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गज़ल " बहुत याद आये रे सावन की भींगी रातें "

गज़ल " बहुत याद आये रे सावन की भींगी रातें " नाम पर आपके हम मुस्करा क्या दिए  कि लोग अन्दाज़ जाने लगा क्या लिए  छुपाना तो चाहा था मैंने मुहब्बत मगर  ईश्क़ के उसूल ही ऐसे,ख़ता क्या किये । खुश रहे तूं सदा दुआ ये मांगा ख़ुदा से  हँसी होठों पे रहे सदा ऐसी ही अदा से  जैसे ख़ुश्बू निभाये साथ गुलों का सदा  वैसे रहे हाथ तेरा भी मेरे हाथों में सदा । महफ़िलों में भी बैठकर मैं अन्दाज़ ली  कितनी बिन तेरे अधूरी मैं अहसास ली  लाखों की भीड़ में भी लगे अकेली हूँ मैं  चले आओ फिर ज़िन्दगी हो बिंदास सी । न जाने मेरी आँखों को क्या हो गया है  कि आईना निहारूँ आये तूं ही तूं नज़र  चढ़ा कैसा ख़ुमार मुझपर तेरे प्यार का  पांव रखती कहीं हूँ पड़ते कहीं हैं मगर । छिपा रखा जो दिल में कह दो वो राज  चैन चुराने रातों में मत आया करो याद बता सीखा कहाँ से तूने करतब ये फ़न  बेचैन कर ख़्वाब में ना किया करो बात ।  बहुत याद आये रे सावन की भींगी रातें  तस्वीर लेके तेरी हाथों में करती हूँ बातें  भींगती आँसुओं की बारिश में निशदिन  अरे कह...

'जीवन राग'

         जीवन राग  ना जाने किस बला की नज़र लग गई है  कि मस्ती भरा  आलम कहीं  खो गया है  किलकारियों को भी  ग्रहण लग  गया है आकर्षण  भी ना जाने कहाँ  सो  गया है।    जहाँ बेला,जूही,चम्पा सुवासती थी चमेली वही हो गई है मरुभूमि सी मन की हवेली  प्रेम राग रूठ गया अन्तर्मन के घोंसलों से   कंटीली कंछियाँ फूटीं हृदय के अंचलों से।  चिंताओं,तनावों की घेरि आई कारी बदरी प्रेम की धरा पर रेगिस्तान जैसी रेत पसरी  अरमान सूखा,सूख गयीं रसपगी भावनाएं   वक्त के परों पर उड़ विलीन होतीं करुनाएं।  जरुरत है जीवन में फिर से राग रंग भरना  उर की स्वच्छ वेदी पे विकार आहूत करना  आन्तरिक सफाई कर के पौधे संस्कार की  सुन्दर पुष्प खिल सकें रोपें सूखी संसार की। बड़े-बड़े मॉल, शहर, कालोनी चौड़ी सड़कें दब जाये ना मानवता इस मोह में सिमट के प्रगति की हूँ पक्षधर  विस्तारों का उद्देश्य भी  सीमित यन्त्र में न खो जाये ...

ईश्वर भी इतना अस्मर्थ हुआ क्यों

उत्तराखंड की त्रासदी पर ईश्वर भी इतना अस्मर्थ हुआ क्यों अरे मेघ जलवृष्टि चाहा था प्रचण्ड जल प्रलय का ऐसा हाहाकार नहीं सूखी बंजर धरती में अंकुर फूटे धन,जन क्षति का ऐसा चित्कार नहीं। प्राकृतिक छटा के मोहपाश ने लील लिए बेकसूर जीवन जाने कितने तेरी क्रूरता पार की आंकड़ा तड़प बता सिहर उठते,जीवित हैं जितने। देवभूमि दरश की भूखी आँखों का यम से यह कैसा साक्षात्कार हुआ कुछ काल के गाल में गए समा कुछ को भष्मासुर का क्रूर दीदार हुआ। कैसे जज़्ब करें अपनों के खोने का ग़म वादी ने आत्मसात किये हैं जो रूह कंपाने वाली अलकनंदा,मंदाकिनी ने बर्बर वहशियात किए हैं जो। भगीरथ तेरी उद्दंड भयावह क्रीड़ा जो विस्फारित दृगों ने देखा अचंभित अथाह छलकाया था जल का सागर फिर भी प्यासा तरसा तन कम्पित। जाने किस कन्दरा दुबक गए देव असहाय ,बेसहारा कर श्रद्धालुओं को उत्पात हुआ केदारनाथ के गढ़ में जिंदगी की हवाले मिटटी बालूओं को। आस्था का ये कैसा इतिहास रचा अपने अस्तित्व के होने या ना होने का अंधभक्ति का ये ...

ये वादियां,फिजायें दे रहीं आमन्त्रण

ये वादियां,फ़िज़ाएं दे रहीं आमन्त्रण  कुर्ग, कोडईकनाल, मुन्नार, लोनावाला अवकाश का आनंद लेने चलें खंडाला , कहीं बीत ना जाये गरमी की छुट्टियां उधेड़बुन में खुल ना जाये झट स्कूल अनदेखा,अविगत अनुभव करने का फिर कचोटता रह ना जाये चित शूल , वन की विलक्षण वनस्पतियां देखने अनुपम उद्यान,रंग-विरंगे उपवन का ये वादियां,फिजायें दे रहीं आमन्त्रण लुत्फ़ उठाने को निरूपम मौसम का , पर्यटन के अनेक रूपों का रोमांचक एहसास कराने विलक्षण जहान का कल-कल बहते झरने पहाड़ बीच से साक्षात् दृश्य डूबते हुए अंशुमान का , सावन की बरसती रिम-झिम फुहारें उस पर अप्रतिम सौन्दर्य प्रकृति का भीनी-भीनी ख़ुश्बू सुहाये पावस की ठंडी हवा के झोंके नैसर्गिक सुंदरता , हरी-भरी खूबसूरत लगती पहाड़ियां झरनों के चतुर्दिक चादर बादल का कण-कण स्वागत  करती मुग्ध धरा मानसून के जीवन्त सुरभित रंग का , प्राकृतिक सुवास से प्राण प्रस्फुटित पेड़-पत्ते,जीव-जन्तु ,नदी,पोखर का छटा मनोहर भाये सुंदर गोधूलि की शांत,एकांत सदाबहार गिरि दल का , प्रकृति का बेजोड़ उपहार समेटे पर्वत  अलौकिक अनुभूति,मोह...

तन्हाई ने सीखा दिया जीने का गुर

        तन्हाई ने सीखा दिया जीने का गुर  कभी शरच्चन्द्रिका सी विहँस अद्भुत जगत के दरश करा देती  कभी झटक परिहास कर धूसर विश्व में छोड़ चली जाती तन्हाई कभी यादों,सोचों का साम्राज्य खड़ा कर गहन सन्नाटा देती चीर कभी मन के निर्मम,बोझल तम को आलोक दिखा जाती तन्हाई  , कभी अन्तर कर देती क्लेशित,कभी नाभाष प्रफुल्लता भर देती कभी निराशा के अंचल हर्षातिरेक से आस की पूर्णिमा भर देती कभी तन्हाई के नैराश्य जमीं पर सुख-दुःख के सरसिज बो देती कभी जीने की राह सुझा जाती कभी झट धीरज संचित खो देती , कभी विलास की रानी बनकर मृत स्पन्दन में किसलय भर देती कभी अलौकिक,अद्भुत लोक में पहुँचा मन मतवाला कर देती कभी नयनों में खारा सागर कभी अविच्छिन्न उत्साह से भर देती कभी एकाकी जीवन उपवन,शीतल पवन बन सुरभित कर देती , कभी हताश,निराशा,विषाद,अवसाद की ऊसरता मिटला जाती कभी जीवन सरिता का उद्गम बन,मरुमय वक्ष उर्वरा बना जाती कभी बाल सहचरी बन तन्हाई ,तन्हाई की नीरवता सहला जाती कभी ख़ुशी का अलख जगाती...

'' तुम हाँ तुम ''

                तुम हाँ तुम  कितनी बार घटा बन उमड़-घुमड़ बरसी मेरी घनीभूत पीड़ा काश कभी पोंछ दिए होते तुम स्नेह में बोर-बोर ख़ुद पोरों से , जो अभिव्यक्ति पिरो गीतों,छंदों में अलापी थी मेरी मन वीणा काश कभी व्यथित हुए होते सुन दर्द भरे आरोह-अवरोहों से उर के अतल समंदर ना जाने कितने थे बेशकीमती रत्न छिपे काश कभी पैठ खोज लिए होते तुम अंतर्मन के गोताखोरों से कलमवद्ध कर कविता में उर के अनमोल मोती थे पिरो दिए काश कभी मन से पढ़ तुम भींग गये होते दर्द भरे कुहोरों से  उर्वशी,रम्भा अप्सराओं सी कहाँ तुझे मेरी देह से नशा मिली काश योगी का तप भंग करने के होते मुझमें ढंग छिछोरों से।                                                                 शैल सिंह 

खुशी,हर्ष,आनंद हो सबके दामन में

रिश्तों में मिठास घोलने रंज,भेदभाव की दीवार ढहाने पर्व दीपोत्सव आया सर्वहित संकल्प का थाल सजाने । सुख,समृद्धि,भाईचारे का पर्व दीवाली तुमसे ही दीपक सज क़तार में जगमग जग सारा होता तुमसे ही दीपक रात अमावस की काली तुम चीर तिमिर का सीना दीप कर देते भोर सी निशीथ,शुभ पर्व प्रकाश का मना दीप । जब सारी दुनिया सोती प्रशान्त नीरव में धुनि रमाते हो आकर्षित कर अग्निशिखा से  शलभों को झुलसाते हो अंधकार हरने को जैसे आलोक बिखेरते हो कण-कण वैसे दो वर मनुज को शुचि भाव हृदय भर करें समर्पण । माटी का तन जला दीये ने जग में बिखराया उजियारा प्रज्वलित हो सारी रात्रि भी निज तले झेला अंधियारा  किस तप साधना में लीन किसलिए निरन्तर जले दीप तिल-तिल,जल-जल किसलिए  ज्योतित होते रहे दीप । अखिल सृष्टि लिए हो जगमग अपनी गात जला डाले दिया क्या कृतघ्न जगत ने अपना अस्तित्व मिटा डाले किस माटी का पुतला तूं निस्तब्ध यामिनी में निःस्वार्थ  जगमग पग-पग बाहर,भीतर जल करता रहा पुरुषार्थ । वंदनवार सजा द्वार सब खींच रंगोली चौखट आँगन में  माँग रहे कर जोड़ ख़ुशी,हर्ष,आनंद हो सबके दामन में धूम धड़ाका छोड़ पटाखे खा खील...