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भजन

   '' भजन ''    भगवन तुम तो बसे हो मन-मन्दिर ईंट-पत्थरों के शिवाले क्यूँ जाऊँ जब मन के नगर में तेरा महल क्यूँ चौखट-चौखट सर टकराऊँ , तेरा रूप धार ली काया मेरी प्रतिदिन अंग भभूत लगाऊँ रच-बस गए हो प्रभु तुम मुझमें नख-शिख रोम-रोम सुख पाऊँ , याचनाओं का अर्ध्य भेंट दी दु:ख का मृगछाल बिछाऊं निशि-वासर हूँ लीन भजन में दीन-दशा का भोग चढ़ाऊँ , तेरे पांव पखारें नीर नयन के दुःख की गागर छलकाऊँ कहीं छवि ओझल ना जाये डर से पलकें ना झपकाऊँ , तुम ध्यान मग्न मेरे उर गह्वर में क्यूँ गुफ़ा कंदरा मन भटकाऊँ जब मुझमें समाहित तुम प्रभुवर क्यूँ दर-दर की जा ठोकर खाऊँ , एक बार नज़र तूं फेरे इधर क्यूँ मन्दिरों की घण्टी खटकाऊँ जब नज़रबन्द कर लिया तुझे दिन रात दरश तेरा पाऊँ ,                       शैल सिंह

होली अबकी बार

मोदी जी की जीत पर  होली अबकी बार मोदी लहर लील गई सबके सियासी चाल बेदाग छवि पे मेहरबान जनता हुई निहाल उन्मत्त उमंगों की होली होगी अबकी बार क्योंकि बनेगी यूपी में बीजेपी की सरकार नाना नवरंगों के गुलाल,उड़ेंगे अबकी बार दिल से किया सभी ने है मोदी को स्वीकार शेर,हुंकार भरेगा दुबकेंगे रंगे सभी सियार क्योंकि धरती,नदिया,हुए अम्बर एकाकार नमो-नमो जयकार में चित हैं सब भौकाल किसी की बम्पर हार तो कोई हुआ बीमार रंग अबीर पिचकारी ख़ुशी से गाल हैं लाल कितने वर्षों बाद देश में आया ऐसा भूचाल सात समंदर पार चर्चा,मोदी नाम बेमिसाल विरोधी सुरों की अटकलें कैसे हुआ कमाल ।                                            शैल सिंह 

नारी दिवस पर

नारी दिवस पर  मैं शक्तिस्वरूपा नारी जननी सम्पूर्ण जगत की त्याग,दया,ममता की मूरत गौरव निज संस्कृति की मैं लक्ष्मी,दुर्गा,सरस्वती हूँ अवतार अनवरत शक्ति की युग निर्मात्री लिए सीमाएं,लक्ष्मण रेखाएं क्यूँ बनीं प्रकृति की सीता,द्रौपदी,गंगा,कुन्ती को कीं कलुषित मानसिकता कुत्सित की वही सबल बन अबला निष्ठुर जग की निर्मम अवरोधों को खंडित की सह समाज के विषम थपेड़े नियति से लड़ खुद लिए उसने नव राह सृजित की उड़ रही गगन में,हर क्षेत्र में बढ़-चढ़ हिस्सा स्वयं स्वरूपा ख़ुद को महिमामंडित की ।                                                                                  शैल सिंह   

वसंत ऋतु पर कविता

   वसंत ऋतु पर कविता  बड़ा सुहावन मन भावन लगे वसंत तेरा आना थोड़ी सर्दी थोड़ी गर्मी मौसम बड़ा सुहाना , इंद्रधनुष ने खींची रंगोली सज गई मधुऋतु की डोली बिखरा दी अम्बर ने रोली धरती मांग सजा खुश हो ली छितरी न्यारी सुषमा चहुँदिश कलियाँ घूँघट के पट खोलीं आई  ठूँठों पे तरुणाई भर गई उपहारों से झोली, बड़ा सुहावन मन भावन लगे वसंत तेरा आना।, देख हरित धरणी का विजन हुआ मन मयूर मस्ताना पीली चूनर सरसों लहराई उसपे तितली का मंडराना पी मकरंद मस्त भये मधुकर मद में मगन दीवाना गूंजे विहंगों की किलकारी कुञ्ज-कुटीर  मलय भर जाना , बड़ा सुहावन मन भावन लगे वसंत तेरा आना , अमराई महके बौराई मधुकंठी तान सुनाये देख वासन्ती मादकता नाचे वन,वीथिक मयूरा बौराये पछुआ-पुरवा की शीतल सुरभि नशीला गन्ध जिया भरमाये पापी पपीहरा पिउ-पिउ बोले सुध विरहन को पी की सताये , बड़ा सुहावन मन भावन लगे वसंत तेरा आना , चित चकोर तिरछी चितवन से अपने सजन से करे निहोरा मूक अधर और दृग से चुगली करे दम-दम सिंगार-पटोरा प्रकृति...

चुनावों की बेला में ,मेरी ये कविता

 एक विनम्र निवेदन देश की जनता से  हमें विश्व गुरु है बनना हर मन सपना ये बुनवाना होगा अराजकता,अत्याचार,अनाचार का कोढ़ दूर भागना होगा राष्ट्रीय पुष्प का कर अभिनन्दन बहुमत का अर्ध्य चढ़ाना होगा ईमानदारी,नैतिकता,जनसेवा हित कमल का फूल खिलाना होगा , हिंदुस्तान के हिन्दुओं को अकल तभी अब आएगी जब उसकी ही सरजमीं पर फसल दूजी क़ौम उगायेगी सपा,बसपा,काँग्रेस को तो नफ़रत अयोध्या नगरी के राम से ग़र नहीं चेता हिन्दू अब भी मिट जायेंगे हम अपने ही चारों धाम से , गढ़-गढ़ में कमल खिला दे जनता ग़र यूपी के कीचड़ में चोर,उचक्के सारे माफ़िया बंद हो जायेंगे जेलों के सीकड़ में ना गुंडागर्दी हत्या,बलात्कार ना होगा कैराना,दादरी जैसा काण्ड ना एक मंच पर सांठ-गांठ कर खड़े होंगे साथ फिर सारे भड़ुवे भांड़ , हाथी,पंजा,साईकिल ने बना दिया जैसे यूपी को चम्बल मज़हब की दीवार खड़ी कर करवाते रहे आपस में दंगल इक थैली के चट्टे-बट्टे बन गए सियासत कर इक दूजे के संबल मेधावों को कर दरक़िनार सदा वर्ग विशेष का ये करते रहे सुमंगल , कितना जाति,धर्म के...

तुम कहाँ हो बोलते

सर्प दंश से भी बढ़ कर घातक तुम्हारा मौन है , तुम कहाँ हो बोलते बोलती तुम्हारी चुप्पियाँ हैं मौन की भाषा अबोली कह देतीं मन की सूक्तियां हैं , इतनी विधा के भाव समेटे अधर विराम चिन्ह क्यों हैं शब्दों को रखते मापकर स्वभाव इतना भिन्न क्यों है, क्या-क्या उधेड़ बुनकर दिन रात तुम हो जी रहे कौन सा ऐसा गरल जो मौन घोंट कर हो पी रहे, मौन तो हो तुम मगर बोलती देह की भित्तियां हैं किस खता पे सौगंध तुमको बन रही कड़वी पित्तियाँ हैं, किताब भर ब्यौरा समेटे क्यूँ रखते अधर के बंद पट अंदाज की चंठ झाँकियाँ झाँकतीं नैन के पनघट, जब कभी गर खोलते हो भानुमति का बंद पिटारा बस गोल मोल बोल करते चन्द सा अस्फुट निपटारा, जीने लिए इस किरदार को मजबूर क्यों हो बोल दो चुपचाप की इन खिड़कियों को भड़भड़ाकर खोल दो, मूल्यवान मेरे हजारों शब्द से मौन की कुपित दृष्टियां  हैं आत्मज्ञान की तुम खोज में मगर रहतीं तनी भृकुटियां हैं , वास्ता मुझसे अगर है मैं वजह हूँ मौन की तो ओ विरागी पूछती हूँ ढीठ बन मैं कौन हूँ, तुम बंद सीपी की तरह म...

देशभक्ति गीत

       एक देशभक्त सिपाही के उद्वेग का वर्णन गीत वद्ध कविता में , बाँधा सर पे कफ़न हम वतन के लिए जांनिसार करना मादरे चमन के लिए , मत प्रिये राह रोको कर दो ख़ुशी से विदा   भाल पर मातृ भूमि का रज-कण दो सजा दिल पे खंजर चलातीं हरकतें दुश्मनों की लेना सरहद पे बदला हर बलिदानियों का , है पिता का आशीष गर दुआ साथ माँ की प्रिये होगी विजय मुश्किले हर हालात की रखना इंतजार का दीया दिल में जलाकर सलामत रहा होगी बरसात   मुलाक़ात की , अश्कों के बाल दीप ना बुज़दिल बनाओ  ना कजरे की धार की ये बिजली गिराओ   पिघल न जाये कहीं मोम सा दिल ये मेरा  विघ्न के इस प्रलय की ना बदली बिछाओ , महबूब ये वतन तेरा वतन से प्यार करना  वतन की  आबरू लिए सुहाग  वार करना  माँग अपनी संवारो संकल्प के सामान से कंगना कुंकुम ना रोको न मनुहार करना , कायराना कमानों का न आयुद्ध जुटाओ  आरती के  था ल आज़...