संदेश

मंच पर कविता आरम्भ करने से पहले,समां बांधने के लिए

मंच पर कविता आरम्भ करने से पहले,समां बांधने के लिए मेरी आँखों का पीके मय सभी मदहोश बैठे हैं नशा नस-नस तरल कर दी सभी ख़ामोश बैठे हैं, पलकें हो गईं शोहदा झपकना भूल बैठी हैं जब से आई हूँ महफ़िल में सभी खो होश बैठे हैं, ग़र हो तालियों की गूँज तो भंग तन्द्रा सभी की हो महफ़िल हो उठे जीवन्त करतल ध्वनि सभी की हो, बंधन खोल हथेली का सुर साजों से नवाज़ें ग़र हो अन्दाजे-बयां माहौल वाह-वाह धुन सुना दें ग़र, शब्दों से करूं सराबोर महफ़िल हो जाए गदगद  गर दें हौसला रंच भी मन के तार छेड़ूं अनहद, गणमान्य अतिथियों का करूं भरपूर मनोरंजन दर्शक दीर्घा में बैठे सज्जनों करुं शत-शत नमन वन्दन ‌।                      शैल सिंह

हिंदी पर कविता , हिंदी का हो राज्याभिषेक

हिंदी का हो राज्याभिषेक  हिंदी की ख़्याति बढ़ाने को इसे हमें सशक्त,समृद्ध करना है सहर्ष अपना कर इसे प्रतिष्ठित कर विश्वपटल पर भी प्रसिद्द करना है , हिंदी हमारे भारत का गौरव हिंदी सुशासन,सुराज की धार है भाल सजा बिंदिया हिंदी करती हिंदुस्तान का श्रृंगार है , गंगाजल सी पावन हिंदी उर्दू,संस्कृत से भी मिलनसार है , कितनी सीधी,सहज,सरल,मधुर हिंदी हृदय का उद्गार है रिश्तों की डोरी,ऊष्मा प्राणों की हिंदी मौसमी गीतों की फुहार है हिंदी का विस्तार करें हम ये ऋषि,मुनियों के वाणी की टंकार है , मन से मन के तार जोड़ती  हिंदी मधुर,मनोहर रसधार है कण-कण में है घुली हुई हिंदी कल-कल बहती जलधार है , देश,दुनिया में भी गूंज रही आज़ हिंदी की ललकार है बांधती सुर में गीत,ग़ज़ल को हिंदी मीठी कर्णप्रिय झंकार है , भावों में करुणा,पीर पिरोने वाली  हिंदी एकमात्र आधार है सब भाषाओँ पर भारी पड़ती हिंदी जब भरती हुंकार है , स्वतः उतरती मन के आँगन कवि मन के कृतियों का संसार है हिंदी का हो राज्याभिषेक हम हिन्दुस्तानियों की...

'' देश लिए शहीद हुए एक सैनिक की भावना ''

देश लिए शहीद हुए एक सैनिक की भावना  तेरी आन लिए प्रान किया क़ुरबान प्यारे देश मेरे मेरे प्रति तेरा भी तो देश कुछ फ़र्ज होना चाहिए , किस हाल में महतारी,हाल क्या है प्राण प्यारी की किस हाल में दुलारा,हाल क्या लाड़ली दुलारी की  जो सहारा बूढ़े पिता ने देश तेरी आन लिए वारा है उस घर का भी तुझपे देश कुछ क़र्ज़ होना चाहिए , तेरे सम्मान,आन,बान लिए माता ने उजाड़ी कोख़ ज़िन्दगी भर लिए जिसने आँचल रखी समेट शोक  जिसने राखी की कलाई भेंट दी देश की भलाई पे     दुख के पहाड़ का भी देश कुछ अर्ज़ होना चाहिए , जिसके गाँव का चराग़ बुझा मुरझाये फूल बाग़ के जिस द्वारे पर  अर्थी  आई  ध्वजा में  लपेटी संवार के   जिन आँसुओं की धार नहीं टूटे भाई को निहार के दर्द,बलिदानी गांव का,देश कुछ दर्ज़ होना चाहिए।   देश भक्ति पर कुछ पंक्तियां थोड़ा शर्म करो सियासत करने वालों नमन तो करो देख जवानों का जज़्बा सेना तुम्हारी ही...

किसी की शायरी, कविता का जवाब मेरे भाव में

 किसी की शायरी, कविता का जवाब मेरे भाव में                   ( १ ) यहाँ धरती की सारी वस्तु सारे मकान मेरे हैं ये हिन्दूस्तान मेरा है बता दे जा कोई उसको वोे किरायेदार हैं तो रहें किरायेदार की तरह  रास्ता बाहर का भी बता दे जा कोई उसको ,    हमारे बाप तक न पहुँचें हम तक रहें अच्छा   भलमनसाहत यही कि इन्हें बर्दाश्त करते हैं जो असुरक्षित यहाँ पर जिनकी सांसें है बन्दी वो कहीं जा ठिकाना ढूंढ लें आगाह करते हैं , ज़ुबां कैंची सी चलती एहसानफ़रामोशों की अरे जान हथेली पर तो हम लोगों की ग़द्दारों  अलग-अलग वस्तियां हमारी और तुम्हारी हैं न ज़द में हैं न रहते हैं विश्वासघातों के ग़द्दारों  सब मिल बांट रहें ग़र समझें देश को अपना ना कोई दुश्मन यहाँ उनका न जान खतरे में हमारी घर-गली में रहके,जमाते धौंस हमी पे  बोलें तोल शब्दों को मत घोलें झाल मिसरे में ।                           ...

कविता '' सच्चाई ने जीती बाज़ी ''

        '' सच्चाई ने जीती बाज़ी '' दिन भर आग उगल सूरज जला नहीं निढाल हो गया सारी रात जला एक दीप जल कर भी निहाल हो गया , ग़म सहना सीखा मैंने नीरव रजनी के गहन अंधेरों से नीरस ज़िंदगी करने वाला भी खुद ही कंगाल हो गया , कभी रंगा नहीं किसी भी रंग में मैंने अपने अंदाज़ को जब छोड़ी नहीं ख़ुद्दारी मैंने क़ुदरत भी बेहाल हो गया , देखो अपना ढलता सूरज मेरे किस्मत से खेलने वालों   सच्चाई ने जीती बाज़ी कहने लगे लोग कमाल हो गया , नमन करने वालों उगते सूरज को मेरा भोर भूला दिए   देखो बुरे लम्हों का साया खुद छूमंतर पाताल हो गया।                                                       शैल सिंह                                          

बेटियों पर कविता,अँधेरों को कर ना दें बेपरदा ख़ामोशियाँ मेरी

बेटियों पर कविता अँधेरों को कर ना दें बेपरदा ख़ामोशियाँ मेरी  हमें अम्बर को छूना जी खोलो बेड़ियाँ मेरी जोश के पर पे उड़ने को बेचैन परियां मेरी  लहरों का नज़ारा बैठ साहिल पर देखें क्यों  भंवरों से करें अठखेलियाँ दो कश्तियाँ मेरी ,   दे दो हक़ हमें भी,आजादी हमें भी मर्दों सी ग़र मज़लूम ना होतीं न लगतीं बोलियां मेरी  उड़ना हमें भी हवाओं में उन्मुक्त पाँखी सा  अस्मत की ना खायें  नोंच  दरिंदे बोटियाँ मेरी , हमें खुल कर सांसों को लेने की इजाज़त दो करतब खूब दिखाएंगी हुनरमंद बेटियाँ मेरी  नहीं होना उत्सर्ग कनक पिंजरों के वैभवों में बग़ावत पे उतर ना जायें कहीं दुश्वारियां मेरी , ख़ुद को जला घर के अँथेरों को किया रौशन  किरण बाहर भी बिखरानी फैलें रश्मियाँ मेरी  अबला और ना बन देनी हमें हैं  अग्निपरीक्षाएँ  अँधेरों को  कर  ना  दें  बेपरदा  ख़ामोशियाँ  मेरी ,  ख़ुद चमकूँ  जुगुनू सा मैं दे दूँ चाँद को भी मात बा...

कविता -ढोंगी बाबाओं पर व्यंग्य

ढोंगी बाबाओं पर व्यंग्य आओ बच्चों तुम्हें सिखाएं, सम्पत्ति अर्जित करने के नायाब तरीके, झऊवा जैसे बाल बढ़ा लेना , छुट्टे बकरे के पूंछ सी झबरी दाढ़ी राम-रहीम का तमग़ा लटका लीला करना बनकर खूब मदारी, जर,जोरू,जमींदारी अनुयायी तेरे देखना सारी ज़ागीर लुटा देंगे बहन,बेटियों के अस्मत की भी देखना अंधभक्त बन्दे बाट लगा देंगे,   साध्वियों,सन्यासिनियों पर डोरे डालना लेना पड़े भले ही दो चार दस पंगे ग़र कोई करेगा बुलंद ख़िलाफ़ आवाज़  तो मुर्ख अशिक्षित लेकर लाठी डन्डे, विरोधियों,प्रशासन पर पिल पड़ेंगे वानर सेना सा तेरे पाले पागल ये गुंडे नागिन डांस करेंगे तेरे लिए अंधभक्त ये , डाल कर खुली आँखों पर पर्दे, राष्ट्रीय सम्पत्तियों को तहस-नहस कर प्रशासन के विरुद्ध रोष जताएंगे भक्ति के मद में डूबे ओ नकली ढोंगी  तेरे लिए ये मौत को भी गले लगाएंगे, नपुंसक तो सबसे पहले बनाना   अपने सेवकों और सेवादारों को हैसियत और रुतबे की धौंस दिखा धमकाकर रखना भक्त परिवारों को, खुद को ईश्वर का साक्षात् अवतार बता कुकर्मों से मस्त बनाना अंधि...