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कविता " कब तक सूरत संवारती रहूँ आइने में

कब तक सूरत संवारती रहूँ आइने में  दुधिया  आँचल  फैलाए जवां  रात है रेशमी स्मृतियों की  निर्झर बरसात है खोल घूंघट घटा की चाँदनी चुलबुली सजाई टिमटिम सितारों की बारात है । ख़ाब रूपहला सजाए हुए पलकें मूंद स्वप्न की आकाशगगंगा में तिरती रही गदराई चाँदनी छिटककर अंगना मेरे मृदु-मृदु  स्पन्दन प्राणों में  भरती रही । मद्धिम हो जायेगी चाँदनी की उजास आलम खो जायेगा ये भोर की गर्द में रंग बिखर जायेगा हुस्न औ ईश्क़ का कब तक सूरत संवारती रहूँ आइने में । तेरे बाड़े में भी हो ऐसी दिलक़श रात मची हलचल ख़यालों की बस्ती में हो हर लम्हा गुजारा जैसे तेरे एहसास में तेरी भी रात जग आँखों में कटती हो । लफ्ज़ गूंगा तराशूं किन उपकरणों से कि बयां कर सकें बेचैनियां ऐ बेवफ़ा  बड़े ही तहज़ीब से  यादें पहलू में बैठ देतीं जख़्म ज़िगर को भी दर्द बेइंतहा । उर में कोलाहल सन्नाटा फैली फिज़ा खुशी कुहराम मचा बैठी हड़ताल पर बेसबब इन्तज़ार का शामियाना लगा रचातीं आँसुओं से हैं स्वयंवर रात भर । आख़िर कबतक नज़रबंद दिल में रहें रतनारी आँखों में घट...

" अहसासों के विभिन्न रंग "

अहसासों के विभिन्न रंग  उड़ानों को पंख तो लगा है दिया हवा परवाज़ों को बना लो दुल्हन करें श्रृंगार ख़्वाहिशों की चोटियां  तोड़कर बंदिशों की सभी बेड़ियां . जब-जब हुए अकेले कह सके किसी से कुछ ना, जब-जब खली तन्हाई बोझिल लगा एकाकीपन, बेबाक कह दिया ग़म से आँखों से दोस्ती कर ले, आँसुओं के रस्ते बह कह तुझे जो है कहना  जज़्बातों को शब्दों की पहना दी झबरीली पोशाक, कलम को दे दी जुबान कह तुझे जो है कहना  हर्ष,विषाद,आनंद को अपनी चित्रलेखा बना, थमा दिया तूलिका को   अहसासों का विभिन्न रंग, कागज का विस्तृत कोरा कैनवास दे कह दिया, उकेर रंगों के अन्तर्जाल से मन के बवण्डरों का चित्र, मन के बोध के लिए तोड़ दिया बेबस बन्दिशों को, थकान,सुकून,चाहत,विश्राम की, विश्वास की,भरोसे की, संगी,साथी,मित्र बन गई गजल,गीत,रूबाई,कविता, कण्ठ को सुर,मधुर तान दे गुनगुना ली अकथ व्यथा, पा लिया हजारों लाखों सुख वसंती रूत जैसा आह्लाद, विषाद का क्रूर शिल्पी भी वक्त के हथौड़े से प्रहार करे,ग़म नहीं, भीतर का गीला सुखाने के अनेकों संसाधन हैं, मोहताज नहीं भावों...

" अव्यक्त रहने दूं उन्हें या "

" विरह श्रृंगार पर कविता " सूरज  निकल   चला  गया दिन  बीता  साँझ  ढल गई जलतीं  रहीं  दो  पुतलियां जिसमें झुलस  मैं जल रही। आये    ना   प्रियतम   तुम चमन  के   भरी   बहार  में छोड़कर    विरानियां   गईं बहारें   भी  इन्तज़ार    में। नयन     घटा      हुए    हैं सांसें    उखड़     रही    हैं यशोधरा सी बैठी गुन रही बेबस आँखें  उमड़  रही हैं। वेदना को है कसक ये भी असहनीय    मौन      तेरा निर्मोही   हो  गये  हो  तुम वियोगी  मन बना  के मेरा। प्रेम    का    प्रसंग    लिखूं या   दावानल    विरह  का विलाप   ग़र  समझ...

" वीर रस की कविता "

 " वीर रस की कविता " लहराता हुआ सागर कलकल फुफकारती नदी गरजता हुआ हिमालय खड़ा  ललकारती धरती केसरिया करे सिंहनाद सरजमीं हुंकार है भरती हो प्यारे देश पर परवानों कुर्बां शम्मा भी कहती । बारूदी शोलों सा फटो शूरवीरों राणा के संतान तूफान भी ना रोक सके लो संकल्प मन में ठान विनाश लीला कर विध्वंस करो पूरा पाकिस्तान      कि शौर्य का तुम्हारे करे श्रृंगार सारा हिन्दुस्तान । ध्वस्त कर शत्रुओं के किले,गढ़ श्मशान बना दो शहादतों का कर हिसाब क़ौम की आन बढ़ा दो ध्वजा गर्ज करे शंखनाद सपूतों रणभेरी बजा दो  फन आतंकियों के कुचलो घिनौने मंसूबे ढहा दो । मातृभूमि के गौरव लिए हो ग़र गर्दन भी कटानी हँसते-हँसते सूली चढ़ना माँ की उधारी उतारनी वतन पर वार दो फौलादी  ज़िस्म चढ़ती जवानी  स्वर्णाक्षरों में गढ़ी जाए अमर शूरता की कहानी । स्वदेश लिए मरना जीना यही उद्देश्य हो हमारा  जो धृष्ट आँख उठे राष्ट्र पर वो शिकार हो हमारा  कश्मीर हिंद का सिरमौर झूमता झंडा हो प्यारा  करांची लाहौर भी हम लेंगे हर जुबां का हो नारा  । उ...

" तकिया पर कविता "

           तकिया पर कविता  कितना  बदनसीब दामन है तकिया तेरा नि:शब्द करवटों से कभी उकताती नहीं होती गलगल हो अश्रुओं की हमदर्द बन दर्द ख़ुदके सिरहाने से कभी बताती नहीं । हिलकतीं सिसकियों से बेतरतीब बिस्तर सिलवटों की एकमात्र तूं चश्मदीद गवाह इत्मिनान,सुकून,निश्चिन्तता की तूं हितैषी  ईश्क़ के मारों से करती मुहब्बत बेपनाह । तोड़ सब्र का तटबन्ध आँसू नदी की तरह  बसर ढूंढ़ते मन का समंदर हो तुम्हीं जैसे  सबकी अन्तरंग खुशी भी भींच आगोश में बन जाती  राजदार हमराज़  हो तुम्हीं जैसे । अनन्त पीर सह रखती स्मृतियां सहेजकर  नितान्त एकान्त क्षणों की बन सहभागिनी भर आग़ोश में तूं करती अद्भुत करिश्मा  संग रोती दर्द का अवलंब बन सहचारिणी । माँ की ममता सरीखे है तकिया आँचल तेरा दे थपकियां सुलाती सीने से लगा गा लोरियां रोना,हंसना,खुशी,दर्द,ग़म,जुदाई,ज़ख़्मों पर तकिया होती है निहाल लुटा नेह की झोरियां । तूं ज़ख़्म-ए-ज़...

" सावन पर कविता "

       सावन पर कविता    न जाने तुमसे लगी ये कैसी लगन   बुझा पाये न सावन ये ऐसी अगन   झीनी- झीनी फुहारें भिंगोयें वदन   सावन तुम बिन बीता जाये सजन । नहीं बरसो रे सावन झरने लगेंगे नयन जो हैं एहसासों के तोहफ़े सहेजे नयन भींगे रहना मंज़ूर अनुरागी एहसासों में संग बह जायेंगे जो ऐसे ये बरसेंगे नयन । उनके अनुरक्ति में जितना भींगा है तन रत्ती भर भी नहीं सावन में दिखा है दम उनके स्पर्श की तरिणी में तैरने दो मुझे भींगो दे आँखों का समन्दर भले पैरहन । सुहानी शामें वही मंजर याद आ जायेंगे जो उनके संग देखीं बरसातें छा जायेंगे जाके उनके शहर भी बरसकर बता दो ऋतु है सावन का जल्दी घर आ जायेंगे । बोले कुहू-कुहू पिक,पिऊ-पिऊ पपिहा वैसे पुकारती पी कहाँ  विकल हो जिह्वा दिन-रैन,चित्त अधीर विषधर विरहा हुई बिदके दर्पण सिंगार जब निहारती पिया । तुम्हारी याद में हुआ बारहो मास सावन झड़ी अश्रुओं की देख हार जाता सावन मन का मधुवन जले पी भरी बरसात में पड़ी आँखों तले झा...

" एक वेश्या का दर्द "

मैं जिस्म बेचती हूँ चन्द नोटों की खातिर नाचती कोठों पर हूँ चन्द नोटों की खातिर रातें रंगीन करने वाली मैं इक बेबस नायिका हँसके दर्द सहती वेश्या बन चन्द नोटों की खातिर । करती संगीन जुर्म चन्द नोटों की खातिर बदलती हर रात शौहर चन्द नोटों की खातिर नित नये ग्राहकों संग खेलती जिस्म निलाम कर   पोषती हूँ धंधा विरासत का चन्द नोटों की खातिर । घर टूटता है किसी का ग़र वजह से  मेरी जग लानत न दे नहीं होता सब गरज से मेरी रूह की भी सजाती शैय्या हाय जिस्म के बगल सफेदपोश कहते बदचलन खेल कर जहन से मेरी । जब्त अधरों की लाली में मुस्कुरा कर छलकते आँसूओं को पलकों तले ढाँपकर  मन की पावन वेदी पर करती जमीर का हवन पालती आजीविका कसबिन,पतुरिया के नाम पर । न कोई हमदर्द मेरा ना हमसफ़र कोई भूखे भेडियों के शौक की लजीज स्वाद हूँ सुलगते अरमानों पर हवश के जुटाती संसाधन  वहशत के बिस्तर पर लेटी जिन्दा सजीव लाश हूँ । मैं हूँ गम का ईलाज मैं ही दर्द की दवा कहते लोग अय्याशी का अड्डा कोठा मेरा बन  समाज का मुखौटा नाची पांव बाँध घुँघरू महफिलों के महानायक रखते नाम तवायफ म...