संदेश

''शायद यही हो मेरा आत्मबोध-आत्मबोध''

शायद यही हो मेरा आत्मबोध-आत्मबोध लेखनी लिखने को आतुर  पर शब्द छिन गए हैं  उसके अस्तित्व की सार्थकता  स्त्रीत्व के दायरे में जकड़ी  अपने निजत्व से निकलकर  स्वयं को पहचानने के लिए व्यग्र  पर घर की सीमा  परिवार की गरिमा  कायम रखने के लिए  उसकी चिर-परिचित  धरोहर का भष्म होना  क्या यही नियति है ।  सबके लिए दीपशिखा सी जलते रहना  उसकी तपिश में केवल  नारी होने की जड़ता का द्वन्द  शेष उसका अपना ।  कितना तल्ख़ी भरा है स्त्रीधन, अर्थहीन रेगिस्तान सा विवश  नैसर्गिक विकास  क्रियात्मक ऊर्जा को  हवा दे देकर  दाल भात के वाष्प में  प्रतिभा का शोषण  पूर्णता को निहलती रसोई  आत्म विश्वास का  तार-तार होते देखते रहना  क्या यही है उसकी नियति ।  पर नहीं,एक तलाश है  इस लीक से हटकर  मन्सूबों को निखारने के लिए  जो अपने हैं उसके अपने  पथरीली पगडण्डियों पर चलकर  ...

शुद्ध भाव कुम्हलाने लगे क्यों

शुद्ध भाव कुम्हलाने लगे क्यों शुद्ध भाव शुचिता से सींच ले रे मन मानव , उत्कृष्टता भरी कूट-कूट कर अन्तर्जगत के भाव हैं इसमें  , सादा जीवन उच्च विचार रख  सम्पन्नता की खान है इसमें अवमूल्यन कर क्षरण कर रहे हो क्यों भाव जगत को शुष्क बनाकर भौतिकता,सम्पन्नता श्रेठ हो गई आज़ उच्चता विचारों की छोड़कर , शुद्ध भाव कुम्हलाने लगे क्यों देख बाह्य जगत की चमक-दमक प्रेम,दया,परोपकार,सहिषुणता पर हावी हो गई सम्पन्नता की धमक , हर गाँव,नगर,घर,गली,मोहल्ला सभी ग्रसित हैं इससे सर से पांव इस दौड़ में शामिल होकर सब ही भूल गए हैं अन्दर झांकने के ठाँव ।                                            शैल सिंह 

मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते

मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते आती अवरोधों की तोड़ जंजीरें सब कभी आवाज़ दे तुम पुकारे तो होते , टूटे दिल की किरिचें संभाले है रखा जोड़कर रेज़ों को तुम निहारे तो होते मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते । भोली मस्ती थी नादां से अहसास थे नाज़-नखरे कभी तुम संवारे तो होते , मोम की गुड़िया सी मैं जाती पिघल प्यार की आँच से तुम दुलारे तो होते , मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते । छोटी-छोटी मेरे ख़्वाहिशों की मीनारें मन समंदर उतर तुम विहारे तो होते , हद-ए-बेरूख़ी पर सब्र का बांध तोड़ा गाल गीले कभी तुम पुचकारे तो होते , मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते । भावों की बह नदी डूबी  उतरायी मैं  भावों की लहरों पर तुम उतारे तो होते , जग के ताने, छींटे, व्यंग्य,फिकरे सहे तंज के झंझावात से तुम उबारे तो होते , मैं तो ऐसी नगीना थी ऐ संग दिल तराशकर हीरे सा तुम निखारे तो होते । तुम ज़िद पर अड़े मैं अपनी उम्मीद पर कशमकश की ढहा तुम दीव...

मन के द्वारे लगा सांकल सारी दुनिया

मन के द्वारे लगा सांकल सारी दुनिया हँसी के फौव्वारे ठहाकों की दुनिया कहाँ खोई जाने चौपालों की दुनिया , ठहर सी गई आ कहाँ ज़िन्दगी ये मन के द्वारे सांकल लगा सारी दुनिया , गुड्डे-गुड़ियों का खेल बन्ना-बन्नी के गीत थाप ढोलक के नाचती नज़ारों की दुनिया , त्योहारों की रौनक वो गँवईं का मेला लकठा,जलेबी,फुलौड़ी,गुब्बारों की दुनिया , चवन्नी,अठन्नी में सारे ख़ुशी के सामान  ख़रीद सकती कहाँ अब दौलत की दुनिया , गिल्ली-डंडा,कबड्डी,ताश की वो दोपहरी खेत-खलिहान,बगिया चहकती वो दुनिया , नेट,मोबाईल चाण्डालिन टैब चुड़ैल टी.वी ने चट कर दी सामाजिक समरसता की दुनिया । लकठा-बेसन का बना हुआ गुड़ में पगा                                                           शैल सिंह

गिर्दाब में है नैया

गिर्दाब में है नैया दर-दर भटक रही अर्से से आसेबों से बचा ले कहाँ है मेरी मंज़िल,मंज़िल से खुद मिला दे , जिस चीज की तलाश में पागल बनी हूँ फिरती चुपके से आके फूल वो आँचल में खुद गिरा दे , लड़खड़ाती आस ,वक़्त के गिरदाब में है नैया बुझती हुई उम्मीदों के पलक दीप खुद जला दे , पड़ गए हैं आबले अब तो धैर्य के भी पाँव में अज़्मे-सफ़र में रब अमां के ग़ुंचे खुद खिला दे , ना असास मांगती हूँ ना शम्सो-क़मर ही माँगा नवाज़िशों से ख़ुदा किश्ते-दिल को खुद सजा दे , आशाओं की दहलीज़ पर शिकस्त बस है खाई अब किस दर पे जाऊँ ले कांसा तूं ही खुद बता दे , साईल बना दिया है कहाँ-कहाँ ना झख है मारा बेताबी-ए-एहसास,बेदर्द दुनिया को ख़ुद दिखा दे , नकारते हैं वह भी जो नहीं कहीं से मेरे क़ाबिल दबा कहाँ तक़दीर का पुलिंदा सुराग़ खुद बता दे , मौसम के साथ-साथ उम्र खिसक रही पल-पल तक़ाज़े का राग मेरे,अंदाज़ के साज़ खुद सुना दे । आसेबों -भटकन , गिरदाब -भंवर , आबले-छाले अज़्मे-सफ़र--अभिलाषा,यात्रा ,  अमां -संतुष्टि असास...

गुजरे ज़माने की बातें

काल खण्ड की बातें  सब कुछ आज है पास मेरे  नहीं जो साथ रहा करते थे हम बाबूजी की पर्णकुटी में  आनंद विहार किया करते थे , थोड़ा ही सुख था तो भी क्या  दुःख थोड़ा ही किया करते थे  बैठ कुटुम्ब कबीला संग,नव  प्रेरक सद्भाव बहा करते थे , अभावग्रस्त था जीवन फिर भी  लघु दीप जला करते आदर्शों के  अनुकंपा असीम देवों की बरसती  लक्ष्य होते बस रोटी,घर,वस्त्रों के , नत शीश हृदय से जोड़ अंजुरियाँ  प्रभु का आह्वान किया करते थे  देवत्व,साधना,तप,स्तुति में नयना  शाश्वत सुख अभिराम किया करते थे , तृप्ति थी संतुष्टि अपार भी  अवसाद नहीं दबाव था कोई  नेह,दया,अनुराग अलख भाव  मन आँगन करुणा पूँजी बोई , नहीं ईर्ष्या,द्वेष,क्लेश किसी से  ना दंभ,भय,लोभ किसी से कोई  पाट की खाट पर सारी रतिया  सबने सुख की निंदिया सोई , साधन,सम्पति,समृद्धि सब कुछ  हृदय घट ही क्यों है सूख गया  जिस पनघट पर सब मिलते थे,वो  अलमस्त आलम कहाँ म...

कुछ क्षणिकाएँ

हे मेरे अन्तर्यामी प्रभो   जीवन के  सूने स्वप्न सदन में   सृष्टि  की  समरसता  भर  दो   उद्भ्रान्त पथिक के विवर मन में            शाश्वत जीवन का रंग भर दो , लगता मेरा दुःख सबका दुःख है  सबका दुःख मेरा अपना दुःख है  तभी तो  राग एक  है रंग अनेक  और भाव एक है बस अंग अनेक , हम सब जलती आग के ईंधन हैं  मरना सबको इक दिन सत्य यही  क्षणिक मिलन के मोद में भूलें ना  मिलने औ बिछड़ने के तथ्य कहीं , दृढ़ प्रतिज्ञ हों तन-मन से यदि  तो नहीं असम्भव होता कुछ भी  जितनी विकट हो राह लक्ष्य की हो जाती सुगम पथ कंटकमय भी , कभी लक्ष्य नहीं देखता     धुप,ताप,छाँह,बिजलियाँ        पग चल पड़ते हैं बेपरवाह          दिशा की खोज में अन्जान              चाहे लाख काँटों भरी हों...