संदेश

गले लग प्रेम का सूता सुलझाओ तो जानें

गले लग प्रेम का सूता सुलझाओ तो जानें ओ भारत के युवा प्रहरी जाबांज़  सिपाही कभी ना होना गुमराह बेतर्कों के झांसों में , बो कर नफ़रत का बीज भीड़ जुटाने वालों प्रेम मोहब्बत की ख़ुश्बू बिखराओ तो जानें क्यूँ निस्प्रयोजन तुम उलझाते हो आपस में गले लगा प्रेम का धागा सुलझाओ तो जानें , जन-मन की पूछ रही हैं सवालिया निग़ाहें  कहाँ गयी पहले वाली रौनक़ त्योहारों की सहमे भय,आतंक से बच्चे,बूढ़े,जवां पूछते  कहाँ गयी पहले वाली धूमधाम बाज़ारों की , कैसे ग्रहण लगा जीवन के मुस्काते रंगों को  कहाँ गया सम्मोहन हरे खेत खलिहानों का  खुद जीओ देश ,समाज ,पड़ोस को जीने दो होली जला,उपद्रवी कुंठित सोच विचारों का  , सपनों का महल बनेगा सजेगा,संवरेगा तब जब रक्षा करना सीखोगे दर औ दीवारों की अनेकता में एकता क्या होती  दिखलाना है    आवश्यकता है बेहतर जीवन में सौहर्द्रों की , प्रेम मोहब्बत इतना प्रगाढ़ बलवान बनायें सामाजिक समरसता के लिए आह्वान करें इंसान,दोस्ती की तस्वीर उजागर कर देखें मिलकर नफ़रत की खाई को शर्मसार करें...

वाह रे मिडिया वाले

वाह रे मिडिया वाले ,तेरी अच्छाई और बुराई दोनों ही चरम पर हैं ,सच्ची बातों के लिए आवाज़ बुलंद करते हो और कभी-कभी तिल का ताड़ बनाने में भी माहिर ,आजाद भारत में व्यक्ति को अपनी अभिव्यक्ति भी स्वछंद और स्वतन्त्र रूप में व्यक्त करने की आजादी नहीं है ।किसी के मुँह से वकार क्या निकली कि तोड़-मरोड़कर  गलत तरीके से गुमराह करने और मतलब निकालने का महारत भी पास रख लेते हो । खैर बुद्धिजीवियों और समझदारों पर तो इसका कुप्रभाव नहीं पड़ता । एक बात तो सत्य है की मोदी की लोकप्रियता और प्रसिद्धि विरोधियों के गले की हड्डी बन गई है ,वरोधी पार्टियां तिलमिला-तिलमिला कर जल भून रही हैं । इसीलिए अनाप-शनाप गुद्दी में गुद्दी निकालती रहती हैं ,लालू इतना घटिया स्तर का भाषण देता है किसी पर जूं तक नहीं रेंगता और कोई सही बात भी बोले तो बवाल हो जाता है राबड़ी जैसे लोग विहार की वागडोर थाम सकते है , बोलने के लिए बहुत कुछ है पर बवाल और टीका टिप्पड़ी सहने की क्षमता नहीं है उददंड और उजड्ढ लोगों की की बेसिर पैर बातें सुनने के लिए ।             ...
सोनिया गांधी ……  , अपने घर से रुख़सती क्या ली भारत के राजकाज पर काबिज हो गई दो चार भाई होगी छोड़ी यहाँ भाइयों के रूप में हजारों सेवक पा गई घर की रहगुजर क्या भूली यहाँ हर रहगुजर पर तेरी तस्वीर लग गई ओ चिड़िया तूं जिस शज़र पर बैठी उस शजर पर और चिड़िया नहीं बैठी तुझे भारत में मोहब्बत ही नही मिली बल्कि सर आँखों पर बिठाया लोगों ने हम ये कैसे कहें तुम्हें हुकूमत प्यारी नहीं क्या हुकूमत बिन चाहे ही मिल गई तेरे चहरे ने इस सर जमीं का भाई चारा छिना एक से एक महारथियों का बाड़ा छीना तेरे पास जो था वो तुझसे ज्यादा हमारा था तेरे प्रेम जाल ने हमसे हमारा छिना यहाँ बहुत से बच्चों के सर का साया नंगा है बच्चों को भारत की संतान बनके रहने दे तूने गिरिजा छोड़ दिया जो तेरा था तूं शिवाला का क्या कभी हो पायेगी तकदीर बदलने के और भी रास्ते हैं  भारत की बहू-बेटी बनके रह वरना सम्मान से चूक जाएगी इक तूं ही बेवा नहीं हुई यहाँ हजारों लाखों बेवाएं हैं जो घर छोड़कर कभी मायके नहीं गईं तेरी वजह से नफ़रतों की दीवार खड़ी हुई बस चन्द नासमझों चाटुकारों की मसीहा ब...

मेरी ये फ़ितरत नहीं दोस्तों

मेरी ये फ़ितरत नहीं दोस्तों  बहारों का आनन्द लेती हूँ मेरी ये फ़ितरत नहीं दोस्तों  कि हवा के संग-संग बह जाऊँ , लोग सूखे पत्रों के मानिन्द बहक,हवा के साथ उड़ते हैं जिधर का रूख़ हवा का हो उधर ही हवा के साथ चलते हैं माहौल के अनुरूप देखा है कि हैं कुछ लोग ढल जाते जैसी जिस जगह की मांग वैसी तुरुप की चाल चल जाते , कड़वा सत्य बुरा होता मगर  मेरी ये फ़ितरत नहीं दोस्तों  सच से बहस में मैं मुकर जाऊँ , भला एक ही इन्सान कैसे जब-तब कुछ नज़र आता जुबां होती तो है एक मगर तरह-तरह की बात कर जाता , लिबास आचरण के उनके आश्चर्य,पल-पल बदलते हैं लोग भलीभांति जानते फिर  क्यूँ कसीदे तारीफ़ों के गढ़ते हैं मैं अडिग सही बात पे होती मेरी ये फ़ितरत नहीं दोस्तों  गिरगिटों का चोला पहन आऊँ , कहें भले लोग बुरा मुझको इसकी परवाह नहीं करती ईश्वर क्या देखता ना होगा चालबाज़ी चाल में है किसकी , चटुकारता की दुर्गन्धों से भभक उठते हैं नथुने मेरे उबटन लगाकर तेल संग क्यों उंगलियां मालिश करें मेरे , ...

ओ परदेशी

          ओ परदेशी     क्या बतलायें शहर की कोई भी चीज    अपने प्यारे न्यारे गाँव सी नहीं लगती    चाहे जितना खायें पिज्जा,बर्गर,नूडल    माँ के व्यंजन के स्वाद सी नहीं लगतीं , कच्ची गलियाँ अम्मा-बापू रखना याद घराना कैसे फड़फड़ायें देख परिंदे वीरां आशियाना , शहर को कूच करने वाले गाँव के मुशाफ़िर गाँवों की पगडण्डियां हृदय में बसाये रखना हिफाज़त से बुजुर्गों के नसीहत की पूँजी भी शिद्दत से सहेज कर आँखों में सजाये रखना , निशानियाँ मत करना जाते वक़्त की विस्मृत  उमड़ा रेला परिजनों का आँसू भरा ख़जाना  कहीं भूल ना जाना परदेश की आबोहवा में आँगने का छायादार नीम का दरख़्त पुराना , कभी ग़र याद में तड़पे दिल लड़कपन वाला वनवास छोड़ दहलीज़ अपने लौट आ जाना  रौशन हो जाएँगी फिर बेनूर हुयी बूढ़ी आँखें  रौनक पनघट पर भी जो बिन तेरे सूना-सूना ।                        ...

आदतों में करना शुमार अकड़ मजबूरी मेरी

आदतों में करना शुमार अकड़ मजबूरी हुई  मुझे क्या नाम,शोहरत,ओहदा कमाये कोई ज़मीर बेचकर हमने कभी समझौता ना की , मोम सा दिल बनाने की पाई मैं ऐसी सजा ठौरे-ठौर मोमबत्ती के मानिन्द जलाई गई मेरी सादगी ही बस आई ज़माने को नज़र मेरी हर बात हँसकर हवा में यूँ उड़ाई गई , मेरे आदर्शों उसूलों और सत्य की राहों को पग-पग पर भुगतना पड़ा ख़ामियाजा सदा भला साँच को आंच की कब परवाह हुई है झूठ की बुनियाद नहीं करना ईमारत खड़ा , पढ़ सकूँ चेहरों के पीछे की दोगली इबारतें हुनर सीखते-सीखते गुज़र गया इक जमाना झूठ फ़रेब का मोटा मुलम्मा चढ़ा अक़्स पर  लब पर आती हँसी नहीं काईयाँ सी दिखाना , आदतों में शुमार करना अकड़ मजबूरी हुई  वरना इज्ज़त से जीने के हक़ सभी छीनकर दुनिया कभी सिद्धान्तों पे तो चलने देगी नहीं करवाएगी मनमानी,बेईमानी भी मजबूर कर , मुझे क्या नाम,शोहरत,ओहदा कमाये कोई  ज़मीर बेचकर हमने कभी समझौता ना की ,                                          शै...

ऐ जान-ज़िगर के टुकड़े मेरे प्राण तुझी में बसा रहता है

''  ना  जाने क्यों मन आज उद्द्वेलित है '' जज़्ब कर नीर नैन का लाल दर्द सीने में ज़ब्त किया था कदमों में बिछा दुनिया की नेमतें सीने से जुदा किया था , क्यूँ मन की मौन तलहटी में ऐसी हलचल हो रही आज लगता कोई पीड़ा मथ रही लाल को जो छुपा रहा राज , भींचकर गम सीने में गुमसुम मत कभी रहना चुपचाप तेरे बेचैन साँसों के स्वर की भी माँ सुन लेती है पदचाप , तेरे अवयव की हर धड़कन मुझसे ही हो के गुजरती है गर बदली तुझ पर घिरती है तो वारिश मुझ पर होती है , माँ के व्यंजन की खुश्बू तेरे नथुनों तक भी जाती होगी माँ देख सामने थाली दृग से,छह-छह धार बहाती होगी , तूं जबसे दूर गया नयन से,मन अंदेशों में घिरा रहता है ऐ जान-ज़िगर के टुकड़े मेरे प्राण तुझी में बसा रहता है , एक-एक निवाला हलक में मैं मुश्किल से उतार रही हूँ इक-इक दिन काट इंतजार में बाट बेसब्र निहार रही हूँ , जाकर परदेश में बबुवा मत परदेशी फिरंगी बन जाना माँ ताक रही रस्ता शिद्दत स...