संदेश

" निराकार ईश्वर पर कविता "

" मेरे सर्वव्यापी साईं,कहाँ-कहाँ ढूंढी हर घड़ी मैं " घनघोर  आँधियों से  लड़ता  रहा दीया सारी रात तेरी याद में जलता रहा पिया, चैन दिन नहीं नींद आती नहीं है रात रूतों ने ख़ूब ठगा है दे दे के झूठी आस भरा आँखों में समन्दर बुझती नहीं है प्यास प्रभु दरश को तेरे  क्या-क्या लगाती रही कयास, प्राणों की  दे दे आहुति  घुलता रहा दीया सारी रात तेरी याद में पिघलता रहा पिया घनघोर  आँधियों  से  लड़ता  रहा   दीया सारी रात  तेरी याद में सुलगता रहा पिया । आकाश में पाताल में,गिरि,कन्दरा,गुफ़ा में पर्वत,शिखर में हेरा रे कण-कण चहुँदिशा में उपत्यका में ढूंढा प्रभु दिग्-दिगन्त मधु निशा में किस गह्वर में है समाधिस्थ,बता दे किस विभा में, निर्वस्त्र  बारिशों  में  भींगता  रहा  दीया सारी रात तेरी याद  में गलता रहा पिया घनघोर  आँधियों से  लड़ता  रहा  दीया  सारी रात तेरी याद में तड़पता रहा पिया । वेदों में तुझको ढूंढा,गीता,बाइबिल,कुरान में प्रत...

" हर आहट लगे जैसे तुम गए "

" दास्तां कली की जुबां "  हर आहट लगे जैसे तुम गए तन-मन सजाए संवारे हुए करके सिंगार आई तुम्हारे लिए यौवन के मय से छलकती हुई  खोली कलियों के घूँघट तुम्हारे लिए । एक भौंरा गली से गुजरकर मेरे रूप की माधुरी ही चुरा ले गया चूस मकरंद वहशी गुलों के सभी सुर्ख़ अधरों की लाली उड़ा ले गया । हर बटोरी से तेरा पता पूछती हार तेरे लिए पुष्प के गूंथती दृग को प्रतिपल प्रतिक्षा रही देवता दौड़कर द्वार पर हर घड़ी देखती । रो रही साधना हँस रही बेबसी ज़िस्म मुर्दा लिए फिर रही बाग़ में तारिकाएं विहंसती रहीं हाल पर मनचली कामिनी मिल ख़ाक़ में । दर्द घुल-घुल बहे अश्रु सैलाब में मन का हिरना भटकता रहा चाह में वक्त कंजूस है प्यास बुझती नहीं सब्र शर्मसार होती रही राह में । ईल्म होता बहारों के यदि ज़ुल्म का बंद कोंपलों की सांकल नहीं खोलती तान पत्तों की धानी चंदोवे सी छतरी झूमकर डाल पर बाग़ में डालती । मस्त मौला हवा का बेशर्म झोंका ख़ुश्बू सारी चमन की बहा ले गया हर आहट लगे जैसे तुम आ गए वो आशिक़ आवारा दगा दे गया । भान होता घटाओं की शोख़ियों क...

" तेरा अस्तित्व क्या शहर गाँवों के बिना "

तेरा अस्तित्व क्या शहर गाँवों के बिना मेरे गाँव की सोंधी  खुश्बू ले आना हवा शहर में खरीदे से भी कहीं मिलती नहीं ईमारतें तो गगनचुम्बी शहर में बहुत सी धूप की परछाईं तक कहीं दिखती नहीं । बीत गई इक सदी देह को धूप सेंके हुए  भींगी लटें तक घुटे कक्ष में सूखती नहीं खुले आँगन के लुत्फ़ को तरसता शहर लगे व्योम से चाँदनी कभी उतरती नहीं । शहरी सड़कों से भली गंवईं पगडंडियाँ आबोहवा गाँव सी यहाँ की लगती नहीं लगे दिनकर को आसमां निगल है गया किरणें मोहिनी सुबह की बिखरती नहीं । भाँति-भाँति के शज़र यहाँ तनकर खड़े किसी टहनी पर परिन्दों की बस्ती नहीं क़िस्म-क़िस्म के गुल यहाँ खिलते बहुत फज़ां में महक़ रातरानी सी तिरती नहीं । लाना जमघट पीपल के घनेरे छांवों का वैसी मदमस्त पवन शहर में बहती नहीं वो पनघट की मस्ती झूले  नीम डाल के बुज़ुर्गों के चौपाल की हँसी  गूँजती नहीं । ना नैसर्गिक सौन्दर्य ना समरसता कहीं  स्वर्ग जैसा है,वास्तविकता दिखती नहीं तेरा अस्तित्व क्या  शहर गाँवों के बिना बसती...

कविता " कब तक सूरत संवारती रहूँ आइने में

कब तक सूरत संवारती रहूँ आइने में  दुधिया  आँचल  फैलाए जवां  रात है रेशमी स्मृतियों की  निर्झर बरसात है खोल घूंघट घटा की चाँदनी चुलबुली सजाई टिमटिम सितारों की बारात है । ख़ाब रूपहला सजाए हुए पलकें मूंद स्वप्न की आकाशगगंगा में तिरती रही गदराई चाँदनी छिटककर अंगना मेरे मृदु-मृदु  स्पन्दन प्राणों में  भरती रही । मद्धिम हो जायेगी चाँदनी की उजास आलम खो जायेगा ये भोर की गर्द में रंग बिखर जायेगा हुस्न औ ईश्क़ का कब तक सूरत संवारती रहूँ आइने में । तेरे बाड़े में भी हो ऐसी दिलक़श रात मची हलचल ख़यालों की बस्ती में हो हर लम्हा गुजारा जैसे तेरे एहसास में तेरी भी रात जग आँखों में कटती हो । लफ्ज़ गूंगा तराशूं किन उपकरणों से कि बयां कर सकें बेचैनियां ऐ बेवफ़ा  बड़े ही तहज़ीब से  यादें पहलू में बैठ देतीं जख़्म ज़िगर को भी दर्द बेइंतहा । उर में कोलाहल सन्नाटा फैली फिज़ा खुशी कुहराम मचा बैठी हड़ताल पर बेसबब इन्तज़ार का शामियाना लगा रचातीं आँसुओं से हैं स्वयंवर रात भर । आख़िर कबतक नज़रबंद दिल में रहें रतनारी आँखों में घट...

" अहसासों के विभिन्न रंग "

अहसासों के विभिन्न रंग  उड़ानों को पंख तो लगा है दिया हवा परवाज़ों को बना लो दुल्हन करें श्रृंगार ख़्वाहिशों की चोटियां  तोड़कर बंदिशों की सभी बेड़ियां . जब-जब हुए अकेले कह सके किसी से कुछ ना, जब-जब खली तन्हाई बोझिल लगा एकाकीपन, बेबाक कह दिया ग़म से आँखों से दोस्ती कर ले, आँसुओं के रस्ते बह कह तुझे जो है कहना  जज़्बातों को शब्दों की पहना दी झबरीली पोशाक, कलम को दे दी जुबान कह तुझे जो है कहना  हर्ष,विषाद,आनंद को अपनी चित्रलेखा बना, थमा दिया तूलिका को   अहसासों का विभिन्न रंग, कागज का विस्तृत कोरा कैनवास दे कह दिया, उकेर रंगों के अन्तर्जाल से मन के बवण्डरों का चित्र, मन के बोध के लिए तोड़ दिया बेबस बन्दिशों को, थकान,सुकून,चाहत,विश्राम की, विश्वास की,भरोसे की, संगी,साथी,मित्र बन गई गजल,गीत,रूबाई,कविता, कण्ठ को सुर,मधुर तान दे गुनगुना ली अकथ व्यथा, पा लिया हजारों लाखों सुख वसंती रूत जैसा आह्लाद, विषाद का क्रूर शिल्पी भी वक्त के हथौड़े से प्रहार करे,ग़म नहीं, भीतर का गीला सुखाने के अनेकों संसाधन हैं, मोहताज नहीं भावों...

" अव्यक्त रहने दूं उन्हें या "

" विरह श्रृंगार पर कविता " सूरज  निकल   चला  गया दिन  बीता  साँझ  ढल गई जलतीं  रहीं  दो  पुतलियां जिसमें झुलस  मैं जल रही। आये    ना   प्रियतम   तुम चमन  के   भरी   बहार  में छोड़कर    विरानियां   गईं बहारें   भी  इन्तज़ार    में। नयन     घटा      हुए    हैं सांसें    उखड़     रही    हैं यशोधरा सी बैठी गुन रही बेबस आँखें  उमड़  रही हैं। वेदना को है कसक ये भी असहनीय    मौन      तेरा निर्मोही   हो  गये  हो  तुम वियोगी  मन बना  के मेरा। प्रेम    का    प्रसंग    लिखूं या   दावानल    विरह  का विलाप   ग़र  समझ...

" वीर रस की कविता "

 " वीर रस की कविता " लहराता हुआ सागर कलकल फुफकारती नदी गरजता हुआ हिमालय खड़ा  ललकारती धरती केसरिया करे सिंहनाद सरजमीं हुंकार है भरती हो प्यारे देश पर परवानों कुर्बां शम्मा भी कहती । बारूदी शोलों सा फटो शूरवीरों राणा के संतान तूफान भी ना रोक सके लो संकल्प मन में ठान विनाश लीला कर विध्वंस करो पूरा पाकिस्तान      कि शौर्य का तुम्हारे करे श्रृंगार सारा हिन्दुस्तान । ध्वस्त कर शत्रुओं के किले,गढ़ श्मशान बना दो शहादतों का कर हिसाब क़ौम की आन बढ़ा दो ध्वजा गर्ज करे शंखनाद सपूतों रणभेरी बजा दो  फन आतंकियों के कुचलो घिनौने मंसूबे ढहा दो । मातृभूमि के गौरव लिए हो ग़र गर्दन भी कटानी हँसते-हँसते सूली चढ़ना माँ की उधारी उतारनी वतन पर वार दो फौलादी  ज़िस्म चढ़ती जवानी  स्वर्णाक्षरों में गढ़ी जाए अमर शूरता की कहानी । स्वदेश लिए मरना जीना यही उद्देश्य हो हमारा  जो धृष्ट आँख उठे राष्ट्र पर वो शिकार हो हमारा  कश्मीर हिंद का सिरमौर झूमता झंडा हो प्यारा  करांची लाहौर भी हम लेंगे हर जुबां का हो नारा  । उ...