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'' वर्तमान परिदृश्य पर मेरे विचार ''

                             '' वर्तमान परिदृश्य पर मेरे विचार ''              एक इंदिरागांधी थीं कि अपनी दूरदर्शिता से पाकिस्तान का विभाजन कर दो राष्ट्रों का निर्माण कर भारत को अक्षुण्ण बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ीं , मुझे तरस आता है राहुल गांधी की बुद्धि और विवेक पर जो इस देश को इस देश के लोगों को अभी तक नहीं समझ पाये और समझने का प्रयास भी नहीं कर रहे अपनी दादी का नाम तो भुनाते हैं पर उनके उसूलों,आदर्शों ,सिद्धांतों का अनुसरण नहीं करते ,जिस देश को हमारी महान नेता श्रीमती इंदिरागाँधी ने अपने खून पसीने से सींचा हो उसी दूरदर्शी महिला का अपना नाती इतना घृणित और राजनैतिक गुंडेपन का परिचय दे रहा हो और उस बहरूपिये का समर्थन कर रहा है जो ये कहता है कि रोहित वेमुला मेरा आदर्श है मैं उस मंदबुद्धि से ये पूछना चाहती हूँ कि हमारे संविधान में आत्महत्या का क्या स्थान है हमारे संविधान में आत्महत्या को एक जघन्य अपराध माना गया है अरे आत्महत्या ...

ऐसी गलती बार-बार करुँगी

मिस्टर कन्हैया जेल जाना तो तुम्हारे लिए वरदान सावित हो गया ,जे एन यू से बहुत सारे नेता निकले लेकिन उनमें से गिने-चुने लोगों को ही यह देश जान पाया और तुम तो जेल से बाहर आकर अच्छी खासी भीड़ जुटाकर अपनी धाक ज़माने में कामयाब हो गए । एस सी एस टी ओ बी सी का कार्ड खेलकर तथा रोहित वेमुला का नाम उछालकर जिस तरह से युवाओं को भरमाने की विसात बिछा रहे हो वह तुम्हारी राजनीतिक कूटनीति की एक चाल मात्र है इससे इतर कुछ भी नहीं । जब कि तुम भी अच्छी तरह जानते हो कि जैसे इस देश में आये दिन विक्षिप्त लोग ख़ुदकुशी ,आत्महत्या करते हैं ,वैसे ही एक केस रोहित वेमुला का भी है वैसे तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है जो लोग अपनी समस्याओं से संघर्ष नहीं कर पाते वे इस तरह का कायरता पूर्ण कार्य अख्तियार कर लेते हैं।     कन्हैया तुम्हें भी अच्छी तरह पता होगा कि जिस नरेंद्र मोदी का आज तुम दहाड़कर मखौल उड़ा रहे हो इन  मानसिक दिवालियेपन वाली भीड़ों के समक्ष जिनका अपना कोई वजूद नहीं वरना सौ बार ये हुजूम सोचता कि कैसे देशद्रोही का हम जश्न मना रहे हैं और भाषण सुन र...

हमें रत्ती भर भी मंजूर नहीं कोई भारत माँ पर आँख उठाये

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हमें रत्ती भर भी मंजूर नहीं कोई भारत माँ पर आँख उठाये चाहे जितनी कर लो नारेबाज़ी कश्मीर नहीं हम देने वाले चाहे जीतनी चलो पैंतरेबाजी ये जागीर नहीं हम देने वाले हमें रत्ती भर भी मंजूर नहीं कोई भारत माँ पे आँख उठाये जिसे प्रिय है इतना पाकिस्तान जाके पाकिस्तान बस जाये , हमें नहीं ज़रुरत घाती गद्दारों,दुराचारी अलगाववादियों की कितने नमकहराम होते हैं हमारे ही टुकड़ों पर पलने वाले इन आस्तीन के साँपों को हमारा आदर,सत्कार नहीं भाता इनको चाहे जितना मक्खन दो होते मन के ये कपटी काले , हम नहीं कोई तमाशाई जो ख़ामोश अतिक्रमण इनका देखें ग़र हिंदुस्तान में इन्हें रहना है तो वन्दे मातरम कहना होगा उन्हें भी नहीं बख़्शना जिनकी सह पाकर मचा रहे बवण्डर इसी ज़मीं का गुण गाकर इन्हें हिन्द के लिए ही मरना होगा ।                                                           शैल सिंह

कितनी बार चली है सब्र पे आरी नहीं चैन से रहना है

कितनी बार चली है सब्र पे आरी नहीं चैन से रहना है                                                                                                                                                                                                                                              ...

अब राखें चिंघाड़ेंगी क्या पस्त हो

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अब राखें चिंघाड़ेंगी क्या पस्त हो झुग्गी झोपड़ियों में आग लगने पर  एक छोटी सी लुत्ती हुई शोख़ इतनी हवा के शहर का पता पूछकर पस गई ठाठ से झुग्गियों के नगर खाक़ कर डाली सब वस्तियां गेलकर अब राखें चिंघाड़ेंगी क्या पस्त हो ख़त्म कर सब कहानी पवन खेलकर मातम पर चल दिया हँसता हुआ  क्रूर विध्वंस कर नाद से बेखबर खुद के षड्यन्त्र में लुत्ती स्वाहा हुई मिली संयोग की संज्ञा विनाश झेलकर कोई भी अरमां की लाशों का ढेर देखकर कुछ ना पूछा भभकों का छाला कुरेदकर । पस --घुसना  ,गेलकर --मज़ाक़ कर 

'' एक छोटे से बालक की क्रन्तिकारी आवाज ''

 एक छोटे से बालक की क्रन्तिकारी आवाज   माँ मुझको वर्दी पहना दो देश की रक्षा करने जाऊँगा माँ सचमुच की बन्दूक दिला दो दुश्मन मार गिराऊँगा , आँखों में खून उत्तर आया है माँ देख जवानों की लाशें मत अबोध की बात कहो माँ सर बाँधो केसरिया साफे , फ़ेंक दिया माँ सारा खिलौना छोड़ा कंचा गिल्ली-डण्डा धधका रही प्रतिशोधी अंतर्ज्वाला बदल दिया है फण्डा , शान्ति अमन के पोषक घर घुस,दुश्मन ललकार गया है घर के घाती जयचन्दों टुच्चों का सुर दुश्मन ताड़ गया है , पहले निपट लूँ उन भडुवों  से फिर छलियों से निपटूंगा गिन-गिन हिसाब कपट का लूँगा फिर इनको भी सुतुंगा , माँ भैया की शहादत पर आँखों में मत आँसू भर लाना माँ वीरगति पर पापा के तुम गौरव चक्र लिए मुस्काना , मत राखी तोड़ गिरा बहना देखो दूजा भाई तैयार खड़ा उठो सजाओ चन्दन,थाली,रोली रिश्तों से है वतन बड़ा, माँ तूने तो गीता का सार बता नैतिकता का पाठ पढ़ाया दुश्मन की माँ होतीं गन्दी क्यूँ इतनी जेहादी पौध उगाया , आतंक का कोई ध...

सन पन्द्रह ने दिया सन सोलह का उपहार

सन पन्द्रह ने दिया सन सोलह का उपहार हम नई ऊर्जा के साथ चलो नए साल का करें स्वागत सन पन्द्रह की दी सौग़ात का क्या लिया क्या दिया है इस गुजरे साल ने लिया भूलें,याद रखें क्या दिया नए साल में , गीले,शिकवे,मलाल,द्वेष,क्लेश,अहंकर का  नाश करें हम बुराईयों के हर अंतर्जाल का मिटा कर तूं और मैं का दर्प,संकल्प लेकर  फासले मन से मन के मिटा इंसानियत का   बेकस,बेसहारों को दें संबल सबल बाँह का आओ नयी ऊर्जा के साथ हम नए साल का करें स्वागत सन पन्द्रह की दी सौग़ात का । भरें प्रेम,सौहार्द्र के सागर से मन का गिलास ज़श्न की मस्ती में खोकर भींगें हम एक साथ पंथ,सम्प्रदाय पर फिर कोई सियासत ना हो इक दूजे के प्रति दिल कोई ख़िलाफ़त ना हो ख़ाहिश हर मौसम उलीचे शगुन का तोहफ़ा आओ नयी ऊर्जा के साथ हम नए साल का करें स्वागत सन पन्द्रह की दी सौग़ात का । आओ एक साथ वीणा उठायें भलाई का हम चलो मुस्करा के वादा निभाएं वफ़ाई का हम ख़िज़ाँ के दर्द का भी हम मिल करें आंकलन एकता की ख़ुश्बू से करें मह-मह...