिर शोला भड़का जायेंगी। काश ! इक फरेबी के बेजां छलावे में आकर बेइंतहा प्यार न उस पर ऐतबार किया होता ना वो लूट मन की बहारें झूठी मोहब्बत में मेरी ज़िंदगी इस क़दर प...

मेरी ग़जल

         ग़ज़ल ज़ख़्म गहरा दिया है तुमने        मेरे ऐतबार को सिला कैसा दिया है तुमने       मेरे इन्तज़ार को          ज़ख़्म  ....... लब हैं ख़ामोश लहर सीने में       उठा देखा कि नहीं तूफ़ां  का  क़हर  कश्ती  पे      बरपा देखा कि नहीं सहना देखा सितम का उफ़ां     ज्वार  का देखा कि नहीं  सब्र कैसा दिया है तुमने    मेरे इख़्तियार को          ज़ख़्म   ......... बेरुख़ी क्यों वजह क्या आख़िर      कुछ तो बता दिया होता शीशा-ए-दिल टूटने से पहले      खुद को समझा लिया होता टूटा है भरम तेरा ऐ दिल,रस्क       इतना ना किया होता  किस ख़ता की दी सजा ऐ वफ़ा        दिले बेक़रार को               ज़ख़्म     .......... अंजुमन में ख़्वामख़्वाह आना      तरन्नुम बनकर...

ये चन्द शेर

                     चन्द शेर  लुटा कर दिल का ख़ज़ाना किसी पर खाली हो गई दिन ढल गए जवानी के हालत भी माली हो गई । इक वो भी ज़माना था जब देख भरते थे लोग आहें फ़रेबी मान चाँद का टुकड़ा फेरी सभी से थीं निगाहें। ज़ालिम निग़ाहों का कुसूर आज क्या ये हश्र हो गया जमात दर्द भरी शायरी का देखो ज़िंदगी में भर गया। दरक-दरक कर ढह रहीं आज अरमानों की मीनारें किसी ने ऐसी लगाई आग कि दिल में पड़ गईं दरारें। इक दौर था जल रहा ज़माना था हम मुस्करा रहे थे झूमते नज़ारे,मस्ती भरा आलम और गुनगुना रहे थे। इस क़दर क्यों बेवफाई,इश्क़ रुसवा जहाँ में हो गया इल्ज़ाम हुस्न पर लगा बदमज़ा दामन में शूल रह गया।