निपुणता से निभातीं किरदार कल्पनाएँ सारी
तुम्हें हमदर्द समझे मगर ख़ुदग़र्ज़ निकले तुम मेरे एतबार से छल कर बड़े बेदर्द निकले तुम । क्यूं दिल के दुर्ग के द्वार पे डट संतरी बनकर खड़े रहते हो तुम दिन रात सिपाही की तरह करते रहते हो तरोताजा नासूरों को प्रतिदिन गरज क्या सेंध लगाने की तनहाई में बेवजह । तन्हाई की बस्ती में लगा दरबार ख़ामोशी से सीख ली अकेले जीने की हमने कलाएँ सारी ख़्यालों के रंगमंच पे सजा हर रोज़ महफ़िलें निपुणता से निभातीं किरदार कल्पनाएँ सारी । कितनी मिन्नतें की कितनी दी दुहाई वफ़ा की कौन ज़िन्दगी में आ गया जो मुझपे जफ़ा की गिला है यही चले जाते दूर रोकती नहीं मैं पर किसी खलनायिका लिए कहना मैं बेवफ़ा थी । शैल सिंह सर्वाधिकार सुरक्षित