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माटी के रंग

  माटी के रंग  ये हकीकत है आज़ की , माटी से टूटा है नाता सभी का , सोंधी-सोंधी ख़ुश्बूओं से परे , बनावट के आवरण में  वास्तविक गंध को भूल जाना, आज का वातावरण,समाज  एक ऐसा मुखौटा बन गया है  जैसे गुलदस्ते में सजे फुल सरीखा  खिले रहने के बनावटी अंदाज, कैसा मुलम्मा चढ़ा लिया है , खाली उजाड़ होकर भी चेहरे पर , हँसी पर साधनों का खेप डालकर  अन्तर के आंदोलन का मातम मनाते हुए, खोखला विद्रूप मन लिए  कॉस्मेटिक का मोटा लेप चढ़ा कर , अन्तर में माटी की गंध को  सीने से लगाये तड़पना , फलने-फूलने की अभीष्ट चाह  अपनी माटी को तलाशती ज़िन्दगी  क्या है असल ज़िंदगी की ख़ुशी का मानदण्ड  सब कुछ पाकर भी क्या खो दिया है  भौतिकता और आधुनिकता के उसूलों में, कितने कृत्रिम हो गए हैं हम  कृत्रिमता हमें किस कदर आकर्षित कर रही है , स्थाई रस का अभाव  मौलिकता का मटियामेट होना , नैतिकता का पतन होना , कितने नैराश्य और निरंकुश हो गए हैं हम ।  इतने सारे गैजेट्स , संसाधनों के पालनों में झूलते हुए हंसी को तरसते , समूह की तलाश...

ग़ज़ल

               ग़ज़ल  दिल के निगाहख़ाने कभी तो झाँक लेते  इन्तज़ार मौसमे-रंग का करते ही रह गए । जख़्म देके पूछते हैं दर्द होता कहाँ है पूछने से और भी अज़ाब होता जवां है वक़्त की अलामत हर जख़्म हो गए हैं कैसे दिखाएं उनके निशां कहाँ-कहाँ हैं । ख़ुशी के फूल बांटती बज़्में-रौनक थी जो सैले-नज़र ढूँढ़ती हल्काए-ज़ंज़ीर जहाँ है मवाद बनके टीसते हैं सुलूक़ों की दास्ताँ     दिल में असास दमे-आखिर तक जमा है । दामन में नूर हैं तमाम मुअत्तर है ज़िंदगी बू का क्या करें टूटा ख़्वाबों का कारवाँ है दिल के हक़-तलब से वाक़िफ़ ही नहीं जो मतलूब क्या मेरी कैसी इश्तियाकें रवां है । तक़ाज़े क्या ज़िन्दगी के क्या ख़्वाहिशें मेरी कैसे कहें जुबां से किया हर्फों में सब बयां है दस्तो-दर भटक रहे हैं ख़ुशी की तलाश में वो भी जानते हैं बखूब जो दोनों के दरम्यां है । हाले-दिल सुना सके ना ग़ज़ल बना लिया   गुमनाम हसरतों का गवाह आईना यहाँ है कैसे करे साझा हया,उरियानियों की बातें         रेखाएं कुछ सीमाओं की,बन्द रखा ...
मन के शोर हैं या हक़ीक़त नहीं जानती ये बंद हैं या शेरो शायरी मैं नहीं जानती मन के शोर हैं या हक़ीक़त नहीं जानती । ( १ ) रुत बदलती है,मौसम बदलते हैं रोज, दिन महीने और साल गुजरते हैं रोज बस बदलती नहीं है घड़ी इंतज़ार की, जाने कितनी गली से गुजरते हैं रोज । ( २ ) ग़मों का अम्बार इतना ज्यादा है पास  गैरों के ग़म सहलाने की फुरसत नहीं गैरों की ख़ुशी से सरोकार मुझको नहीं ख़ुशी मेरे दर का रुख़ जब करती नहीं । ( ३ ) सितम ढाए हैं बहुत से सितमगर मगर ज़ख़्म खा-खाकर दिल पर संभलते रहे ग़मों में शामिल हुए नए ग़म हजारों मगर अज़ाब शानों पे रख रेगज़ारों पे चलते रहे । ( ४ ) हवाओं का दरीचे से बेरुख़ी से मुड़ के जाना आवारा सडकों पर सोचों की प्रायः टहलना दिल का परदा हिलाना गवारा भी ना समझा दरे-जाना से लौटकर हरीमे-ग़म में भटकना । अज़ाब -मुसीबतें । शानों--कांधा । रेगज़ारों--रेगिस्तान दरे-जाना- प्रिय के द्वार । हरीमे-ग़म--दुःखों के सहन में ।                 ...

मन के उद्गार

मैं अपने मन की कुछ बात कहना चाहती हूँ बुद्धिजीवी लोगों से ,क्योंकि मैं भी अपनी बेटी के रिश्ते के लिए आजकल इन चोंचलों से अज़ीज आ रही हूँ ,कब लगाम लगेगी इन कुंडली के चक्करों की जोड़-तोड़ को ,ज्योतिषियों की भ्रामक प्रचारों को जिसका जहर टी. वी.पर हर चैनल पर प्रसारित किया जा रहा है इंटरनेट पर पंडितों की साइटों की भरमार है ,जिसे देख सुनकर जनता अंधविश्वासों की शिकार होती जा रही है ,मांगलिक और गुणदोष के चक्कर में लडके-लड़कियों की शादी की सही उमर ही निकलती जा रही है यदि पोथी,पत्रों वाली बातें इतनी ही सच होतीं तो हमारी पीढ़ी के लोग कितने परेशान हुए होते ,पहले हर दम्पति के चार,पांच ,छह ,आठ औलादें होती थीं इतने शिक्षित भी लोग नहीं होते थे कि अपने इतने संतानों की सही डेट ऑफ बर्थ का सही-सही लेखा-जोखा संरक्षित कर रख सकें । टी.वी. पर दिखाए जा रहे वास्तु शाश्त्र कुंडली के दोष गुण के उपाय अच्छे-अच्छों के दिमाग़ का गुड़गोबर कर दिया है ,पहले भी लोग मानते थे पर आजकल की तरह नहीं ,कितनों की दुकानें चल निकली हैं ,शादी व्याह की कित...

मत हमसे हमारी उमर पूछिये

मत हमसे हमारी उमर पूछिये  उमंगें-तरंगे जवां धड़कने हैं अभी अभी अंगड़ाईयाँ लेतीं हिलोरें घनी मत हमसे हमारी उमर पूछिये धुँधला जाये जिसे देख जौहरे-आईना अभी भी बसद रंग हृदय के आबाद हैं कल्पनाओं का व्यापर करती नहीं मैं महफ़िलों में अभी भी नूर की धाक है मन के सितारों का चमकता गगन देखिये मत हमसे हमारी उमर पूछिये । रंग और रेशा शरीर के हैं जर्जर मगर उजले केशों में शक्ति की वही धार है वहशत वही आज़ भी मेरे हर लम्स में जीस्त वही आज भी अज्जाए-बहार है ढली साँझ,चांदनी का खुशरंग जुनूँ देखिये मत हमसे हमारी उमर पूछिये । सदा वंचित रखा खुद को जिस बात से क़ायम रिश्ता था भींगती सांवली रात से बेमक़सद गंवाई जिंदगी जो मैनें दहर में  अभागिन इच्छाएं जागी अब हो मुखर हैं  मौज़-ए-खूँ देखिये बस रंगे-तरब देखिये मत हमसे हमारी उमर पूछिये । मलय-मारुत लजाएँ गति वही आज भी इन हाथों भुजाओं में है बल वही आज भी धुंधला गई रौशनी जर्जर मलिन गात है ज़िन्दा हासिल-ओ-लाहासील ज़ज्बात हैं नंगे-पीरी शर्मा जाये नैरंगे-नज़र...

मैं सीपी के मोती जैसी

हमराह में साथी नहीं संगी कोई अपना भरे जो रंग गहबर सा अधूरा ही रहा सपना मिले मंजिल मेरी मुझको  अभिलाषाएं भटकती हैं  महत्वाकांक्षा रही सिसकती  उमर पल-पल गुजरती है , गगन के सितारों सी चमकने की कल्पना थी  जमीं पर पांव चाहत चाँद छूने की तमन्ना थी ।  अपनों ने दिखा दिवा सपना  कंचन सा विश्वास ठगा मेरा  खुद की धुरी के चारों ओर  बस डाल रही अब तक फेरा , घायल मन की व्यथा मिटा यदि कोई बहलाता  चाहे अनचाहे सपनों की यदि मांग कोई भर जाता ।  सागर से भरी गागर है  मन रीता-रीता सा ही  मोती सी तरसती तृष्णा  घर संसार सीपी सा ही , टूटे साजों पर गीत अधूरे किस्मत काश संवर जाए  चाहत पर चातक की शायद स्वाति की बूँद बरस जाए ।  कस्तूरी जैसी महक मेरी  ये जागीर न देखा कोई  असहाय साधना की राहें  ऐसी तरूण कामना खोई , घरौंदों को आयाम मिले कब किरण भोर की आएगी  कब कसौटियों पर खरी उतर शख़्सियत गर्द मचाएगी ।  विराट कलाओं क...

मन का सुखौना

मन का सुखौना कब नजरें इनायत फ़ना कब नज़र कब ख़ुशी लब हँसी क्या हमें ये ख़बर । अभी तक तो खिली धूप थी आँगने की बादलों ने चुबौली रुख़ घटा डालकर अभी मन का सुखौना ज्यों डाली ही थी ओदा कर दी घटा और भी झमझमाकर , कुछ सिमसिमाहट होगी दूर यह सोचकर भांपकर मिज़ाज़ मौसम का रुख देखकर मन की तिजोरी से सारा जिनिस काढ़कर दहिया लगाई ख़ुशफ़हमी दिल नाशाद कर ,  रुत बदलती है रंग पल में जाना ना था  रुख हवा का किधर हो कब जाना ना था धूप बदली की कितनी सुहानी लगी थी  ये खेल धूप-छाँव का दिल ने जाना ना था , ग़र अहसास होता फ़िजां के इस अंदाज़ का  साँसें महकी ना होती बहकी पुरवा ना होती  कैसे होते हैं शाम औ सुबह रूप के जान लेते  ग़र शमां को रौशनी की ऐसी परवा ना होती , फ़ुर्सत से मिली थी नज़र जो दो घड़ी के लिए  ख़ुलूस मिला उल्फ़त मिली दो घड़ी के लिए  मेरी महफ़िल में बैठ भी कभी दो घड़ी के लिए  देख अजनवी की तरह ही सही दो घड़ी ...