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गुनहगार हूँ मगर बेकसूर हूँ

गुनहगार हूँ मगर बेकसूर हूँ   ज़माने की निग़ाहों का तीर सह सकी ना मजबूर इस क़दर हुई कर बैठी बेवफ़ाई कभी आह भरती हूँ  कभी रोती बहुत हूँ दर्द रात भर पिघलता  जाने कैसी बुत हूँ अश्क़ ग़म के खातों में कसकती तन्हाई मजबूर इस कदर हुई कर बैठी बेवफ़ाई कभी फूल बन के तुम आते हो ख़्वाबों में कभी पलकों पर आ  बह जाते सैलाबों में क्यूँ गुजरे ज़माने की महका जाते पुरवाई मजबूर इस कदर हुई  कर बैठी बेवफ़ाई , अपनी ज़िन्दगी अपनी किस्मत ना बस में भला कैसे हम निभाते वफ़ादारी की रस्में जिधर फेरती निग़ाह दिखती तेरी परछाई मजबूर इस कदर  हुई कर बैठी बेवफ़ाई , तिल-तिल कर मरती हूँ दिल की तड़प से यह शमां जलती देखो ज़िस्म की दहक से क़समें वादों का जनाज़ा क्या गाये रूबाई मजबूर इस कदर  हुई कर बैठी बेवफ़ाई बेग़ैरत मोहब्बत ना मेरे हमदम समझना खुदा की कसम मुझको बेवफ़ा न कहना बेपनाह मोहब्बत  की तुम्हें दे रही  दुहाई मजबूर इस कदर  हुई कर ...

हम ऐसी जमीं के जांबाज सिपाही

                    हम ऐसी जमीं के जांबाज सिपाही  कश्मीर तेरी प्यारी बहन है क्या जो ससुराल से विदा कराकर ले जाएगा जीतनी बार भेजेगा लावलश्कर कंहार लाशों का ढेर शानों पे ले जायेगा आ जा प्यारे तेरी आवभगत के लिए बेताब यहाँ गोले बारूद बरसने को सीमा पे तैनात तेरे जीजाओं की बन्दूक भरी स्वागत में आग उगलने को इत्ता वैराग भी ठीक नहीं पागलों अब कश्मीर राग अलापना दो भी छोड़ भीतर से खोखला है तूं कितना करना है तो कर भारत की प्रगति से होड़ अभी तो देखी तुमने केवल हमारी शराफ़त ग़र अपने पर हम आ जायेंगे अभी वक़्त है चेत ले वरना तेरे घर में घुस ऐसी कहर क़यामत का ढाएंगे इक-इक को चुन-चुन कर माँ की कसम कश्मीर का भैरवी राग सुनाएंगे जो दहशतगर्दी फैला रखी भारत की जमीं पर उससे तेरा मुल्क़ जलाएंगे पहले देख तूं अपने वतन की जर्जर हालत जो माँ तेरी,उस पे तरस तूं खा मत आँख उठाकर देख पावन धरा मेरी छिछोरेपन से क...

मत करो न साधना घायल मेरी

मंदिर-मंदिर चौखट-चौखट दीया बाल कर रही याचना नैवेद्य पुष्प की थाल सजाये घण्टी बजा कर रही प्रार्थना , मन्दिर के परमपूज्य पुजारी अर्जी देकर कह दो शिव से भजन,कीर्तन में लीन निमग्न कर जोड़े बैठी कबसे दर पे , मन तेरा द्रवित नहीं है होता  क्यों देख जगत की पीर प्रभु हहाकार रुदन,चीत्कार नहीं क्यों देता सीना तेरा चिर प्रभु , मांग अमन की भीख विकल क्या ऐसा अपराध किया मैंने सर्वत्र विराजमान तूं दयानिधे नहीं देखता क्यों क़हर घिनौने , तुझे रिझाने को निष्ठुर भगवन जाने कितने उपक्रम कर डाले नयनों से घटा बरसा-बरसाकर अगणित  बार फेरे हैं मैंने माले , क्या तुझे समर्पित और करूँ मैं तेरा ये गर्वित रूप पिघलाने को रीती गागर आँचल सूखा सावन सिवा श्रद्धा ना कुछ बरसाने को , कहो ना चाँद से शीतल बनकर दहक मिटा दे तपती धरती का मटमैली ना हो रजनी की चादर  ना तृष्णा,मुस्कान हरे जगती का , जलती सांसों पर बोल गीतों के सुमधुर स्वर ताल में कैस...

आखिर लिखूं तो क्या लिखूं

आखिर लिखूं तो क्या लिखूं मुरझा से गए हैं अल्फ़ाज मेरे सुख गई है मन की तलहटी पैठ इनमें ढूँढूँ तो क्या ढूँढूँ  कुछ आता नहीं दिमाग में आखिर लिखूँ तो क्या लिखूँ , ताजी खुश्बुओं का झोंका कब आकर चला गया हुनर आशिकी का मेरे कहाँ लेकर चला गया सदा दूं तो किसको दूं कुछ आता नहीं दिमाग में आखिर लिखूं तो क्या लिखूं , अब न हाथ में आती कलम ले भावों का सुन्दर समन्वय ना ही दर्द देते शब्द कुछ करूँ कागजों पे कोई बवंडर  रिक्तता में भरूं तो क्या भरूं कुछ आता नहीं दिमाग में आखिर लिखूं तो क्या लिखूं , ऐसी तो न थी हालत कभी कैसे तबियत बिगड़ गई ऐसा हुआ क्या माज़रा फन से रंगत उतर गई बैठी करूँ तो क्या करूँ कुछ आता नहीं दिमाग में आखिर लिखूं तो क्या लिखूं , ना वो मधुर पल-छिन रहे ना सुहानी गुनगुनाती रात ना उमड़-घुमड़ सौहार्द्र बरसे ना स्वच्छन्द गूंजे अट्टहास वक़्त से कहूँ तो क्या कहूँ  कुछ आता नहीं दिमाग में आखिर लिखूं तो क्या लिखूं ।                       शै...

द्रव तेरी आँखों का क्यों सूखा है रे जालिम

द्रव तेरी आँखों का क्यों सूखा है रे ज़ालिम बर्बर आतंकों से दहला हुआ है विश्व भी ख़ौफनाक सायों में गुजरे सहमी ज़िदगी दहशतगर्दों के इरादों की अज़ीब दास्ताँ इंसानियत को मार जी रहे कैसी ज़िदगी    बनके अमानुष गिराते रोज ही क्रूर ग़ाज  झुलसा रहे निर्दयता से दुनियावी ज़िदगी  मौत का बरपा क़हर पसरा हुआ मातम  सांसों के अहसानों पर जी रहे हैं ज़िदगी  देख यह मन्जर मेरा होता है दिल घायल  पी-पी के घूँट ज़हर का जी रहे हैं ज़िदगी , यह कैसी सनक है धुन,उपद्रव किसलिए ऐसे खिलवाड़ से करोगे कबतक दरिंदगी ग़र न ज़मीर जागा न फूटा सोता स्नेह का  इक दिन तुम्हें भी लील लेगी तेरी दरिंदगी , हाय तुम्हारी हैवानियत को मैं क्या नाम दूँ  जन्नतेहूर की ख़ाहिश बनाई सस्ती ज़िदगी   द्रव तेरी आँखों का क्यों सूखा है रे ज़ालिम तेरी बेरहमी बेगुनाहों की ले रही है ज़िदगी ,  जिस ख़ुदा वास्त...

गुलाब से सीख

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गुलाब से सीख  तेरी सुवासित कोमल पंखुड़ियाँ पर काँटों भरी टहनियाँ क्यों हैं     ऐ गुलाब बता तेरे ताबों के संग शूलों की इतनी लड़ियाँ क्यों हैं '       इन शूलों के भी बीच अकड़कर कैसे सुर्ख सिंगार कर मुस्काता है दुनिया को जरा यह रहस्य बता दे शूलों में घिर कैसे सुगंध फैलाता है  ।                                  शैल सिंह

अभी करना काम बहुत है बाकी

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अभी करना काम बहुत है बाकी अभी तो पग हैं धरे डगर पे चलना दूर बहुत है बाकी सफ़र अभी तो शुरू हुआ है तय करना सफ़र बहुत है बाकी अल्प समय में कर दिया बहुत कुछ अभी करना काम बहुत है बाकी पल-पल का हिसाब अभी क्या दूँ अभी हल करना काम बहुत है बाकी सबका साथ सबका विकास हो बस हाथ में हाथ मिलाना साथी घर में रोशनी की बहुत जरुरत तुम सब बनो दीया जलूं मैं बन बाती अभी विश्व फ़लक पर नाम है चमका अभी भारत को स्वर्ग बनाना है बाकी                           शैल सिंह