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" कविता का विकृत श्रृंगार ना हो "

" कविता का विकृत श्रृंगार ना हो " ऐ मेरे सृजन ले चल मुझे हृदय के भाव प्रवण छांव तले जिसके गहन सिन्धु में लहर लहर अनुभूतियों के सुघड़ सलोने भाव पले तिलमिलाती अभिव्यक्तियाँ जहाँ भावों के सागर में कौंधतीं हिलोरें जहाँ प्रेम का सागर उमगता जहाँ संवेदना की उमड़तीं रसधारें जिसकी हर बूंद में हो तूफां सी रवानी  भरी हो जिसमें जीवन के अनुभवों की कहानी जो अन्तर के क्रंदन को सृजित करे  उर के कोलाहल को जगविदित करे । ऐ मेरे सृजन ले चल मुझे जहाँ शब्दों का अपव्यय ना हो और जबरन शब्दों के आभूषण से कविता का विकृत श्रृंगार ना हो ऐसे भाव उकेरूं जैसे हरसिंगार के फूल झरे  सीपी के मोती सा उद्गार व्यक्त हो काव्य प्रेमियों को भाव विभोर कर सकूं वितृष्णा,उकताहट का ना सार व्याप्त हो  चाह नहीं प्रशंसा के मिथक चन्द शब्दों की जिससे चन्दन सी शीतलता का बोध प्राप्त हो ऐसे प्रवाह का मेरी कविता में भरो उद्बोधन  जिसे पढ़कर मन को ठंडक का आभास हो ऐ मेरे सृजन ले चल मुझे जहाँ कवि मन के अन्तर्द्वन्द का विलाप हो ना अनर्गल ना निकृष्ट प्रलाप हो जहाँ ...

याद पर कविता " महका जातीं सांसों को अनुराग से "

 " महका जातीं सांसों को अनुराग से " जब-जब दूधिया  किरण छितराई बजी सुधियों वाली मृदुल शहनाई टंगी तस्वीर देख मन की भीत पर सीने में हूक उठी आँख डबडबाई , जो ख़ुश्बू समाई अबतक सांसों में रोक लूँ सांसें लेना  ये सम्भव नहीं पृथक कर दिए उसूलों ने राहेें मगर दिन बिन याद गुजरे ये सम्भव नहीं , यादें प्राय: बिखेरतीं इन्द्रधनुषी रंग  आ पलकों की  चौखट अन्दाज़ से  नेेह से चूम अंतस् के अहसास को महका जातीं सांसों को अनुराग से , रखीं अनमोल ख़तों की निशानियां जिन शब्दों में बसी सुगंध प्यार की उम्र भर रखा चस्पा कलेजे से उन्हें थकीं आँखें न कम्बख़्त इंतज़ार की , हर डगर पर करतीं  यादें परिक्रमा  पग-पग चलें साथ परछाईं की तरह स्तम्भ सम खड़ी स्मृति आत्मा में वो जो दमकतीं सूर्ख अरुनाई की तरह । सर्वाधिकार सुरक्षित  शैल सिंह 

गीत रचना

" कैसे बतलाऊँ हया की बात " वो मेरे कजरे की हैं धार तभी तो नैन मेरे कजरारे  हर कोई झांके मेरी आँखों में  छुप-छुप नैन मेरे निहारे पूछें छवि किसकी इसमें आबाद बता दे ज़ेहन में कौन बसा रे अँधेरी रात में भी चाँद सा रौशन दमकता मुखड़ा क्यों मेरा रे  कैसे बतलाऊँ शर्म से बोझिल कि कैसे पलकें झुकी उठीं उजियारे , वो मेरे रत्नों के भण्डार तभी तो गले मोतियों की हारें वो मेरे सूरज हैं रक्ताभ तभी तो चाँद सा नूरां चेहरा रे मेरी चंचल चितवन घनकेश घटा  नैनों की झील में वो आकण्ठ डूबा रे बिन सिंगार के भी हैं लोग पूछते क्यों मेरा रूप निखरताा जा रहा रे  कैसे बतलाऊँ हया की बात कि हुए क्यूँ रक्तिम मेरे रूख़सार रे,   वो बोल मेरी गीतों  के तभी तो कण्ठ मेरे रसधारे वो मेरे सुन्दर सुरों के साज तभी तो स्वरों में घुले ताल चटखारे बनी उनके लिए फ़नकार तभी तो पाजेब मेरी झनकारे मेरी अभिव्यक्तियों के भाव अलख कैसे होते इतने मुखर मंजुल अन्दाज़ रे  कैसे बतलाऊँ उनके ख़यालों का भीना  मेरी रोम-रोम में ...

कविता " कितनी बार की श्रृंगार हृदय के ज्वार के लेकिन "

तुम आँखों से पढ़ लेते मेरे मानस की ग़र भाषा स्वयं मौन निमंन्त्रण की समझ जाते अभिलाषा मैं प्रेम का प्रतिमान समर्पण की ऋचा थी पगले उम्र की बीति सदी आधी दिवंगत रह गई आशा, उर्मि उर के सरोवर की ढकी छतनाई जलकुंभी न तह का कभी कोलाहल उफनाई सतह पे भी हृदय के उपनिषद का पृष्ठ कभी खोल पढ़ लेते तो मन के मुक्तक को न लिखती मैं विरह में भी , मुलायम भावनायें थीं शोख़ हिरणी सी तरूणाई आस जिस चाँदनी की थी कभी उगी न अंगनाई कितनी बार की श्रृंगार हृदय के ज्वार के लेकिन  वसंती मनुहार की कर्ण में कभी गूंजी न शहनाई , झंकारें लोम की तेरे उन्मादित होती ही नहीं जैसे क्यों इस तरह शिराओं के रसों को विश्राम दे बैठे छलकते यौवन की मदिरा के अभिप्राय ना समझे  ऐश्वर्य रूप का कुम्हलाए तुम भरे मधुमास में ऐंठे , आद्र अरूण कपोलों को कभी तुम चूम भर लेते हुलस भुजपाश में भर कर कभी यूँ झूम भर लेते मृदुल मुस्कानों पर मेरे भ्रमर सा तुम मचलते ग़र अनुष्ठान साधना का करती रसपान तुम कर लेते । उर्मि--लहर,     लोम--रोआँ    सर्वाधिकार सुरक्षित  शैल सिंह 

" वक्त गुजरे न लौट के आएंगे कभी "

" वक्त गुजरे न लौट के आएंगे कभी " मुझे शिकवा है तेरी ख़ामोशियों से  बग़ावत न कर बैठे कहीं सब्र मेरा ऐसे तहज़ीब इख़्तियार कर पूछते   ढलकता क्यों है चश्म से अब्र मेरा , क्यों मेरी खुशियों से तुझे अदावत  कि करे मौन उपवास तक़रार ऐसे  तेरे हिस्से का लम्हा तनहा गुज़रता  किया बिसात से बहुत  प्यार तुझसे न दिखे दिल का दर्द न मेरी तड़प  अबोध शिशु सी मैं भरुं किलकारी बेंध शब्दों में भाव करूं वार्तालाप पढ़ ख़ामोशी तेरी भड़के चिन्गारी , होता नहीं बर्दाश्त चुप का सन्नाटा  मैं भी ओढ़ ली अग़र मौनी ओढ़नी फिर न कहना बात कभी क़द्र की   कह दूँगी मैं भी कहाँ फ़ुर्सत इतनी , तूफां आके चले जायेंगे ज़िन्दगी से वक़्त गुजरे न लौट के आएंगे कभी कभी अंतस की गहराई में ग़र डूबे  तो जज़्बात गिला  कर जायेंगे सभी । सर्वाधिकार सुरक्षित  शैल सिंह 

नव वर्ष पर कविता

नव वर्ष पर कविता बीते बरस की देहरी छोड़  नवल वर्ष आया है द्वार  नये उमंग से नई तरंग से नव वर्ष का करें सत्कार , मंगलमय हो जीवन सबका आओ बांटें खुशियों के उपहार  निष्ठा के मंगलदीप जलाएं  बीती बातों को हमसब बिसार , बारें नेह की बाती प्रीत दीप में  सभी के सपने हों साकार  नई उछाह का नये उत्साह का सबके जीवन में हो अवतार , शुभकामनाएं नव वर्ष की  मिले सभी को रोजी रोजगार भूखा,नंगा, ना बेघर हो कोई ना जुल्म किसी पे हो अत्याचार , बीते साल को अलविदा कह लेती अंगड़ाई पृथ्वी है ईक बार  हवाओं,दिशाओं,दिलों में सबके नूतन सौगात दे करती नव संचार , हो अमन शान्ति हो भाईचारा  हो भारत भूमि से सबको प्यार  तज ईर्ष्या,द्वेष,दुर्गुण सब अपने बस हो प्यार,प्यार और केवल प्यार । सर्वाधिकार सुरक्षित  शैल सिंह 

कविता '' प्रीत का दीया जला दो आकर ''

''  प्रीत का दीया जला दो आकर '' अन्तस के गह्वर मौन सिंधु में इक बार उतर जो आओ तुम विरहाकुल के अकथ नाद से परिज्ञान  तेरा  भी हो  जायेगा , कितने  तुम  पर गीत लिखे हैं कितने  स्वर साधे  हैं तुम  पर विकल रागिनी  के झंकारों से उर झंकृत तेरा भी हो जायेगा , सांसों  का  हर तार  है  जोड़ा तेरे स्मृति की वीणा,सितार में मेरे गीतों की गुंजित  ध्वनि में  अमर नाम तेरा भी हो जायेगा , आकर पुलिन पर सौहार्द का बहा दो मलयानील सा झोंका लहरों के नेहल उद्गम से भींग तर अन्तर तेरा भी हो जायेगा , तुम देखे बस श्रृंगार आनन का देखी न कभी भीतर की सज्जा प्रीत का दीया जला दो आकर प्रणय प्रखर तेरा भी हो जायेगा , मोह  के  अटूट  धागों  में  बांध रख  लूँगी  देवतुल्य  मानस  के निविड़  निकुंज में प्रिय तुझको मुझमें दरश तेरा भी हो जायेगा ,   तुम्हीं हो सूत्रधार काव्योत्पत्ति के...