आज का दिन हिंदुस्तान के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है ,पूरा देश धूमधाम से आजादी का जश्न मनाता है,छब्बीस जनवरी के दिन हम आजादी के परवानों को,दीवानों को अश्रुपूरित आँखों से आजादी के गीत गाकर स्मरण करते हैं और श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं उन अमर शहीदों को याद करते हुए और सीमाओं पर तैनात प्रहरियों के लिए …। १- देशवा की ख़ातिर जान रखिके हथेली पे सीमवां पे देत पहरा भीषण सर्दी झेली के केहू क सजनवां हउवं केहू क वीरनवां हो केहू क ललनवां हउवं इंकलाव बोली के । अधूरा .... २-देश के जवानों तुझको शत-शत नमन है देश के दुलारों तुझसे ये रौशन चमन है दुश्मनों से महफूज रखना शहीदों की विरासत दुवा है हमारी दिल से रहो तुम सलामत सीमाओं पे डटके करते हम सबकी हिफाज़त किसी के ललन ,वीरन हैं सजन हैं अमानत । आज का ये शुभ दिन कभी ना भूलाना इल्तजा है देश...
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'दिल्ली तूं किस हाल में ' दिल्ली की राजनीति में आजकल जो भूचाल आया हुआ है जो उठा-पटक ,खलल मची हुई है उसकी जिम्मेदार खुद दिल्ली कि जनता है। भावावेश में बहकर दिल्ली की जनता ने जो अपने मतों के साथ खिलवाड़ किया है उसके परिणाम का हश्र खुद उन्हें समझ में आ रहा होगा,और ऐसा नहीं भी हो सकता है क्योंकि ये ज्ञानी और समझदार लोगों की जमात के लोग नहीं हैं। शीला दीक्षित सरकार का कार्यकाल देखा ही था फिर नए खिलाड़ीयों के साथ खेलकर क्या मिला,अस्थिरता कि तलवार हर पल लटकी हुई है,खींचतान मची हुई है। रोज लग रहे आरोपों-प्रत्यारोपों से निपटने में सारा समय जाया हो रहा है ,जनता कि समस्याओं का निदान करने का वक्त तो अपनी ही पार्टी कि समस्याओं से जूझने और निपटने में व्यतीत हो रहा है । भावनाओं की आंधी ने दिल्ली की जनता के सोच-समझ को कुंद कर दिया।यदि भारतीय जनता पार्टी ने इतने अधिक सीटों को हासिल किया तो निश्चित इसके पीछे...
खेली लब पे तबस्सुम ज़माने बाद
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खेली लब पे तबस्सुम ज़माने बाद मौज़े इश्क़ में ये तोहफ़ा मिला ज़िंदगी कि तन्हा हुए दिल लगाने के बाद कारवां दिल का राहे वफ़ा में लुटा होश आया मगर चोट खाने के बाद । खो गया शौक़ का सब सामां औ जुनून क्या बचा दाग़ दामन लगाने के बाद सुख के सांसों पर बरपा क़हर ज़िंदगी ख़्वाब सुन्दर ज़ेहन में सजाने के बाद । ढल गया ख़ामशी में सुकूं औ ख़ुलूस मेहरबानी भी जानी भरम खाने के बाद ग़र उल्फ़त का आता सलीका उन्हें बज़्म से उठ कर जाते ना आने के बाद । इश्क़ में इल्म होता ग़र हाल-ए -परेशां दिल्ल्गी जान जाती लुत्फ़ उठाने के बाद किस बुत ने किया है नाशाद इस तरह पूछते हैं शैल ज़िन्दा जलाने के बाद । जीना,मरना भी मुश्किल था कब ये पता ना पूछो क्या गुजरी आजमाने के बाद बदनसीबी पे रोयें या गायें सनम होली अरमानों की ख़ुद जलाने के बाद । कोई ऐसा नहीं ज़ख्म खाया ना हो ये जाना दास्तां दिल सुनाने के बाद...
नव वर्ष की पूर्व संध्या की पार्टी में
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नव वर्ष की पूर्व संध्या की पार्टी में नए साल का आगाज़ महफ़िल सजी है ढेरों खुशियां मनाने ग़म भुलाने के लिए, रब से करेंगे बंदगी हम सबकी ज़िंदगी का हर लम्हा सुन्दर ख़ुशगवार बनाने के लिए, आज की ठहरी हुई सी ख़ामोश ज़िंदगी में रंगीन नूरानी जलवा बिखराने के लिए, इक छोटी सी गुजारिश है आपसे दोस्तों मुस्कराइये चिरागे दिल जलाने के लिए, कीमती वक़त लिया है आपका सज्ज्नों इस पल को हसीं यादगार बनाने के लिए । शैल सिंह
मेरी लाडो
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मेरी लाडो मिले सपनों का शहजादा राजकुमार कब दिन दिखायेंगे रब ज़िया बेक़रार । मेरी लाडो रानी के हाथों में मेंहदी रचे पांव गह-गहबर महावर लगे लालसा माड़ो आँगन छवे और मंगल गान हो बजे शहनाई द्वार घर सजे लालसा। एक सपना संवारा मन के आसमान पे घर मिले वर सुदर्शन ऊँचे ख़ानदान के ताकि चिंता ना फिकर करूँ कन्यादान पे मेरी लाडो को मिले हर ख़ुशी जहान के । मर गई है भूख प्यास हर गई है निंदिया नन्हीं मुन्नी सलोनी भई सयानी बिटिया मन चैन ना दिन रैन क्या बताऊँ बिटिया कैसा होगा दूल्हा राजा कब सगाई बिटिया। मम्मी पापा कि दुलारी प्राण प्यारी लाड़ली गर होता वश में रखती घर कुंवारी लाड़ली भोली भाली मेरी कितनी तूं अनाड़ी लाड़ली रीति दुनिया की निभानी हुई पाषाणी लाड़ली । भान कहाँ था अमानत ये पिया के नाम के कहती बेटा सरीखे मेरी लाडो अभिमान से जिसे नाज़ो से...
मैं मेरी तन्हाई
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मैं मेरी तन्हाई मन के आंगन बहती रहती यादों की पुरवाई इसीलिए भाई मुझको मैं मेरी तन्हाई । कुछ अतीत का कोना कुछ कल का ताना-बाना आज में जीती सुख से अपनी धुन का गा के गाना । जोड़ों सी मीठी टीस उठे कुछ दर्द भी ले अंगड़ाई लगे सुहानी रहस्यमयी दिन सी रात हुई अमराई , इसीलिए भाई मुझको मैं मेरी तन्हाई । भूल सकी ना जिसे कभी अपना होना साबित करतीं व्यर्थ की कितनी चीजें भी मन को परिभाषित करतीं । बीते कल की भग्न प्राचीरें वो आँखों में भर लाई नीम बेहोशी सी खुश्बू में कितनी रातें जाग बिताई इसीलिए भाई मुझको मैं मेरी तन्हाई । शैल सिंह
सम्भल जाओ सत्तासीनों
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सम्भल जाओ सत्तासीनों सम्भल जाओ सत्तासीनों रोज गिर रहा है राजनीति का स्तर निरन्तर हर कोई आंके इक दूजे को कम से कमतर दिन - दिन हो रहा सभी का चारित्रिक पतन मूल्यों से दुश्मनी , नैतिकता का हो रहा हनन ईमान बेच खा रहे हैं लोग ज़मीर बेच खा रहे मौका परस्त नेता लोग ही , जुबान बेच खा रहे तुच्छ स्वार्थ पूर्ति के लिए खुद को गिरा दिया है मनुष्यता भी अब मर गई आदर्श मिटा दिया है गम्भीर समस्यायें हैं क्या , मुद्दे ज्वलन्त क्या हैं मंहगाई की मार में गरीबी का उपचार क्या है हमारे मत का ले ख़जाना पतली गली दिखाते अब हमने भी ठान लिया कैसे मजा हैं चखाते बदलाव के इस दौर में ज़ुबानी वार कारगर नहीं संभल जाओ सत्तासीनों इस वाणी का असर नहीं राष्ट्र और समाज को राजनेता नीचा दिखा रहे हैं भद्दे - भद्दे तंज कस राजनीति का स्तर गिरा रहे हैं नमो - नमो , कमल के नाम से क्यों नींद उड़ गई है आरोपों के फेहरिस्त स...